महाराष्ट्र के धुले जिले में लंबे समय से चर्चा में रहे ST कॉर्पोरेशन के “कलर ब्लाइंडनेस केस” में कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है. करीब 11 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने उस समय के डिपार्टमेंट कंट्रोलर, सिविल सर्जन और 29 ड्राइवरों को सभी आरोपों से बरी कर दिया. फैसले के बाद कर्मचारियों में राहत और खुशी का माहौल देखा गया.
मामला क्या था?
यह पूरा मामला साल 2015 का है, जब धुले ST कॉर्पोरेशन में कुछ ड्राइवरों को कलर ब्लाइंडनेस की समस्या के चलते ड्राइविंग ड्यूटी से हटाकर सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर तैनात किया गया था. इसके लिए ड्राइवरों ने सिविल सर्जन द्वारा जारी मेडिकल सर्टिफिकेट जमा किया था, जिसमें उनकी दृष्टि संबंधी समस्या का उल्लेख था.
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इसी सर्टिफिकेट के आधार पर डिपार्टमेंट कंट्रोलर ने उन्हें अलग-अलग डिपो में नई जिम्मेदारी दी. हालांकि, इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत शिकायत दर्ज की. आरोप लगाया गया कि मेडिकल बोर्ड की अनिवार्य जांच कराए बिना ही नियुक्ति कर दी गई.
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केस कैसे बना?
शिकायत के बाद अधिकारियों ने मामले की जांच शुरू की और मेडिकल बोर्ड का सर्टिफिकेट न लेने को गंभीर लापरवाही मानते हुए उस समय के डिपार्टमेंट कंट्रोलर, सिविल सर्जन और कुल 31 कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया. यह मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गया था.
कोर्ट में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट वाल्मीक कचवे पाटिल ने मजबूत दलीलें पेश कीं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि कर्मचारियों ने उपलब्ध सरकारी प्रक्रिया के तहत ही मेडिकल सर्टिफिकेट जमा किया था और इसमें किसी तरह की आपराधिक मंशा नहीं थी. उनकी दलीलों को एडवोकेट अमोल पाटिल और एडवोकेट सारंग जोशी का भी समर्थन मिला. बचाव पक्ष ने दस्तावेजों और गवाहों के जरिए यह साबित किया कि ड्राइवरों के साथ अन्याय हुआ है और उन पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं.
कोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें और सबूतों की जांच के बाद चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने माना कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं.
कर्मचारियों में राहत
करीब एक दशक से ज्यादा समय तक चले इस केस के खत्म होने के बाद कर्मचारियों ने राहत की सांस ली. फैसले के बाद उनके चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी.
यह फैसला न सिर्फ आरोपित कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं और जिम्मेदारियों पर भी अहम सवाल खड़े करता है.