South Korean Scientists Develop Meaty Rice In Lab : कुछ साल पहले खबरें आई थीं जिनमें दावा किया गया था कि वैज्ञानिकों ने लैब में मीट तैयार किया है। इस मीट को टेस्ट भी किया गया था। इसका टेस्ट और पोषक तत्व असली मीट जैसे ही थे। अब वैज्ञानिकों ने ऐसा चावल तैयार किया है जिसे बीफ से तैयार किया गया है। वैज्ञानिकों ने इसे Meaty Rice नाम दिया है। यानी ऐसा चावल जिसे मीट से तैयार किया गया है। इसकी खास बात है कि इस चावल को तैयार करने में किसी भी जानवर को मारा नहीं गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस चावल में उतना ही प्रोटीन है जितना मीट में होता है।
कोरियाई वैज्ञानिकों ने किया तैयार
इस चावल को दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने लैब में तैयार किया है। इसे तैयार करने के लिए बीफ की कोशिकाओं का इस्तेमाल किया गया है। वैज्ञानिकों की टीम को लीड करने प्रोफेसर हॉन्ग जिन-की का कहना है कि यह Meaty Rice पर्यावरण के लिए इको-फ्रेंडली हो सकता है और लोगों के साथ अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के प्रोटीन की समस्या दूर कर सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें वहीं प्रोटीन मिलेगा जो मीट में मिलता है। ऐसे में प्रोटीन की मात्रा पूरी करने के लिए किसी जानवर को मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हॉन्ग ने कहा कि इस कल्चर्ड मीट का इस्तेमाल करके हम किसी भी जानवर को मारे बिना एनिमल प्रोटीन प्राप्त कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने लैब में तैयार किया Meaty Rice
गुलाबी है रंग
इस चावल का रंग गुलाबी है। इसमें से बटर जैसी खुशबू आती है। यह इसलिए क्योंकि इसे तैयार करने में बीफ मसल और फैट सेल का इस्तेमाल किया गया है। हॉन्ग ने कहा है कि बहुत सारी कंपनियां सामान्य मीट के मुकाबले इसके विकल्प पर जोर दे रही हैं। इसमें प्लांट बेस्ड या कल्चर्ड बेस्ड मीट शामिल है। ऐसा इसलिए क्योंकि एनिमल फार्मिंग से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। साथ ही ग्रीनहाउस गैस का भी पर्यावरण पर असर दिखाई दे रहा है।
रेगुलर चावल से इतना ज्यादा बेहतर
Meaty Rice रेगुलर चावल के मुकाबले ज्यादा बेहतर है। हॉन्ग ने बताया कि इसमें सामान्य चावल के मुकाबले 8 फीसदी ज्यादा प्रोटीन और 7 फीसदी ज्यादा फैट है। इसे तैयार करने के लिए पहले चावल पर फिश जिलेटिन का कोट किया जाता है और 11 दिनों तक पेस्ट्री डिश में रख दिया जाता है। इसके बाद इसमें बीफ कोशिकाएं इंजेक्ट की जाती हैं। कोशिकाएं इंजेक्ट होने के बाद इन्हें बढ़ने के लिए एक आदर्श स्ट्रक्चर मिल जाता है।
दुनिया में कम होगा मीट का प्रोडक्शन
एक्सपर्ट के मुताबिक 2040 तक दुनिया के कई देशों में मीट का प्रोडक्शन कम हो जाएगा। वहीं मीट की डिमांड लगातार बढ़ेगी। ऐसे में इस तरह के मीट से मीट की कमी को पूरा किया जा सकता है।
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