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संसद में पीठासीन अधिकारियों को लेकर क्या हैं नियम? लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति के न होने पर करते हैं सदन की अध्यक्षता

Parliament Budget Session: लोकसभा और राज्यसभा में अकसर स्पीकर और सभापति की गैर-मौजूदगी में कई पीठासीन अधिकारी सदनों की अध्यक्षता करते नजर आते हैं. जिन्हें खासतौर पर नियुक्त किया जाता है. दोनों सदनों के लिए अलग-अलग अधिकारियों का पैनल होता है, जो स्पीकर और वाइस प्रसेडिंट, सभापति और उपसभापति की गैर-मौजूदगी में सदन के संचालन के लिए जिम्मेदार होते हैं.

लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में अकसर पीठासीन अधिकारी अध्यक्षता करते नजर आते हैं.

Lok Sabha Rajya Sabha Chairman: दिल्ली में संसद भवन में बजट सत्र चल रहा है और लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान दोनों पक्षों के सांसदों में विवाद हुआ. 2 दिन में कई बार लोकसभा स्थगित हुई. स्पीकर ने राहुल गांधी को टोका तो सांसदों के बीच गहमागहमी भी हुई. कांग्रेस और BJP दोनों पक्षों के सांसदों ने नाराजगी जाहिर करते हुए बोलने न देने के आरोप लगाए. इस दौरान स्पीकर ओम बिरला की जगह सदन की अध्यक्षता करने आए पीठासीन अधिकारी दिलीप सैकिया और चेयर की तरफ कांग्रेस सांसदों ने कागज फाड़कर फेंके और नाराजगी जाहिर की.

8 कांग्रेस सांसद पूरे सत्र के लिए निलंबित

इस घटना को माननीय स्पीकर और चेयर का अपमान माना गया. कार्रवाई करते हुए 8 कांग्रेस सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया. कहा गया कि संविधान के तहत चेयर माननीय है तो उस पर बैठने पर नेता भी माननीय होते हैं, अब वह चाहे स्पीकर हों या उनकी जगह सदन की अध्यक्षता कर रहे पीठासीन अधिकारी हो, इसलिए चेयर का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इसी संदर्भ में हम आपको बताने जा रहे हैं कि अकसर लोकसभा-राज्यसभा की अध्यक्षता करते हुए दिखने वाले पीठासीन अधिकारी कौन होते हैं, जिनमें से एक अधिकारी सांसदों के गुस्से का शिकार भी हुए.

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मतदान से चुने जाते हैं स्पीकर और सभापति

संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार, लोकसभा सदन के लिए अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और राज्यसभा के लिए सभापति-उपसभापति को चुना जाता है. लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव लोकसभा सदस्यों के मतदान के बाद बहुमत से होता है और फिर सदन में उपस्थित सांसदों में से किसी को उपाध्यक्ष चुन लिया जाता है. वहीं राज्यसभा के सभापति का चुनाव भी मतदान प्रक्रिया के तहत होता है और सांसदों में से किसी को उपसभापति चुन लिया जाता है. ज्यादातर मामलों में चारों पदों के लिए उनका ही चयन होता है, जिन्हें सत्ता पक्ष का समर्थन हासिल होता है. वहीं उपाध्यक्ष और उपसभापति उन्हें चुना जाता है, जिन्हें राजनीति का सबसे ज्यादा अनुभव होता है या सबसे ज्यादा बार चुनाव जीतकर सदन में आए होते हैं.

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स्पीकर और चेयरमैन में क्या अंतर होता है‌?

बता दें कि लोकसभा के संचालन के लिए जिन्हें चुनकर चेयर पर बिठाया जाता है, उन्हें स्पीकर कहा जाता है और राज्यसभा के संचालन के लिए जिन्हें चुनकर चेयर पर बिठाया जाता है, उन्हें चेयरमैन कहा जाता है. वहीं चाहे लोकसभा के उपाध्यक्ष हों या राज्यसभा के उपसभापति हों, उन्हें भी चेयरमैन कहा जाता है. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति के अलावा सदन के संचालन के लिए पीठासीन अधिकारी भी चुने जाते हैं, जो उपरोक्त चारों की गैर-मौजूदगी में सदन का संचालन करते हैं. इन्हें भी चेयरमैन का जाता है, यानी स्पीकर सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष को कहा जाएगा. राज्यसभा के सभापति भी चेयरमैन कहलाएंगे.

कौन होते हैं पीठासीन अधिकारी?

बता दें कि पीठासीन अधिकारी वे सांसद होते हैं, जो लोकसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और राज्यसभा सभापति-उपसभापति की गैर-मौजूदगी में सदन का संचालन करने के लिए नियुक्त किए जाते हैं. लोकसभा के लिए 6 पीठासीन अधिकारियों का पैनल होता है और राज्यसभा के लिए भी इतने ही अधिकारियों का पैनल होता है, लेकिन जब वे सदन की अध्यक्षता कर रहे होते हैं तो वे भी माननीय और सम्माननीय होते हैं और उनका अपमान करना सदन का अपमान करने के बराबर होता है.

पीठासीन अधिकारी पक्ष और विपक्ष दोनों चुने जाते हैं और एक साल के ही चुने जाते हैं, लेकिन एक ही शख्स को कई बार पीठासीन अधिकारी बनाया जा सकता है और यह फैसला अध्यक्ष का होता है, लेकिन पीठासीन अधिकारी को चुनने के लिए उसे सदन के सभी राजनीतिक दलों से सलाह जरूर लेनी होगी. यहां विशेष उल्लेखनीय है कि पीठासीन अधिकारी को किसी भी मामले में फैसला लेने का अधिकार नहीं होता, बल्कि वह फैसला लेने का अधिकार अध्यक्ष के लिए पेंडिंग छोड़ देता है, यानी वह सदन की अध्यक्षता करते हुए कोई फैसला नही ले सकता या कोई आदेश नहीं सुना सकता.


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