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भारत में अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ी या घटी, कितना बदला नौकरियों का तौर-तरीका?

जेनरेटिव एआई और ह्यूमनॉइड रोबोट के दौर में जॉब के लिए नए तरह की स्किल्स की जरूरत होगी . भले ही मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड एम्प्लॉयमेंट 2025 के आंकड़े दावा करते हैं कि 2017-18 से 2023-24 के बीच 16.83 नई नौकरियां जोड़ी गईं.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की टीम 2026-27 के लिए बजट तैयार करने के मिशन में जुटी है. देश का आम आदमी हिसाब लगा रहा है कि इस साल पेश होने वाले बजट से उसकी जिंदगी आसान होगी या मुश्किल. किसी भी मुल्क की अर्थव्यवस्था का मिजाज समझने में आंकड़े अहम भूमिका निभाते हैं . अर्थशास्त्री और हुक्मरान अपनी सहूलियत के हिसाब से आंकड़ों में बाजीगरी करते रहते हैं . लेकिन, क्या आंकड़ों की बाजीगरी से आम आदमी की जिंदगी पर कोई फर्क पड़ता है? क्या जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी के आंकड़े लोगों की खुशहाली की मुकम्मल तस्वीर बयां करते हैं ? पिछले कुछ वर्षों में लोगों को कितनी नौकरियां या रोजगार मिला? किस तरह का रोजगार मिला? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लोगों की नौकरी खाएगा या बेरोजगार बनाएगा? एआई के दौर में किस तरह की अर्थव्यवस्था आकार ले रही है ? ज्यादातर युवा किस काम में व्यस्त दिख सकते हैं? उस काम से उन्हें कितनी कमाई होगी? देश में उत्पादन बढ़ाने में युवा शक्ति किस तरह की भूमिका निभा रही है? तकनीक फर्स्ट वाली दुनिया में कितने लोग खुशहाल और कितने बेहाल होंगे?

Gross Domestic Product यानी GDP के लिहाज से देखा जाए तो दुनिया की 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत आता है . तीसरे नंबर पर पहुंचने के लिए तेज दौड़ लगा रहा है. GDP विकास दर के लिहाज से देखा जाए तो भारत की रफ्तार अमेरिका से कई गुना अधिक है . चीन, जापान, जर्मनी से भी बहुत अधिक है . लेकिन, प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देखा जाए तो दुनिया की 10 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत कहीं नहीं खड़ा होता. 25 में भी नहीं, 50 में भी नहीं, यहां तक कि 100 में भी नहीं. भारत की रैंकिंग 100 से भी नीचे चली जाती है . अब भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी स्थिति समझने के लिए एक दूसरे आंकड़े की मदद लेना भी जरूरी है. Global Inequality Report 2026 के मुताबिक, देश में सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के पास कुल दौलत का 65 प्रतिशत हिस्सा है, उसमें भी सिर्फ एक प्रतिशत के पास 40% हिस्सा है. देश के टॉप 10% लोगों की कमाई में हिस्सेदारी 58% है…वहीं, नीचे से यानी आर्थिक रूप से कमजोर 50% लोग मिलकर 15% कमाई कर पाते हैं. मतलब, पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह का आर्थिक विकास हुआ है – उसमें अमीर और अमीर होता चला गया…गरीब और गरीब होता गया . ऐसे में 2047 में जब भारत अपनी आजादी की 100वीं वर्षगांठ बना रहा होगा. विकसित भारत बनाने के लक्ष्य को जिस तरह आगे बढ़ाया जा रहा है. उसमें किस तरह के भारत की तस्वीर बनती दिख रही है . इसे जानना और समझना भी जरूरी है .

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भारत तेजी से बदल रहा है . शहर बदल रहे हैं . गांव बदल रहे हैं . लोगों का रहन-सहन बदल रहा है . दफ्तरों में नौकरियों का तौर- तरीका बदल रहा है . भारत तेजी से 2047 तक विकसित देशों की कतार में खड़ा होने के लिए दौड़ लगा रहा है . भारतीय बाजारों में चमक-दमक और खरीद-ब्रिकी के आंकड़ों के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं. कंजम्पशन अपग्रेड के मामले में भारत की गिनती दुनिया के सबसे लुभावने बाजारों में हो रही है . दलील ये भी दी जा रही है कि भारतीय अर्थव्यस्था बुनियादी जरूरतों से आगे निकल चुकी है .

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मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन ने साल 2025-26 में भारत की GDP विकास दर 7.4%रहने का अनुमान लगाया है . मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और सर्विस सेक्टर में आई तेजी को विकास दर बढ़ने की वजह माना जा रहा है. अब सवाल उठ रहा है कि साल 2047 यानी आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक भारत में किस तरह का विकास दिखाई देगा ? दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यानी 30.62 ट्रिलियन डॉलर वाली अमेरिकी की विकास दर 2% है . दूसरे. नंबर पर 19.4 ट्रिलियन डॉलर के साथ चीन है - जिसकी विकास दर 4.8% है . तीसरे नंबर पर जर्मनी की अर्थव्यवस्था है- जिसकी GDP 5.1 ट्रिलियन डॉलर है, जिसकी विकास दर 0.2% है . उसके बाद नंबर 4.18 ट्रिलियन डॉलर के साथ नंबर आता है भारत का…जिसकी विकास दर 6.6% रही . पांचवें नंबर पर जापान है - जिसकी GDP 4.1 ट्रिलियन डॉलर की है . जापान की ग्रोथ रेट 1.1% के आसपास रही . आर्थिक असमानता को लेकर जारी हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में आर्थिक विकास की सुनामी के बावजूद समाज में असमानता बढ़ी है.

सबसे ज़्यादा कमाने वाले 10 प्रतिशत लोग भारत की कमाई का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं..तो नीचे से गरीब 50% लोग सिर्फ 15% में सिमटे हैं. सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल दौलत का करीब 65% हिस्सा है… अकेले टॉप 1% लोगों के पास 40% दौलत है . मौजूदा ट्रेंड इशारा कर रहा है कि तेजी से बदलते दुनिया के अर्थतंत्र में हमारे देश में अमीर और अमीर हो रहा है…गरीब और गरीब . आंकड़ों के मुताबिक, साल 1951 से 1980 तक भारत की कुल आय में टॉप 10% अमीरों का हिस्सा 33 से 35% के बीच रहा … 1980 से 2000 के बीच टॉप 10% रईसों की कमाई में हिस्सेदारी 40% तक पहुंच गयी … जो अब 58%
हो चुकी है .

अगर कमाई में अमीरों की हिस्सेदारी बढ़ी है तो इसका मतलब ये भी निकलता है कि कमाई में गरीबों की हिस्सेदारी घटी है. आज की तारीख में दुनिया में सबसे अधिक युवा भारत में हैं . लेकिन, एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि हमारी युवा शक्ति में से एक बड़ा वर्ग ऐसा है - जिसके पास उसकी डिग्री के हिसाब से काम नहीं है. कमाई नहीं है. एक बड़ा वर्ग ऐसा है- जिसके पास सिर्फ नाम का रोजगार है . दुनिया में सबसे अधिक युवा भारत में हैं . भारत अपनी विशालकाय युवा शक्ति का कितना फायदा ले पा रहा है–इसे अर्थशास्त्री अपनी-अपनी लेंस से देखने और समझने की कोशिश करते हैं . हमारे सामाजिक ताने-बाने के भीतर कैसी स्थिति बन रही है ? इसे सिर्फ आंकड़ों को जरिए नहीं समझा जा सकता है . आंकड़ों के जरिए समझना ठीक तरह से होगा जैसे 100 डिग्री तापमान को दो हिस्सों में बांटते हुए औसत की स्थिति को देखना – अगर व्यक्ति का एक पैर 100 डिग्री तापमान वाले हिस्से में पड़ेगा…तो जलना तय है. दूसरा पैर अगर जीरो डिग्री तापमान वाले हिस्से में रहेगा … तो बर्फ में पैर का जमना तय है . लेकिन, दोनों पैरों के बीच तापमान का औसत निकाला जाए..स्थिति भयावह नहीं दिखाई देगी. क्योंकि, 50 डिग्री तापमान में न जलने का खतरा होता है…न जमने का . हमारे समाज में आर्थिक असमानता इस कदर बढ़ती जा रही है– जिसमें एक वर्ग ऐसा तैयार हो गया – जिसके पास आर्थिक जरूरतों से कई गुना अधिक दौलत है . दूसरा वर्ग ऐसा है – जिसे अपनी भूख मिटाने के लिए भी सरकार की ओर से हर महीने मिलने वाले 5 किलो मुफ्त अनाज समेत दूसरी मुफ्त की सरकारी योजनाओं की ओर देखना पड़ता है .

2020 में शुरू हुई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 81 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन मिल रहा है…2019 में शुरू पीएम किसान सम्मान निधि के तरह 11 करोड़ से अधिक किसानों को सालाना 6000 रुपये कैश ट्रांसफर हो रहा है ..2016 में शुरू उज्ज्वला योजना के तहत 10.33 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त LPG कनेक्शन मिले . केंद्र और राज्य सरकारों की ऐसी कई योजनाएं जारी हैं- जो समाज के गरीब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी आसान बनाने में मददगार साबित हो रही हैं . तकनीकी विकास के आंधी-तूफान के बीच … जिस रफ्तार से अर्थव्यवस्था का चक्र चल रहा है..उसका आर्थिक रूप से संपन्न लोग अधिक फायदा उठा रहे हैं . हमारे सामाजिक ताने-बाने में एक ऐसा वर्ग भी तेजी से बढ़ता दिख रहा है..जो खाली हाथ है, जो अपनी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकारी मदद की ओर देखने को मजबूर है .

बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश सरकार ने एक ऐसी योजना शुरू की, जिससे सूबे की डेढ़ करोड़ से अधिक महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रूपये कैश ट्रांसफर हुए …बिहार में सामाजिक सुरक्षा पेंशन 400 से बढ़ाकर 1100 रुपये कर दिया गया . महाराष्ट्र और झारखंड में भी महिलाओं को हर महीने कैश देने वाली योजनाएं चल रही हैं . ऐसे में सवाल उठ रहा है कि एक ओर चमकता-दमकता भारत…दूसरी ओर मुफ्त सरकारी योजनाओं के भरोसे बड़ी आबादी की जिंदगी … क्या इसी विकास मॉडल के सहारे भारत विकसित देशों की कतार में पहुंचेगा ?

पिछले कुछ वर्षों से भारत में एक ऐसा वर्ग तैयार करने पर जोर है- जो नौकरी मांगने वाला नहीं, नौकरी देनेवाली सोच के साथ आगे बढ़ रहा है . नौकरी और रोजगार दोनों को अलग चश्मे से सरकार भी देख रही है और सामान्य युवा भी..इसलिए, चुनावों में अब राजनीतिक दल बहुत चतुराई से नौकरियां देने की जगह रोजगार पैदा करने का वादा करते हैं… माइक्रो क्रेडिट लोन की सरकारी योजनाएं रोजगार पाने वालों का आंकड़ा दुरूस्त कर देती हैं . लेकिन, ऐसी योजनाओं से किस तरह का और कितना रोजगार पैदा होता है…लोगों की जिंदगी कितनी खुशहाल होती है, इसे सभी अपने-अपने चश्मे से देखते हैं ?

एक स्टडी बताती है कि 2047 तक भारत में प्रति व्यक्ति आय करीब सात गुना बढ़ जाएगी मतलब प्रति व्यक्ति कमाई करीब 15 लाख रुपये होगी…लेकिन, सवाल यही है कि क्या सबकी कमाई बढ़ेगी या सिर्फ समाज के मुट्ठीभर लोगों की . समाज के आखिरी आदमी का जीवन स्तर भी उसी अनुपात में सुधरेगा… जिस अनुपात में समाज के धनकुबेरों का भी ? विकसित भारत में गरीब-अमीर के बीच की खाई कम होगी या और चौड़ी ?

एक ओर 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य…देश की अर्थव्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े आंकड़े और दूसरी ओर हर महीने मुफ्त अनाज. महिलाओं को हर महीने कैश मदद…गरीब किसानों के खाते में समय-समय पर कैश ट्रांसफर… बुढ़ापे में सामाजिक सुरक्षा पेंशन के नाम पर कैश ट्रांसफर. क्या विकसित भारत बनाने का मिशन और फ्रीबीज के सहारे राजनीति दोनों साथ-साथ चलेंगे ? करीब डेढ़ साल पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी से मैंने इंटरव्यू में फ्रीबीज को लेकर सवाल पूछा था . बिना लाग-लपेट उन्होंने कहा था कि फ्रीबीज खत्म करना सबकी जिम्मेदारी है. लेकिन, क्या फ्रीबीज को खत्म करने के लिए राजनीतिक दलों ने आपस में कोई बात की..सरकार की ओर से इसे लेकर कोई बड़ी पहल हुई? हाल में हुए चुनाव इशारा कर रहे हैं कि फ्रीबीज कल्चर हमारी लोकतंत्रीय व्यवस्था में मजबूत होता जा रहा है . कुछ हफ्ते पहले दुनिया के दिग्गज टेक टायकून एलन मस्क ने दावा किया कि अगले 10-20 वर्षों में इंसानों के सभी काम रोबोटिक्स करेंगे . इससे भविष्य में गरीबी खत्म हो जाएगी… लोगों को पैसे बचाने की जरूरत नहीं होगी. एआई से एक ऐसी दुनिया का निर्माण होगा– जिसमें हर इंसान को यूनिवर्सल हाई इनकम मिलेगी. लेकिन, ये भी आशंका जताई जा रही है कि तकनीक,एआई और रोबोटिक्स की वजह से दुनिया में आर्थिक असमानता बढ़ेगी . नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक सेक्टर जो आज की तारीख में 80 लाख लोगों को रोजगार देता है… एआई की वजह से करीब 20 लाख नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं . लेकिन, एआई से 40 लाख नई नौकरियां भी पैदा होने का अनुमान है. एक दूसरी स्टडी बताती है कि 2030 तक देश में दो से ढाई करोड़ नौकरियां खतरे में हैं. खासतौर से मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल और फाइनेंस सेक्टर में .

एक अरब 40 करोड़ आबादी वाले भारत में शायद ही कोई ऐसा सेक्टर बचा हो…जिसमें कम या अधिक AI का इस्तेमाल नहीं हो रहा हो…बड़े उद्योग ही नहीं लघु उद्योगों में भी AI की मदद से उत्पादन बढ़ाने की स्क्रिप्ट आगे बढ़ाई जा रही है . AI को लेकर समाज के एक बड़े वर्ग में गलतफहमी है कि ये नौकरियां खत्म करेगा . लेकिन, सच्चाई ये है कि AI नौकरियां खत्म करने की जगह उनकी प्रवृति में ज्यादा बदलाव करेगा . कुछ नौकरियां खत्म करेगा … तो नई तरह की नौकरियां पैदा भी करेगा . Global Job Market में तेजी से बदलता ट्रेंड इशारा कर रहा है कि AI स्पेशलिस्ट … डेटा साइंटिस्ट, प्रॉम्प्ट इंजीनियर जैसी हाई सैलरी वाली नौकरियां तेजी से बढ़ रही है . एआई तेजी से नौकरियों को बदल रहा है … लेकिन, ज्यादा रिपिटिटिव और लो स्किल जॉब्स पर खतरा है .

साल 2020-21 में भारत में गिग वर्कर्स की संख्या करीब 77 लाख थी…जो देश की कुल वर्क फोर्स में डेढ़ फीसदी है . साल 2024-25 दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में 1.2 करोड़ गिग वर्कर्स का अनुमान लगाया गया…जो 2% के आसपास रहा . साल 2029-30 तक भारत में गिग वर्कर्स की संख्या 2.35 करोड़ पहुंचने की उम्मीद है..जिसकी वर्कफोर्स में हिस्सेदारी 4% तक पहुंच सकती है . अर्थशास्त्रियों की दलील है कि गिग वर्कर्स के सामने हमेशा विकल्प खुला होता है कि कितना काम करना है और कब काम करना है? काम के हिसाब से कमाई तय होती है…नौकरी का ये मॉडल युवाओं को खासा पसंद आ रहा है . एक अनुमान के मुताबिक राइड-हैलिंग कंपनी Uber के साथ भारत में करीब 14 लाख ड्राइवर जुड़े हैं . इसी सेक्टर से जुड़ी OLA के नेटवर्क में करीब 10 लाख ड्राइवर हैं . Swiggi के 4.5 लाख डिलीवरी पार्टनर हैं तो Zomato और Blinkit जैसे क्विक कॉमर्स ब्रांड के करीब 7 से 8 लाथ एक्टिव डिलीवरी पार्टनर हैं .

गिग वर्कर्स को कंपनियों से लेकर कस्टमर तक जोड़ने तकनीक बड़ी भूमिका निभा रही है. ऐसे में AI से गिग इकोनॉमी कितनी बढ़ेगी या घटेगी…इसके स्वरूप में किस तरह का बदलाव होगा.इसे लेकर अलग-अलग अनुमान लगाए जा रहे हैं . एक सच्चाई ये भी है कि ऊंची डिग्री होने के बावजूद जब युवाओं को योग्य नौकरी नहीं मिलती…तो शहरों में गिग इकॉनॉमी के घुमते चाक से अपने लिए कमाई का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं .

जेनरेटिव एआई कितनों को बेरोजगार करेगा और कितनी नई नौकरियां पैदा करेगा? इस सवाल का जवाब टेक-टाइकून और अर्थशास्त्री अपने-अपने तरीके से तलाशने की कोशिश कर रहे हैं . लेकिन, एक बात तय है कि AI का जितना अधिक विस्तार होगा…नौकरियों के स्वरूप में उतना ही बदलाव होगा. जेनरेटिव एआई और ह्यूमनॉइड रोबोट के दौर में जॉब के लिए नए तरह की स्किल्स की जरूरत होगी . भले ही मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड एम्प्लॉयमेंट 2025 के आंकड़े दावा करते हैं कि 2017-18 से 2023-24 के बीच 16.83 नई नौकरियां जोड़ी गईं. लेकिन, एक बड़ी सच्चाई ये भी है कि भारत की युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा खाली हाथ बैठा है… ज्यादातर के पास स्कूल-कॉलेज से पास आउट होने के बाद ऐसी डिग्री है – जो जॉब मार्केट में उसे नौकरी दिलाने में बहुत मददगार साबित नहीं हो रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि भारत की खाली हाथ बैठी युवा शक्ति क्या कर रही है? एक दौर था जब युवाओं को कहीं नौकरी नहीं मिलती थी – तो खाली बैठने की जगह खेती-बाड़ी के काम में जुट जाता था . मतलब, अनाज उत्पादन के काम में लग जाता था . पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाने में अपनी शक्ति लगता था. लेकिन, इंटरनेट ने युवाओं की सोच और संस्कार बदल दिए हैं. अगर पढाई और डिग्री के हिसाब से नौकरी नहीं मिल रही–तो ज्यादातर युवाओं को डिजिटल क्रिएटर के तौर पर करियर ऑप्शन दिख रहा है . यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम ने युवाओं को व्यस्त रहने का एक नया रास्ता दिखा दिया है . कुछ का वक्त वीडियो और रील बनाने में कट रहा है … तो बड़ी आबादी का वीडियो और रील देखने में . ये आज के भारत का शौक भी है और रोजगार भी . इंटरनेट संस्कृति ने हमारे सामाजिक ताने-बाने में Influencer नाम की नई जमात पैदा हो गई है.

दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले भारत में फेसबुक यूजर्स की संख्या 38.4 करोड़ है… वहीं, यूट्यूब यूजर्स 49.1 करोड़ हैं. शहर से लेकर गांव तक सोशल मीडिया लोगों का सबसे सस्ता मनोरंजन का साधन बन चुका है … स्मार्ट फोन सबसे करीबी दोस्त और रिश्तेदार बन चुका है. कुछ जानने और समझने के लिए गुरू और गाइड बन चुका है…भारत में युवाओं को कमाई का सबसे आसान जरिया भी यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म में दिख रहा है . सोशल मीडिया ने एक तरह से समाज के आखिरी व्यक्ति को आवाज बुलंद करने के लिए मंच दिया है…तो पढ़े-लिखे युवाओं को इन्फ्लुएंसर बनने की राह दिखाई है . डिजिटल क्रिएटर के तौर पर नया करियर विकल्प दिया है…लेकिन, एक सच्चाई ये भी है कि कमाई के लिहाज से सक्सेस रेट बहुत अधिक नहीं है .

शहर से गांव तक ऐसे पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या बड़ी है - जिनके पास नौकरी या रोजगार नहीं है . ऐसे में खाली हाथ बैठी युवा शक्ति के पास दो काम बचते हैं - एक, शॉट्स-रिल्स, वीडियो देखना और दूसरा बनाना . इसके लिए लागत के नाम पर इंटरनेट से लैस एक स्मार्टफोन की जरूरत होती है . ऐसे में बेरोजगार युवाओं को रोजगार के नाम पर डिजिटल क्रिएटर बनने का विकल्प दिखता है…जिसमें हर क्रिएटर इस उम्मीद के साथ रोजाना घंटों मेहनत करता है कि बिना संघर्ष के कुछ नहीं मिलता…लगे रहे तो मंजिल दूर नहीं . ऐसे में सपनों के घोड़े पर सवार क्रिएटर्स करोड़ों में कमाई का सपना देखते हैं. दूसरी ओर, गिनती के यूट्यूब चैनलों को छोड़ दिया जाए तो सच्चाई ये है कि भारत में एक्टिव यूट्यूब चैनलों में 10 लाख से भी कम ऐसे हैं - जो हर महीने कुछ कमाई कर पाते हैं .

भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन, हमारी युवा शक्ति की क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है…रोजगार और भविष्य के नाम पर ज्यादातर युवाओं को डिजिटल क्रिएटर्स के तौर पर संभावना दिख रही है. ऐसे में अगर अगले 21 वर्षों में भारत को विकसित राष्ट्रों की कतार में खड़ा करना है – तो राह निकालनी होगी, जिससे सभी क्षेत्रों में उत्पादन प्रक्रिया से युवा शक्ति जुड़े . युवाओं के मन से AI का खौफ निकालना होगा… तकनीक को दुश्मन की तरह नहीं दोस्त की तरह देखना होगा. अगर हम सही मायनों में 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं. भारत को दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र और बुलंद गणतंत्र बनाए रखना चाहते हैं … तो हमें Skill First Economy पर फोकस करना होगा . तेजी से बदलती AI First World Order वाले JOB MARKET में DYNAMIC और FAST LEARNER PROFESSIONALS की जरूरत होगी . ऐसे में आने वाले समय में दो तरह के Educational Institutions की जरूरत होगी…एक जो दुनिया में तेजी से होते बदलावों के हिसाब से Workforce तैयार करें और दूसरे Active Work Force को क्रैश कोर्स के जरिए हर तीन-चार साल में अपग्रेड और अपडेट कर सकें. आज की तारीख में दुनियाभर में करीब साढ़े तीन करोड़ से अधिक भारतीय मूल के लोग फैले हैं…ये संख्या कई गुना बढ़ सकती है. ऐसे में युवा आबादी को बिना देश के प्रोडक्शन इकोसिस्टम का हिस्सा बनाए – समतामूलक, समरस और संपन्न राष्ट्र बनाना मुश्किल है. अगर हर हाथ को उसकी क्षमता के हिसाब से काम नहीं मिलेगा – तो 2047 तक जीडीपी के आंकड़ों में भारत चाहे जितना बड़ा दिखे… प्रति व्यक्ति आय का ग्राफ चाहे जितना ऊपर जाए … लेकिन, समाज में गरीब-अमीर के बीच खाई और चौड़ी होगी. ऐसे में दुनिया में तेजी से होते बदलावों के हिसाब से एक ऐसी राह चुननी होगी–जिसमें समाज के आखिरी व्यक्ति की भी उत्पादन में भागीदारी सुनिश्चित कराई जा सके .

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