दिल्ली में 5 दिनों तक AI का महाकुंभ चला. दुनिया में AI क्रांति से होने वाले बदलावों पर चर्चा हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने AI Impact Summit के मंच से कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दुनिया की भलाई के लिए तभी काम आएगा, जब इसे सबके साथ साझा किया जाएगा. उन्होंने मानव विजन का सूत्र भी समझाया, पीएम मोदी जब ये बातें AI Impact Summit में कह रहे थे – तब वहां न तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मौजूद थे, न ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. आज की तारीख में AI का सबसे बड़ा धुरंधर अमेरिका है और दूसरे नंबर पर चीन. हालांकि, ये भी माना जा रहा है कि चाइना पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह AI पर काम कर रहा है, उसके पास भविष्य की तकनीक के लिए जरूरी रेयर अर्थ मिनिरल्स का सबसे बड़ा भंडार हैं. ऐसे में चीन तेजी से AI की दुनिया का सिकंदर बनने की राह पर दिख रहा है.
लेकिन, आज मैं न तो AI सुपरपावर्स के बीच चल रही तनातनी की बात करूंगी. न ये बताऊंगी कि AI को लेकर Global North और Global South के बीच खाई चौड़ी हो रही है या कम हो रही है. न ये बात करूंगी कि AI Impact Summit के बाद भारत में कृषि और कारखानों की तस्वीर कितनी बदलेगी? न ये बात होगी कि AI से कितनी नई नौकरियां पैदा होगी और कितनी खत्म? इन मुद्दों पर बहुत चर्चा हुई और अभी भी हो रही है. लेकिन, मेरे जेहन में लगातार एक सवाल उठ रहा है कि AI का हमारे लोकतंत्र और चुनावों पर किस तरह असर पड़ेगा? एक अरब 40 करोड़ आबादी वाला भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. दुनिया में सबसे अधिक आबादी हमारे देश की है. सबसे ज्यादा युवा भी भारत में ही हैं. हमारे देश के 97 करोड़ वोटर चुनावी प्रक्रिया के जरिए लोकतंत्र को मजबूती दे रहे हैं. शायद ही कोई ऐसा महीना हो जब देश के किसी-न-किसी हिस्से में चुनावी प्रक्रिया न चल रही हो. पंचायत से नगरपालिका तक और विधानसभा से संसद तक के लिए लोग अपनी वोट की ताकत से प्रतिनिधि चुनते हैं. ऐसे में ये जानना-समझना बहुत जरूरी है कि हमारे लोकतंत्र और चुनावों पर AI किस तरह असर डाल सकता है? AI से लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर? AI के दौर में कहां और किस तरह की सावधानी बरतने की जरूरत है-जिससे हमारा लोकतंत्र और निष्पक्ष, और पारदर्शी, और जवाबदेह बन सके?
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AI Impact Summit में 20 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्ष और 100 से ज्यादा टॉप ग्लोबल कंपनियों के CEO शामिल हुए. गूगल के CEO सुंदर पिचाई ने कहा कि AI हमारे जीवन का सबसे बड़ा प्लेटफार्म शिफ्ट है. इस तकनीक के साथ भारत दुनिया में एक असाधारण मुकाम हासिल करेगा. मेटा के CEO एलेक्जेंडर वैंग ने कहा कि भारत के पास दुनिया में AI का पावरहाउस बनने की पूरी क्षमता है. OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन की सोच है कि भारत AI अपनाने के मामले में दुनिया के सबसे तेज बाजारों में से एक है. एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई का कहना कि AI की मदद से भारत 20 से 25% तक आर्थिक बढ़त हासिल कर सकता है. लेकिन, AI Impact Summit में जब ग्रुप फोटो के दौरान सैम ऑल्टमैन और डारियो अमोदेई ने एक-दूसरे का हाथ नहीं थामा. तो दो दिग्गज टेक कंपनियों के CEOs के बीच तनातनी की खबरें ट्रेंड करने लगीं. कभी दोनों बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते थे. दरअसल, दोनों के बीच रिश्तों में तल्खी की वजह भी है. सैम अल्टमैन की OpenAI नए और तेज प्रोडक्ट लॉन्च करने पर फोकस करती है. वहीं, डारियो अमोदेई की एंथ्रोपिक का सिक्यूरिटी और यूजर सेफ्टी पर जोर है. दरअसल, AI को लेकर पूरी बहस भी यही है. एक ओर AI मशीनों की इंसानी क्षमता से कई गुना तेज रफ्तार के फायदे गिनाए जा रहे हैं. तो दूसरी ओर इसकी सीमा तय करने की बात हो रही है. पीएम मोदी ने कहा कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं - एक वो जिन्हें एआई में भय दिखता है. दूसरे वो जिन्हें AI में भाग्य दिखता है. भारत को एआई में भविष्य दिखता है. भाग्य दिखता है. अब बड़ा सवाल ये है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को AI किस हद तक प्रभावित करेगा? AI क्रांति से हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर?
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AI को संवेदनशील और उत्तरदायी कैसे बनाएं? इसी सवाल में पूरी दुनिया उलझी हुई है. AI से इंसान की जिंदगी में बदलाव की नई स्क्रिप्ट तैयार हो रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि भारत अपने जिस लोकतंत्र पर गर्व करता है. क्या उसमें भी AI की वजह से बड़ा बदलाव दिखेगा?
लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए और लोगों द्वारा बनाई गई शासन व्यवस्था है. ऐसे में जब लोगों की जिंदगी और सोच को AI बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहा है. तो फिर इस तकनीकी क्रांति के प्रभाव से लोकतंत्र कैसे बचा रह सकता है? दलील दी जा रही है कि AI लोकतंत्र को मजबूत करेगा या कमजोर. ये इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे किस तरह डिजाइन, रेग्युलेट और यूज यानी इस्तेमाल किया जाता है. दलील दी जा रही है कि AI की मदद से मतदाता सूची की शुद्धता का काम हर साल हो सकता है. वो भी बहुत आसानी से, भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की वोटर लिस्ट में हर साल करीब 8 करोड़ लोगों का नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन जैसा काम होता है. ऐसे में AI Tools वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण के काम को बहुत आसान बना सकता है.
AI टूल्स की मदद से नाम, पता और चेहरे का डिजिटल मिलान कर वोटर लिस्ट से डुप्लीकेसी यानी दोहराव जैसी दिक्कत को आसानी से खत्म किया जा सकता है. चुनावों में इन दिनों पैसे का बहुत इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में उम्मीदवार द्वारा घोषित खर्च और असल खर्च में अंतर AI टूल्स बता सकते हैं. AI टूल्स रैलियों या चुनावी सभाओं में मौजूद भीड़ की फोटो या वीडियो एनालिस से बता देगा कि उम्मीदवार द्वारा दिखाए गए खर्च और वास्तविक खर्च में कितना अंतर है. इससे चुनावों में ब्लैकमनी और गलत दावों पर रोक लगाने में आसानी होगी.
लोकतंत्र में लोगों की भागदारी बढ़ाने में भी AI का इस्तेमाल हो सकता है. बहुत कम खर्च और कम समय में चुनाव आयोग लोगों तक जन-जागरुकता से जुड़ा संदेश पहुंचा सकता है. वोटिंग के दौरान एक साथ लाखों लोगों के फीडबैक पर नजर रखने में मदद कर सकता है. वोटिंग के दौरान रियल टाइम शिकायतों का रियल टाइम समाधान निकालने की राह AI बहुत आसान बना सकता है.
AI टूल्स की मदद से राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के कामकाज का ट्रैक रिकॉर्ड भी जनता एक झटके में देख सकेगी. चुनावी अखाड़े में उतरे उम्मीदवारों की क्राइम कुंडली से लेकर कमाई के ग्राफ तक का डाटा AI की मदद से पलक झपकते ही हासिल किया जा सकता है . इससे लोगों को वोटिंग से पहले ये समझने में सहूलियत होगी कि चुनावों में सिर्फ वादे किए गए या निभाए भी गए. नेताजी ने सिर्फ अपनी तरक्की के लिए काम किया या फिर लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए भी काम हुआ. माना जा रहा है कि अगर सही तरीके से लोकतंत्र में AI का इस्तेमाल हुआ, तो चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है.
एक स्टडी के मुताबिक, 2030 तक भारत में 120 करोड़ लोगों के हाथों में स्मार्टफोन होगा. इसमें से ज्यादातर लोगों की जिंदगी, रोजगार और तौर-तरीकों पर AI का सीधा या थोड़ा घुमा-फिराकर असर तय है. लोगों की सोच और फैसले को बहुत हद कर AI algorithm प्रभावित करेगा. दावा ये भी किया जा रहा है कि AI Powered tools की मदद से Voter registration Verification का काम बहुत कम समय में पूरा किया जा सकता है. चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे SIR यानि Special Intensive Revision को लेकर बहुत सियासी बवाल हुआ. अभी भी ये पूरी तरह थमा नहीं है. पूर्व चुनाव आयुक्तों की दलील है AI Tools की मदद से वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण मतलब Addition, Deletion, Correction यानी नाम जोड़ना, हटना और सुधार का काम हर साल किया जा सकता है. हाल के वर्षों में चुनावों में पैसे का प्रभाव तेजी से बढ़ा है. ऐसे में उम्मीदवार द्वारा बताया गया खर्चा सही है या गलत. हलफनामे में कौन सी बातें बताई गईं और कौन सी छिपाई गईं. ऐसे कई तरह की चुनावी हेरफेर को रोकने में कारगर हथियार के तौर पर AI को देखा जा रहा है. दूसरी ओर, AI एक ऐसा हथियार है - जिसकी मदद से विरोधियों के खिलाफ Misinformation और Disinformation फैलाया जा सकता है. डीपफेक के जरिए चुनावों में विरोधियों की छवि खराब की सकती है. पुराने बयानों को तोड़-मरोड़ कर वायरल किया जा सकता है. ऐसे में AI तकनीक ने दुनिया की सबसे बेहतर शासन व्यवस्था समझे जाने वाले लोकतंत्र के सामने नए तरह की चुनौती पैदा कर दी है.
दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाली कोई भी घटना या वीडियो कुछ सेकेंड में ही इंटरनेट से लैस 6 इंच के स्मार्टफोन में प्रकट हो जाती है. लोगों की पसंद और नापसंद के हिसाब से Alogrithm काम करता है. लोग हर घटना या वीडिया का अपने-अपने हिसाब से मतलब निकालते हैं. राजनीति और कॉरपोरेट वर्ल्ड के धुरंधर दुनिया में होने वाली हर हलचल को अपने नफा-नुकसान के हिसाब से आगे बढ़ाने या फिर दबाने की कोशिश में दिखते हैं. ऐसे में लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने में AI के दुरुपयोग की आशंका कई गुना बढ़ गयी है. हाल में हुए देश में कई राज्यों के चुनावों में भी ऐसी कोशिशें दिखी हैं.
ऐसे कई Online Advanace AI Tools मौजूद हैं. जिनकी मदद से ऐसे वीडियो और तस्वीरें पलक झपकते तैयार की जा सकती हैं. डीपफेक तकनीक से बने वीडियो और तस्वीरों को देखकर आम आदमी के लिए फर्क करना मुश्किल है कि असली है फिर नकली? डीपफेक तकनीक ने लोकतंत्र में एक नए तरह की चुनौती पैदा कर दी है. चुनावों में लोगों की सोच प्रभावित करने के लिए डीपफेक का इस्तेमाल हो रहा है.
चुनावों के दौरान गलत और भ्रामक यानी Misinformation और Disinformation फैलाना का जो काम हो रहा है - उसमें कई तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं- उसमें सबसे ऊपर डीपफेक हैं. उसके बाद पुरानी तस्वीरें, पुराने बयान, फेक पोल, पुराने और असंबंधित वीडियो और AI जेनरेटेड तस्वीरें.
तकनीक का जिस रफ्तार से विस्तार और इस्तेमाल हो रहा है. वैसे में AI ने लोकतंत्र की जान चुनावी व्यवस्था के सामने चार बड़ी चुनौतियां पैदा कर दी है. पहली, AI बहुत कम खर्च में लाखों लोगों तक पहुंचने वाला कंटेंट तैयार करने में सक्षम है. सोशल मीडिया के जरिए तुरंत लोगों के बीच वायरल किया जा सकता है. दूसरा, AI किसी नैतिक मूल्य की परवाह नहीं करता. ऐसे में कमांड के हिसाब से विरोधियों को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. तीसरा, AI जेनरेटेड कंटेंट इतनी सफाई से बन रहे हैं कि आम आदमी के लिए असली-नकली में फर्क करना मुश्किल है. चौथा, गलत सूचनाओं के प्रचार-प्रसार वजह से लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी नतीजों को लेकर संदेह पैदा हो सकता है.
सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में AI का लोग अपने-अपने तरीके से इस्लेमाल कर रहे हैं. अमेरिकी चुनाव में भी इसका असर साफ-साफ देखा जा चुका है. दुनिया की बड़ी से बड़ी हस्तियां इसका शिकार बन चुकी हैं - चाहे वो राजनीति से जुड़ी हों या सिनेमा जगत से.
AI ने माइक्रो टार्गेटिंग और दुष्प्रचार की राह को बहुत आसान और सस्ता बना दिया है. बॉट नेटवर्क की मदद से चुनाव से पहले लोगों की सोच प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है. हजारों सोशल मीडिया खातों के जरिए एकतरफा किसी पार्टी या नेता के पक्ष में लहर दिखाई जा सकती है या दूसरे की छवि बिगाड़ी जा सकती है. ऐसे मतदाताओं को पक्ष में लाने के लिए मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सकता है - जो तय नहीं कर पा रहे कि अपना वोट किसे दें? देश के पूर्व चुनाव आयुक्त भी AI के दौर की चुनौतियों को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं.
अगर लोगों की सोच को डीपफेक के जरिए भ्रमित या गलत तरीके से प्रभावित करने की कोशिश हुई. तो फिर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कैसे संपन्न हो पाएगा? लोकतंत्र की जड़ें कितनी मजबूत रह पाएंगी?
सोशल मीडिया के विस्तार और AI की हर हाथ तक पहुंच ने माइक्रो टार्गेटिंग, टारगेटेड पब्लिक ओपिनियन और अपने पक्ष में माहौल के लिए खास कैंपेन चलाने का तरीका आसान और सस्ता बना दिया है. हमारे देश में होने वाले चुनावों में भी सोशल मीडिया और AI का असर साफ-साफ महसूस किया जा रहा है. अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है. उसमें लोगों को Voting Behaviour को प्रभावित करने में AI algorithm का बड़ी भूमिका निभाना तय माना जा रहा है. हमारे देश का चुनावी कानून सोशल मीडिया और AI से बहुत पहले का है. लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को AI के खतरे से बचाने के लिए एक मजबूत कानूनी कवच की भी जरूरत है. दूसरी ओर, दुनिया में उन देशों की ओर भी देखना होगा - जिन्होंने AI की मदद से अपने लोकतंत्र को मजबूत किया है. अफ्रीकी देश केन्या ने साल 2022 के चुनावों में AI को ड्यूटी पर लगाया. AI टूल्स की मदद से नफरती भाषण, दुष्प्रचार और ध्रुवीकरण के लिहाज से तैयार Online Content पर ब्रेक लगाने की कोशिश हुई.
चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. गलत और भ्रामक प्रचार पर ब्रेक के लिए AI Tools का इस्तेमाल होने लगा है.
साल 2022 में हुए केन्या आम चुनाव में लोगों को ध्रुवीकरण और दुष्प्रचार से बचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर AI का इस्तेमाल हुआ. इसके लिए मेंटेनिंग पीस थ्रू अर्ली वॉर्निंग, मॉनिटरिंग एंड एनालिसिस यानी MAPEMA को आगे किया गया. तकनीक की मदद से सोशल मीडिया पर फैलने वाले नफरती बोल और भ्रामक जानकारियों पर बाज की तरह नजर रखी गयी. जिससे वोटर बिना किसी दबाव और प्रभाव के पूरी तरह स्वतंत्र होकर मतदान से जुड़ा फैसला ले सकें.केन्या की आबादी में 85% से अधिक लोग धड़ल्ले इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. उनका सोशल मीडिया से भी गहरा जुड़ाव है. ऐसे में चुनाव में हेट - स्पीच पर नजर रखने के लिए AI का इस्तेमाल चौकस प्रहरी की तरह हुआ.
भारत में भी चुनाव आयोग AI से पैदा चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है. चुनाव आयोग ने अपनी मिथ वर्सेस रियलिटी मुहिम के जरिए वोटरों को Misinformation और Disinformation से बचाने की भी कोशिश की. AI कंटेंट को लेकर इलेक्शन कमीशन की एक गाइडलाइन भी है - जिसके मुताबिक अगर कोई सियासी दल अपने सोशल मीडिया हैंडल से गलत या भ्रामक AI कंटेंट पोस्ट या शेयर होता है. तो सूचना मिलने के 3 घंटे के भीतर उस कंटेंट को हटाना होगा. सियासी दलों से AI आधारित कैंपेन मेटेरियल से जुड़ा रिकॉर्ड रखने के भी कहा गया है - जिससे जरूरत पड़ने पर आयोग जांच-पड़ताल कर सके. प्रधानमंत्री मोदी ने AI इंपैक्ट शिखर सम्मेलन के मंच से साफ-साफ कहा कि डिजिटल कंटेंट पर आर्थेंटिसिटी लेबल होना चाहिए. जिससे असली और AI कंटेंट में फर्क किया जा सके.
केंद्र सरकार आईटी संशोधन नियम 2026 लागू कर चुकी है. नए नियमों के मुताबिक अगर किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई अवैध, भ्रामक या अश्लील डीपफेक कंटेंट पाया जाता है, तो कंपनी को उसे 3 घंटे के भीतर हटाना होगा. AI Tools से तैयार फोटो, वीडियो और ऑडियो पर AI Generated लिखना अनिवार्य कर दिया गया. ऐसे में नए नियमों के कड़ाई से लागू होने पर चुनावी मौसम में लोगों को गुमराह करने वाले कंटेंट से बचाना आसान होगा. वोटर आसानी से असली और नकली के बीच फर्क कर सकेंगे.
अभी हमारे देश के ज्यादातर नियम-कायदे एआई के दौर से बहुत पहले के हैं. चुनाव आयोग के नियम-कायदे भी पहले के हैं. ऐसे में एआई के दौर की चुनौतियों से निपटने के लिए नए तरह के कानूनों की जरूरत है. ऐसे तंत्र की जरूरत है - जो AI Tools की मदद से होने वाली बारीक से बारीक हेराफेरी को पकड़ सकें.
दलील दी जा रही है कि अगर AI बॉट की मदद से किसी के खिलाफ दुष्प्रचार किया जा सकता है. तो इस मुहिम में लगे लोगों की पहचान भी AI से संभव है. AI Tools की मदद से ऐसे सोशल मीडिया खातों की भी पहचान की जा सकती है - जो चुनावों के समय या दो-तीन दिन के भीतर बनाए गए हैं. Disinformation या Misinformation के केंद्र की पहचान भी AI की मदद से कुछ मिनटों में की जा सकती है. दुनिया भर के लोकतंत्र में इन दिनों एक खास तरह की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है. सत्ताधारी पार्टियां विरोधी सुर या विचारधारा को पूरी तरह खत्म करने पर आमादा है. वहीं, संसदीय लोकतंत्र में लोगों की अधिक से अधिक भलाई के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष की भूमिका को गाड़ी के दो पहिए की तरह देखा गया. ऐसे में फ्रीबीज के सहारे लोकतंत्र नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश हो रही है. उन योजनाओं का सोशल मीडिया के जरिए चुनावों में जमकर प्रचार होता है. तर्क है कि AI Tools सरकारी योजनाओं का फायदा आखिरी और योग्य लोगों तक पहुंचाने में बहुत मददगार साबित हो रहे हैं. Real Time Problems का Real Time Solutions निकालने में भी AI दमदार भूमिका निभा रहा है. जेनरेटिव AI Digital Divide भी तेजी से बढ़ा रहा है. इतिहास गवाह है कि किसी भी लोकतंत्र को तानाशाहों से ज्यादा खतरा आर्थिक असमानता और असंतोष से रहा है.
जेनरेटिव एआई ने दुनिया में तरक्की की रफ्तार को कई गुना तेज कर दिया है. दावा किया जा रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में इंसानों को काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, हर तरह का काम AI की शक्ति से लैस मशीने करेंगी. बेहतर Governance और Fast Delivery की राह भी AI की चाबी से खोलने का दावा किया जा रहा है.
एक अरब चालीस करोड़ आबादी वाले विशालकाय भारत की समस्याएं भी अलग-अलग तरह की है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कुरुंग तक विविधता वाले भारत में क्षेत्र के साथ समस्या का स्वरुप बदल जाता है. ऐसे में समाज के आखिरी आदमी को तरक्की और बदलाव की मुख्यधारा में लाने के लिए AI की ओर बड़ी उम्मीद से देखा जा रहा है. PM मोदी भारत के AI मॉडल से दुनिया का परिचय करा चुके हैं.
लोकतंत्र का मतलब है - ऐसी शासन व्यवस्था, जिसमें लोगों की बात सुनी जाए और लोगों के कल्याण के लिए अधिक से अधिक काम किया जाए. AI में भारत अपना भाग्य देख रहा है तो इस तकनीक से भयभीत होने वाले भी कम नहीं हैं. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानि UNDP की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि सही नीतियां नहीं बनाईं गईं तो AI दुनिया को जोड़ने की जगह अमीर-गरीब देशों के बीच खाई बड़ा कर सकता है. समाज के महा विभाजन की ओर धकेल सकता है. सामाजिक ताने बाने में एक ऐसा वर्ग होगा - जो AI की मदद से बहुत साधन संपन्न होगा. दूसरा एक ऐसा बड़ा वर्ग होगा जिसके पास अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी साधन नहीं होगा. ऐसे में दुनिया के सामने बड़ी चुनौती यही है कि ऐसा कौन सा रास्ता निकाला जाए - जिससे AI क्रांति का फायदा सबको बराबर मिले. AI के गलत इस्तेमाल को लेकर किसी तरह की भ्रांति के लिए कोई जगह न बचे.
AI न तो खुद लोकतंत्र को मजबूत करेगा और न ही खुद कमजोर. एआई से लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर, ये निर्भर करेगा इसके इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर. AI का सही तरीके से इस्तेमाल कर सिस्टम को पारदर्शी, जवाबदेह और लोक कल्याणकारी बनाया जा सकता है. शासन का फायदा आखिरी आदमी तक कई गुना तेजी से पहुंचाया जा सकता है. वहीं, अगर AI को बेलगाम छोड़ दिया गया - तो दुष्प्रचार, ध्रुवीकरण और अविश्वास को बढ़ा सकता है. AI ने झूठ की दुनिया भी बदल दी है. झूठ और सच में फर्क करना आम आदमी के लिए बहुत मुश्किल बना दिया है. औद्योगिक क्रांति से भी बड़े बदलाव की ओर दुनिया तेजी से बढ़ रही है. वो भी बहुत तेज रफ्तार से. इतनी तेज रफ्तार से कि हर इंसान को पूरी जिंदगी नया सीखने के लिए तैयार रहना होगा. AI में आते बदलावों के साथ जीने के लिए तैयार रहना होगा. अगर AI तकनीक का पूरी तरह से लोकतांत्रिकरण नहीं हुआ. अगर इसका फायदा आखिरी आदमी तक नहीं पहुंचा. इसके दुरुपयोग को रोकने का मजबूती कानूनी कवच तैयार नहीं हुआ. तो इंसानी सभ्यता के सामने बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. इंसान की तरह ही फैसला लेने में सक्षम जेनरेटिव AI से लैस मशीनें किस तरह इंसानों जैसा व्यवहार करने लगी है. इंसानों को धमकाने और ब्लैकमेल जैसे लक्षण मशीनों में भी महसूस किए गए है. ऐसे में AI मशीनें इंसान के कंट्रोल से बाहर न हों - इसका रास्ता भी ग्लोबल नॉर्थ हो ग्लोबल साउथ. दोनों ओर के हुक्मरानों और टेक टायकूंस को निकालना होगा. सब कुछ इंसान से है, इंसान के लिए है. ऐसे में तेजी से बदलती तकनीक के दौर में मशीनों की सीमा तय करना बहुत जरूरी है.