यह है पूरा मामला
छात्रा ने पुलिस को शिकायत करते हुए बताया कि शख्स उसका बार- बार पीछा करते था। एक दिन वह बाजार जा रही थी, तब भी उसने उसकी साइकिल का पीछा किया। जबरन रोकने का प्रयास किया। जब वह नहीं रुकी तो उसे धक्का दे दिया। इस मामले में दोषी पाए गए शख्स को मजिस्ट्रेट ने 2 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
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दुर्व्यवहार करना अपराध नहीं
आईपीसी की धारा 354 के तहत शील भंग करने का अपराध न मानने पर हाई कोर्ट ने कहा कि धक्का देना उस तरह का कार्य नहीं है, जिससे शिकायतकर्ता की स्थिति शर्मनाक हो। इस फैसले से साफ होता है कि न्यायिक संरचना महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है और दुर्व्यवहार के मामलों में कठोर कार्रवाई कर रही है। महिलाओं को आत्मसमर्पण और सुरक्षित महसूस करने का अधिकार है और ऐसे मामलों में कड़ी सजा देना महत्वपूर्ण है।
इस फैसले से सामाजिक सजगता बढ़ेगी और महिलाओं को न्याय प्राप्त होने में मदद मिलेगी। हाई कोर्ट का यह स्थानीय फैसला महिलाओं के हित में महत्वपूर्ण कदम है और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है।