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गुजरात पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ, 2028-29 तक 5.66 लाख करोड़ पार करने का अनुमान

गुजरात विधानसभा में पेश बजट के बाद राज्य के बढ़ते सार्वजनिक कर्ज़ को लेकर बहस तेज हो गई है, 2028-29 तक कर्ज़ 5.66 लाख करोड़ रुपये पार करने का अनुमान है.
राजकोषीय घाटे में 251% वृद्धि और राजस्व अधिशेष में गिरावट की आशंका ने वित्तीय संतुलन को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है. ठाकुर भूपेंद्र सिंह कि रिपोर्ट

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गुजरात विधानसभा में पेश किए गए ताज़ा बजट दस्तावेज़ों के अनुसार, राज्य का कुल सार्वजनिक कर्ज़ आने वाले तीन सालो में 5.5 लाख करोड़ रुपये को पार कर सकता है. सरकार के अनुमान बताते हैं कि साल 2025–26 में गुजरात पर कुल कर्ज़ 4 लाख 45 हज़ार 537 करोड़ रुपये और 2026–27 में यह बढ़कर 4 लाख 87 हज़ार 69 करोड़ रुपये होने का अनुमान है.जबकि साल 2028–29 तक ये कर्ज़ करीब 5 लाख 66 हज़ार 845 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.

साल 2023–24 में गुजरात का कुल कर्ज़ 3 लाख 52 हज़ार 717 करोड़ रुपये था, जो 2024–25 में बढ़कर 4 लाख 30 हज़ार 320 करोड़ रुपये हो गया. यानी महज़ एक साल में करीब 77 हज़ार करोड़ रुपये का इज़ाफा हुआ है . अगर आने वाले पांच सालो कर्ज में करीब 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है मतलब औसतन हर साल लगभग 45 हज़ार करोड़ रुपये का नया कर्ज़ जुड़ने की संभावना है.

हालांकि, इन बढ़ते आंकड़ों के बीच राज्य का सकल घरेलू उत्पाद यानी GSDP करीब 68 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है. इसी वजह से, कर्ज़ की हिस्सेदारी 14.38 प्रतिशत से घटकर 13.74 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है. लेकिन २०२८-२९ तक राजकोषीय घाटे में अनुमानित २५१ फीसदी की बढ़ोतरी एक बड़ी चिंता का विषय है

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वर्ष 2023–24 में जहां राजकोषीय घाटा 23 हज़ार 463 करोड़ रुपये था, वहीं 2028–29 तक इसके बढ़कर 82 हज़ार 518 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है यानी करीब 251 प्रतिशत की बढ़ोतरी. इसके साथ ही, राजस्व अधिशेष में भी गिरावट का अनुमान है. 2023–24 में जहां यह 33 हज़ार 477 करोड़ रुपये था, वहीं 2028–29 तक इसके घटकर लगभग 22 हज़ार करोड़ रुपये रहने की संभावना है. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज भुगतान और अन्य स्थायी खर्चों में बढ़ोतरी इसकी मुख्य वजह हो सकती है.

एक तरफ राज्य में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं की घोषणाएं हो रही हैं, तो दूसरी तरफ बढ़ता सार्वजनिक कर्ज़ भविष्य में वित्तीय संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है. आने वाले वर्षों में सरकार राजस्व बढ़ाने और खर्च पर नियंत्रण के बीच किस तरह संतुलन साधती है, यही सबसे बड़ा सवाल होगा.

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