महाराष्ट्र अल्पसंख्यक विकास विभाग के अधिकारी मिलिंद शेनॉय द्वारा नियमों को ताक पर रखकर करीब 75 स्कूलों को अल्पसंख्यक दर्जा देने का मामला अब तूल पकड़ चुका है. अल्पसंख्यक दर्जे की फाइलों को मंजूरी देने की प्रक्रिया पिछले साल अगस्त से रुकी हुई थी, लेकिन 28 जनवरी 2025 को जिस दिन उपमुख्यमंत्री अजीत पवार का निधन हुआ, उसी दिन मिलिंद शेनॉय ने धड़ाधड़ 75 फाइलों पर हस्ताक्षर कर उन्हें अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान कर दिया. इस घटनाक्रम के बाद सरकार ने न केवल शेनॉय का तबादला कर दिया है, बल्कि उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने भी मामले की गहन जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.
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स्कूलों के लिए क्यों जरूरी है 'अल्पसंख्यक दर्जा'?
शिक्षा क्षेत्र में अल्पसंख्यक दर्जा मिलना किसी भी स्कूल के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है. संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने और संचालित करने का मौलिक अधिकार है. यह दर्जा मिलने पर कुछ महत्वपूर्ण कानूनों से छूट मिलती है, जो इन संस्थाओं को अपनी विशेष पहचान और प्रशासन बनाए रखने में मदद करती है.
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अल्पसंख्यक विद्यालयों पर लागू नहीं होने वाले प्रमुख कानून
- आरटीई अधिनियम: सामान्य निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित करनी अनिवार्य हैं, लेकिन अल्पसंख्यक स्कूलों पर यह लागू नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले में स्पष्ट किया गया कि RTE अधिनियम अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होता.
- टीईटी: शिक्षकों की नियुक्ति के लिए TET अनिवार्य है, लेकिन अल्पसंख्यक स्कूलों में यह अनिवार्य नहीं माना जाता, क्योंकि वे अपनी शिक्षक भर्ती की नीति खुद तय कर सकते हैं.
- सूचना का अधिकार अधिनियम: अल्पसंख्यक संस्थानों पर RTI पूरी तरह लागू नहीं होता, जिससे वे कुछ मामलों में जानकारी देने से मुक्त रहते हैं.
ये छूटें अल्पसंख्यक स्कूलों को सरकारी हस्तक्षेप से बचाती हैं, साथ ही अनुदान, दान और अन्य लाभ भी मिलते हैं.
जांच के घेरे में 'सर्टिफिकेट' का वितरण
इस पूरे मामले में सबसे विवादित पहलू इसकी टाइमिंग है. पिछले कई महीनों से लंबित फाइलों को अचानक एक ही दिन में निपटाना संदेह पैदा करता है. आरोपों के मुताबिक, नियमों की अनदेखी कर ये सर्टिफिकेट बांटे गए हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन अब यह पता लगाने में जुटा है कि क्या इन स्कूलों को दर्जा देने के पीछे कोई आर्थिक अनियमितता या राजनीतिक दबाव था. फिलहाल, इस कार्रवाई के मुख्य सूत्रधार माने जा रहे मिलिंद शेनॉय का तबादला कर दिया गया है.