हमारे साथ जुड़ें X IG YT FB
Trending: Asian Games 2026election commissionBigg Boss 20

Economic Survey से कामकाजी घंटों पर बहस में कैसे आया ट्विस्ट? समझिए पूरा मामला

Working Hours Debate: 31 जनवरी को पेश किए गए देश के आर्थिक सर्वेक्षण में कुछ ऐसी बातें कही गई हैं, जिनसे कामकाजी घंटों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

विज्ञापन
Photo Credit: Garrigues

Economic Survey: देश के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने कामकाजी घंटों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा तैयार किए गए इस सर्वेक्षण में कहा गया है कि कर्मचारियों के कामकाजी घंटों पर लगी सीमाएं भारत के आर्थिक विकास के लिए अच्छी नहीं हैं। बता दें कि इंफोसिस के फाउंडर नारायण मूर्ति और एलएंडटी के चेयरमैन एसएन सुब्रमण्यन की इस विषय पर सलाह को लेकर काफी बवाल मचा था।

विकास के लिए नहीं अच्छा

आर्थिक सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि श्रमिकों के लिए कामकाजी घंटों के लिए निर्धारित सीमाएं भारत के आर्थिक विकास के लिए अच्छी नहीं हैं। इससे छोटे और मझोले उद्योगों का विकास सीमित हो सकता है। सर्वेक्षण में आगे कहा गया है कि व्यापार वृद्धि को बढ़ावा देने वाले अनुकूल माहौल को बढ़ावा देना रोजगार और आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, ऐसे उदाहरण हैं जहां श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए श्रम नियम शायद अनजाने में फर्मों, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों के विकास में बाधा डालते हैं। ऐसा करने से रोजगार सृजन भी कम होता है।

कानून का किया जिक्र

फैक्ट्रीज एक्ट (1948) की धारा 51 में कहा गया है कि किसी भी वयस्क कर्मचारी से सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। इसका हवाला देते हुए सर्वेक्षण में कहा गया है कि यह धारा एक दिन और एक सप्ताह में एक कर्मचारी के कामकाजी घंटों की संख्या को सीमित करती है। जबकि कई देशों में इस सीमा को सप्ताह और महीनों के बीच औसत करके कामकाजी घंटों को फ्लेक्सिबल बनाया जाता है।

विज्ञापन

ILO का दिया हवाला

सर्वेक्षण में कहा गया है कि कामकाजी घंटों की यह सीमा निर्माताओं को बढ़ती मांग को पूरा करने तथा वैश्विक बाजारों में भाग लेने से रोकती है। कई देशों के श्रम कानूनों के अनुसार निर्माता समय-समय पर कामकाजी घंटों की सीमा को औसत करके उत्पादन बढ़ा सकते हैं, जिससे उन्हें लाभ मिलता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) भी निर्माताओं को 3 सप्ताह में काम के घंटों की औसत सीमा तय करने की स्वतंत्रता देने की सिफारिश करता है।

प्रभावित होती है क्षमता

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में काम के घंटों की सीमा से विनिर्माण की लागत, समय और जोखिम बढ़ सकता है। इसमें आगे कहा गया है कि काम के घंटों पर प्रतिबंध श्रमिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने और अधिक काम को रोकने के लिए लगाए गए हैं। हालांकि, काम के घंटों पर विभिन्न सीमाओं के चलते परेशानी उत्पन्न हो सकती है और इससे श्रमिकों की कमाई की क्षमता कम हो जाती है।

विज्ञापन

कमाई का दिया हवाला

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि श्रमिकों के लिए अधिक कामकाजी घंटे की अनुमति देने से उनकी वित्तीय स्थिति में सुधार आ सकता है, क्योंकि इससे उन्हें ओवरटाइम करने का अवसर मिलता है और कमाई बढ़ती है। सर्वेक्षण के अनुसार, नए लेबर कानूनों के तहत महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने ओवरटाइम घंटों की सीमा 75 घंटे से बढ़ाकर 144 घंटे कर दी है।

संबंधित खबरें

न्यूज 24 पर पढ़ें देश, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।

First published on:

Know More: Editorial Guidelines

लेख समाप्त

ताज़ा खबरें

Sponsored Links by Taboola