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बजट 2026… 'मदर ऑफ ऑल डील्स' और ट्रंप टैरिफ के बीच अग्निपरीक्षा, क्या खाली जेब और महंगाई से मिलेगी राहत?

भारत ही नहीं पूरी दुनिया की नजरें वित्त मंत्री के बजट भाषण पर टिकी है. इस बार वो किस चौंकाने वाले विचार के साथ आती हैं – जिसे इतिहास वर्षों याद रखेगा या फिर एक ऐसा बजट आएगा – जिसे समाज का हर तबका अपने-अपने हिसाब से डिकोड करेगा.

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कहते हैं अर्थ बिना सब व्यर्थ. एक अरब चालीस करोड़ आबादी वाले विशालकाय भारत से ज्यादातर लोग चिंतित हैं. परेशान हैं. कोई अपने वर्तमान को लेकर… कोई अपने भविष्य को लेकर… कोई महंगाई को लेकर… कोई कम कमाई को लेकर. ऐसे में हमारे देश के ज्यादातर लोगों की नजर एक महिला के फैसले पर टिकी है… जो देश के वित्त मंत्री की कुर्सी संभाल रही हैं, जो लगातार 9वीं बार बजट पेश करेंगी. उन्हें लोग निर्मला सीतारमण के नाम से जानते हैं. उनके बजट भाषण का इंतजार पूरा देश बहुत बेसब्री से कर रहा है. उनकी बजट की पोटली से अपने लिए कुछ-न-कुछ राहत की उम्मीद कर रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी राह चुनने की है – जिससे 2047 तक भारत को विकसित देशों की कतार में खड़ा किया जा सके. संसद में पेश Economic Survey 2026 में तमाम वैश्विक चुनौतियों और उथल-पुथल के बीच देश की अर्थव्यवस्था की चमकदार तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है. साल 2025-26 के लिए GDP ग्रोथ रेट 7.4% बताई गई, तो अगले साल के लिए 6.8 से 7.2% GDP ग्रोथ रेट का अनुमान लगाया गया है. देश की आर्थिक सेहत का हाल बयां करने वाले Economic Survey में 56 करोड़ से अधिक लोगों के पास रोजगार होने का दावा किया गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि देश के 56 करोड़ से अधिक लोगों के पास रोजगार है – तो फिर 81 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त राशन देने की जरूरत क्यों पड़ रही है? देश के 11 करोड़ से अधिक किसानों को सालाना 6 हजार रुपये देने की जरूरत क्यों पड़ रही है? देश की बड़ी आबादी के सामने मुफ्त सरकारी योजनाओं की ओर देखने की मजबूरी क्यों है? Economic Survey में आखिर सरकारी कंपनी की परिभाषा बदलने की बात क्यों कही गयी है? क्या पैसा जुटाने के लिए केंद्र सरकार सरकारी कंपनियां बेचने की राह आसान बनाने में जुटी है? हमारे सामाजिक ताने-बाने में आर्थिक असमानता की खाई दिनों-दिन चौड़ी क्यों होती जा रही है? बड़ी आबादी खाली हाथ और खाली जेब जैसी स्थिति क्यों महसूस कर रही है? दुनियाभर में मची उथल-पुथल और टेंशन के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी ग्रोथ रेट बरकरार रखने के लिए किस फार्मूले को अपनाएगी? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट में कौन सी ऐसी राह चुनेंगी, जिससे भारत के आखिरी आदमी की जेब में पैसा जाएगा और विकसित भारत बनाने की राह में उसकी भागीदारी सुनिश्चित होगी?

Economic Survey के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत कितनी तंदुरुस्त है? Economic Survey में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ रेट 6.8 से 7.2% के बीच रहने की भविष्यवाणी की गई है. ये सब अमेरिका के 50% टैरिफ बोझ के बाद हो रहा है. इसी हफ्ते भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए करार को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है. इससे 200 करोड़ लोगों का मार्केट बनेगा. अब हिसाब लगाया जा रहा है कि क्या भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच डील से ट्रंप टैरिफ की काट निकल गयी है? क्या अमेरिका के 50% टैरिफ से हुए कारोबार घाटा को यूरोपीय यूनियन के साथ डील में पूरा हो जाएगा? ऐसे कई सवालों पर अर्थशास्त्री लगातार गुना-भाग कर रहे हैं. लेकिन, Economic Survey 2025-26 में एक और बात की ओर इशारा किया गया है. सरकारी कंपनियों की परिभाषा बदलने का सुझाव दिया गया है. सरकारी कंपनी की परिभाषा बदलकर न्यूनतम हिस्सेदारी 51 से घटाकर 26 फीसदी किया जा सकता है. इससे सरकार को सरकारी कंपनियों के शेयर बेचकर फंड जुटाने की राह आसान होगी.

देश का ध्यान बजट की ओर होना स्वभाविक है. लेकिन, इस सरकार की पहचान रही है रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफॉर्म… अब हम रिफॉर्म एक्सप्रेस पर चल पड़े हैं. उत्तर में कश्मीर से दक्षिण कन्याकुमारी तक. पश्चिम में कच्छ से पूर्व में दिबांग घाटी तक लोग हिसाब लगा रहे हैं कि रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफॉर्म वाली आबोहवा में उनकी जिंदगी कितनी खुशहाल हुई. संसद में पेश आर्थिक सर्वे के आंकड़े बता रहे हैं कि तमाम झंझवातों के बाद भी देश की GDP बढ़ रही है.

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  • साल 2021-22 में GDP ग्रोथ 8.7%
  • साल 2022-23 में GDP ग्रोथ 7.2%
  • साल 2023-24 में GDP ग्रोथ 8.2%
  • साल 2024-25 में GDP ग्रोथ 6.5%
  • साल 2025-26 में GDP ग्रोथ 7.3% (अप्रैल से दिसंबर तक के आंकड़े)
  • साल 2026-27 में GDP ग्रोथ 6.8% से 7.2% (अनुमान)

आंकड़े बता रहे हैं कि टैक्स कलेक्शन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. राजकोषीय घाटा कम हो रहा है. मंदी की आहट के बीच भी भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब देश की आर्थिक सेहत तंदरूस्त है तो फिर सरकारी कंपनियों की परिभाषा बदलने की सिफारिश इकोनॉमिक सर्वे में क्यों की गई है? संसद में पेश इकोनॉमिक सर्वे में सरकारी कंपनियों की परिभाषा में बदलाव का मशवरा दिया गया है. इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, 51% की जगह 26% हिस्सेदारी होने पर कंपनी को सरकारी माना जा सकता है.

दलील दी जा रही है कि इससे उन कंपनियों से सरकार को बाहर निकलने में सहूलियत होगी – जिनमें निवेश फायदे का सौदा नहीं समझा जा रहा है. इतना ही नहीं, इससे सरकारी कंपनियों को प्रोफेशनल हाथों में देने में मदद मिलेगी. कम हिस्सेदारी के बाद भी सरकार ऐसी कंपनियों के बड़े फैसलों में अपना दखल बरकरार रख सकती है.

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आज की तारीख में करीब 30% सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 60% से कम है. इकोनॉमिक सर्वे में ये भी कहा गया है कि बिना सरकारी कंपनियों की परिभाषा में बदलाव के भी सरकार अपनी हिस्सेदारी कम कर सकती है. साल 2016 से अब तक 36 सरकारी कंपनियों को बेचने या प्राइवेटाइजेशन को हरी झंडी मिल चुकी है. इसमें से 13 कंपनियों की डील पूरी हो चुकी है. बाकी कंपनियां डील पूरी होने की प्रक्रिया में हैं. सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर सरकार फंड जुटाने की प्रक्रिया को लंबे समय से आगे बढ़ाने जुटी है.

साल 2022-23 में 65,000 करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य रखा गया. बाद में घटाकर 50,000 करोड़ रुपये किया गया. लेकिन, 47.8% टारगेट ही हासिल हुआ. साल 2023-24 में विनिवेश के जरिए 51,000 करोड़ जुटाने का लक्ष्य रखा गया, जिसे बाद में घटाकर 30,000 करोड़ किया गया, पर 28.6% का लक्ष्य ही हासिल हो पाया. 2024-25 में 50,000 करोड़ जुटाने का टारगेट सेट किया गया, जो पूरा नहीं हुआ. इसी तरह 2025-26 में विनिवेश के जरिए 47,000 करोड़ जुटाने का लक्ष्य रखा गया. लेकिन, ये भी पूरा होता नहीं दिख रहा है.

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अगर आम बोलचाल की भाषा में कहें तो सरकार ने लिस्टेड सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने का रास्ता और आसान बनाने की तैयारी कर ली है. परिभाषा में बदलाव के बाद सरकार लिस्टेड कंपनियों में अपना अधिकार रखते हुए हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटा सकती है. साल 2025-26 में केंद्र सरकार ने विनिवेश के जरिए 47 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया था. बजट सत्र के शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने बिना लाग-लपेट कहा कि केंद्र रिफॉर्म एक्सप्रेस पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, तो क्या रिफॉर्म एक्सप्रेस की एक झलक कुछ घंटे बाद पेश होने वाले बजट में दिखाई देगी? आंकड़ों से इतर देश का आम आदमी आखिर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से क्या उम्मीद कर रहा है? उनके बजट भाषण में क्या सुनना चाहता है? अपने लिए क्या उम्मीद कर रहा है? इसे भी देखना-समझना जरूरी है.

पटना की महिलाएं देश की वित्त मंत्री की ओर बड़ी उम्मीद के साथ देख रही हैं. लोगों को लग रहा है कि सरकार गरीबों का तो ख्याल रख रही है. लेकिन, महंगाई की मार तो मिडिल क्लास झेल रहा है. भले ही इकोनॉमिक सर्वे के आंकड़े बता रहे हों कि पिछले एक दशक में लोगों की निवेश आदतों में बड़ा बदलाव आया है. घरेलू बचत में इक्विटी का हिस्सा बढ़ा है, लेकिन, कमाई और महंगाई में ऐसी रेस लगी है – जिसमें पिछली बचत भी निकालनी पड़ रही है. इसी तरह अलीगढ़ के छोटे-कारोबारी भी बजट में वित्त मंत्री से बड़ी आस लगाए बैठे हैं.

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ये देश का आम आदमी है – जो आंकड़ों की बाजीगरी नहीं समझता. जिसके लिए दुनिया के मंचों पर चल रही सौदेबाजी और बिजनेस डील खास मायने नहीं रखती हैं – जो सरकार के फैसलों से राहत और मुश्किल दोनों सीधा महसूस करता है, जो अपनी छोटी-मोटी दुकान चलाता है, जो खेतों में काम करता है.

अब सवाल ये उठता है कि जब आंकड़ों में इतनी तेज विकास दर दिखाई दे रही है-तो फिर देश का आम आदमी परेशान क्यों है? पैसा आखिर कहां जा रहा है? तेज रफ्तार विकास दर का फायदा किसे मिल रहा है?

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गुजरात के मोरबी शहर की एक पहचान वहां की टाइल्स इंडस्ट्री की वजह से है. वहां के कारोबारियों की सोच है कि अगर सरकार टाइल्स पर जीएसटी 18 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दे – तो इससे न सिर्फ टाइल्स उद्योग को रफ्तार मिलेगी बल्कि आम आदमी के लिए घर बनाना सस्ता होगा.

1 अरब 40 करोड़ लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होता, हर सेक्टर की वित्त मंत्री से अपनी मांग है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का हर नागरिक अपने-अपने तरीके से बजट में राहत की उम्मीद कर रहा है. लेकिन, एक सच्चाई ये भी सरकार पर सामाजिक योजनाओं और कैश ट्रांसफर योजनाओं को जारी रखने का बहुत दबाव है.

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केंद्र सरकार को सामाजिक योजनाओं पर चालू वित्त वर्ष में करीब 28 लाख करोड़ रूपये खर्च करना है, जो सालाना 12% की रफ्तार से बढ़ रहा है. इसी तरह शिक्षा पर 2025-26 में 9.8 लाख करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है. स्वास्थ्य पर सरकार का खर्चा 6.3लाख करोड़ तक जा सकता है. प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित देशों की कतार में खड़ा करने का टारगेट सेट किया है.

ऐसे में विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बजट में एक ऐसा रास्ता निकालने की जरूरत है-जिससे हर सेक्टर में प्रदर्शन लगातार बेहतर हो. एक ऐसा रास्ता बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने निकालने की चुनौती है – जिससे लोगों की जेब में ज्यादा पैसा पहुंचे और घरेलू मांग बढ़े. तरक्की आंकड़ों में भी दिखे और आम आदमी की जिंदगी में भी.

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भारत का आम आदमी एक ऐसे बजट की उम्मीद कर रहा है – जिससे उसकी रोजमर्रा की मुश्किलें कम हों. महंगाई से उसे राहत मिले, खाने-पीने की चीजें सस्ती हों, प्राइवेट स्कूलों में फीस की लिमिट तय हो, आयुष्मान कार्ड में उम्र सीमा घटाई जाए, छोटे दुकानदारों की अलग चिंता है. देश के किसान चाहते हैं कि उनकी आमदनी में बढ़ोतरी का रास्ता बजट में निकले, नौकरीपेशा वर्ग इनकम टैक्स में छूट चाहता है. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोगों की उम्मीदों को किस तरह पूरा करेंगी? भले ही Economic Survey में 56 करोड़ से अधिक लोगों के पास रोजगार होने का दावा किया गया है, लेकिन, एक सच्चाई ये भी है कि देश की बड़ी आबादी बहुत कम कमाती है, जिसमें उसका गुजर-बसर बड़ी मुश्किल से होता है. विश्व आर्थिक असमानता रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कुल कमाई का करीब 58 फीसदी हिस्सा टॉप 10 फीसदी लोगों के खाते में जाता है. वहीं, नीचे से 50 फीसदी लोगों की हिस्सेदारी देश की कमाई में सिर्फ 15% है. अब सवाल उठता है कि क्या वित्त मंत्री बजट में कोई रास्ता निकालेंगी – जिससे आखिरी आदमी की कमाई बढ़ाई जा सके, उसे एक ऐसा रास्ता दिखाया जा सके, ऐसी ट्रेनिंग दिखाई जा सके, जिससे विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में उसकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके.

आर्थिक असमानता को लेकर जारी हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में आर्थिक विकास की तेज रफ्तार के बावजूद समाज में असमानता बढ़ी है.

सबसे ज्यादा कमाने वाले 10 प्रतिशत लोग भारत की कमाई का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं, तो नीचे से गरीब 50% लोग सिर्फ 15% में सिमटे हैं. सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल दौलत का करीब 65% हिस्सा है. अकेले टॉप 1% लोगों के पास 40% दौलत है.

मतलब, तेजी से बदलते दुनिया के अर्थतंत्र में हमारे देश में अमीर और अमीर हो रहे हैं, गरीब और गरीब. यही वजह है कि देश की बड़ी आबादी का गुजर-बसर मुफ्त की सरकारी योजनाओं के सहारे हो रहा है.

2020 में शुरू हुई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 81 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन मिल रहा है. 2019 में शुरू हुई पीएम किसान सम्मान निधि के तरह 11 करोड़ से अधिक किसानों को सालाना 6000 रुपये कैश ट्रांसफर हो रहा है. 2016 में शुरू हुई उज्ज्वला योजना के तहत 10.33 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त LPG कनेक्शन मिले.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने एक ऐसा बजट पेश करने की चुनौती है- जो हमारे सामाजिक ताने-बाने में आर्थिक समानता कम करने की राह खोलता हो. आज की तारीख में दुनिया में सबसे अधिक युवा भारत में हैं. लेकिन, हमारी युवा शक्ति में से एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है-जिसके पास उसकी डिग्री के हिसाब से काम नहीं है… जिसके पास सिर्फ नाम का रोजगार है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अपने बजट में एक ऐसी राह निकालनी होगी- जिससे दुनिया में होते तकनीकी बदलाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर की जरूरतों के हिसाब से वर्क फोर्स को ट्रेंड, अपडेड और अपग्रेड किया जा सके. उसके लिए बड़े पैमाने पर संस्थान खोले जा सकें. कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस में ऐसे युवाओं को तैयार करने का रास्ता खोलना होगा – जिनमें घरेलू और वैश्विक श्रम बाजार की जरूरतों हिसाब से युवाओं को तैयार किया जा सके.

आजादी के 78 साल बाद भी भारत की आबादी में हर दूसरे शख्स की रोजी-रोटी और रोजगार का आधार खेती है. बढ़ती आबादी के साथ दिनों-दिन खेतों का आकार छोटा हो रहा है.

किसानों की औसत आय के आंकड़े विकसित भारत की राह में बड़े स्पीडब्रेकर की तरह हैं. ऐसे में बड़ी वर्कफोर्स को खेती से निकालकर दूसरे सेक्टर में शिफ्ट करने की जरूरत है. साथ ही खेतों में आधुनिक तकनीक की मदद से अधिक पैदावार और कमाई की राह आम बजट में सब्सिडी और सहूलियत के जरिए खोलने की दरकार महसूस की जा रही है.

बिना आखिरी आदमी को देश की तरक्की की रफ्तार में जोड़े विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं है. भारत को विकसित देशों जैसी प्रति व्यक्ति आय के स्तर तक पहुंचने के लिए बहुत तेज दौड़ लगाने की जरूरत है. ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बजट में ऐसी राह निकालनी होगी – जिससे हर आदमी को रोजगार मिले. हर व्यक्ति की जेब में पैसा जाए, उसकी कमाई बढ़े. मुफ्त की सरकारी योजनाओं को चलाने की जरूरत ही न पड़े.

आंकड़ों के जरिए चाहें जितनी बुलंद तस्वीर दिखाने की कोशिश की जा जाए, लेकिन, जब तक समाज के आखिरी व्यक्ति को रोजगार नहीं मिलेगा, उसकी कमाई नहीं बढ़ेगी, उसकी जिंदगी की गाड़ी मुफ्त सरकारी योजनाओं के भरोसे आगे बढ़ती रहेगी, सरकारी कैश ट्रांसफर का इंतजार होता रहेगा, तब तक विकसित भारत बनाना मुश्किल है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अर्थशास्त्र की स्टूडेंट रही हैं. वो अच्छी तरह जानती और समझती हैं कि फ्रीबीज देश की आर्थिक सेहत के लिए कितना हानिकारक है.

वो ये भी जानती हैं कि वोट पॉलिटिक्स के बीच फ्रीबीज खत्म करना आसान नहीं है. देश के कृषि सेक्टर पर अभी बहुत बोझ है. किसानों की कम कमाई के आंकड़े विकसित भारत की राह में रोड़ा की तरह हैं. वित्त मंत्री के सामने कृषि से लोगों की निर्भरता कम करने जैसी बड़ी चुनौती भी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वित्त मंत्री इस बार बजट में एक ऐसी राह निकालती दिख सकती हैं – जिससे किसान खेतों में क्रांतिकारी तरीकों को आजमाएं. देश की पढ़ी-लिखी युवा शक्ति नौकरी और बिजनेस की तरह खेतों में नया प्रयोग करती दिखे? इतिहास गवाह रहा है कि आजाद भारत में कई ऐसे बजट दिखे –जिन्होंने देश की दिशा और दशा दोनों बदल दी. ऐसे में आजाद भारत के बजट के कुछ पुराने पन्नों को भी पलटना जरूरी है.

साल 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. तब देश की सरहद की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर महसूस की गई. भारत को आजाद हुए सिर्फ 15 साल हुए थे. ना इंफ्रास्ट्रक्चर था, ना उद्योग थे, ना इतना अनाज की हर नागरिक का पेट भरा जा सके. लेकिन, तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने सरहद की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा, साल 1963 में उन्होंने अपने बजट का पिटारा खोला तो रक्षा बजट डबल से थोड़ा ही कम था.

1961-62 में जहां रक्षा बजट 309 करोड़ था, 1962-63 में 473 करोड़ रुपये पहुंच गया. 1963-64 में मोराजजी देसाई ने रक्षा बजट को बढ़ाकर 816 करोड़ कर दिया.

रक्षा बजट बढ़ने से भारतीय सेना का आधुनिकीकरण शुरू हुआ. नतीजा ये रहा कि साल 1965 के युद्ध में भारतीय फौज ने पाकिस्तान की गलतफहमी को दूर कर दिया. साल 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए. लेकिन, जल्द ही नए तरह की चुनौतियां खड़ी हो गईं. दुनिया मंदी की चपेट में थी और कच्चे तेल की कीमतें बेलगाम हो गयीं. घरेलू मोर्चे पर महंगाई रोकना सरकार के लिए मुश्किल हो गया. ऐसे में साल 1974-75 का बजट आया. बजट बनाने वाले थे वाई बी चह्वाण. देश को मुश्किल से निकालने के लिए चह्वाण ने नया फॉर्मूला निकाला. इनकम टैक्स का रेट कम कर दिया. उनकी सोच थी कि टैक्स कम होगा तो ज्यादा लोग टैक्स देंगे. वाईवी चह्वाण के बजट ने भविष्य के वित्त मंत्रियों के लिए डायरेक्ट टैक्स रिफॉर्म का रास्ता खोल दिया.

क्राइसिस टाइम बजट यानी संकटकाल के बजट की सबसे बड़ी परीक्षा 1991 में हुई. परीक्षार्थी थे वित्त मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री थे नरसिम्हा राव. देश में सिर्फ 15 दिन की जरूरत की विदेशी मुद्रा बची थी. ऐसे में मनमोहन सिंह ने अपने बजट में उदारीकरण का रास्ता दिखाया और दुनिया भर की कंपनियों के लिए भारतीय बाजार खोल दिया. इसका जल्द ही फायदा दिखने लगा. भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ वर्षों में ही आईसीयू से बाहर निकल कर दौड़ लगाने लगी.

आज की तारीख में नए तरह की चुनौतियां हैं. कूटनीति रिश्तों की ड्राइविंग सीट पर कारोबार और हथियार के रूप में टैरिफ का इस्तेमाल किया जा रहा है. तकनीक फैक्ट्रियों प्रोडक्शन से लेकर खेती के तौर-तरीकों तक, अस्पतालों में इलाज से लेकर स्कूलों में पढ़ाई के तौर-तरीकों तक को बदल रही हैं. ऐसे में एक बहुत दूर की सोच वाले बजट की जरूरत है – जो भारत के हर नागरिक को आर्थिक और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने में मददगार की भूमिका निभाए. जिसमें सरहद की सुरक्षा भी हो, ग्लोबल जॉब मार्केट और सप्लाई चेन में दमदाम भूमिका निभाने लायक काबलियत भी.

कई बार देश हित में, भविष्य को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक नफा-नुकसान को पीछे छोड़ते हुए बड़े और कड़े फैसले लेने पड़ते हैं. इतिहास गवाह है कि देश जब भी संकट या बड़ी हलचल के दौर से गुजरा तत्कालीन वित्त मंत्रियों ने मुश्किल राहों को चुनने में हिचक नहीं दिखाई. पूरी दुनिया में अजीब हलचल है. तनाव है. अविश्वास है. युद्ध का खतरा है. टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करने का चलन तेजी से मजबूत हो रहा है. दुनिया में नये समीकरण बन रहे हैं. ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने एक ऐसा बजट पेश करने की चुनौती है – जिसकी मदद से एक ओर, दुनिया में तेजी से होते बदलावों और हलचल के बीच भारत की ग्रोथ रेट टॉप गियर में दौड़ लगाती रहे. दूसरी ओर, देश के आखिरी आदमी के लिए रोजगार और कमाई बढ़ाने के रास्ते खुले. अटकलें ये भी लगाई जा रही हैं कि महंगाई के बोझ तले हांफते मिडिल क्लास के लिए इनकम टैक्स में राहत का ऐलान किया जा सकता है. मैरिड कपल्स के लिए ज्वाइंट टैक्सेशन की व्यवस्था बनाई जा सकती है. आर्थिक सर्वे के आंकड़े भी बता रहे हैं कि देश की लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी बहुत तेजी से बढ़ी है. सितंबर महीने में ही सरकार GST दरों में बड़ा बदलाव कर चुकी है. ऐसे में कारोबारियों के लिए GST में और राहत के ग्रह-गोचर बनते नहीं दिख रहे हैं । वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जानती हैं कि अगले 5-10 वर्षों में हमारे जीवन के ज्यादातर पहलुओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रभावित करेगा. फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन से लेकर खेती तक, मेडिकल से ट्रांसपोर्ट सेक्टर तक, सर्विसेज से लेकर एजुकेशन सिस्टम तक में बड़ा बदलाव करेगा. ऐसे में विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने के लिए एक ऐसा बजट पेश करने की चुनौती है – जिससे समाज में आखिरी आदमी को AI वाले वर्ककल्चर में काम करने के लिए तैयार किया जा सके, ट्रेंड किया जा सके. सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया की नजरें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण पर टिकी है. इस बार वो किस चौंकाने वाले विचार के आती हैं – जिसे इतिहास वर्षों याद रखेगा या फिर एक ऐसा बजट आएगा – जिसे समाज का हर तबका अपने-अपने हिसाब से डिकोड करेगा.

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लेखक के बारे में

Anurradha Prasad

अनुराधा प्रसाद के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं...मिशन है। अपनी साढ़े तीन दशक की टेलीविजन पत्रकारिता में हर तरह का प्रयोग देखा...हर बदलाव की साक्षी रहीं... एक तेज-तर्रार रिपोर्टर से सफल मीडिया उद्यमी बनीं....अपनी तेज नज़र, दूरदर्शी सोच और कलम के दम पर मीडिया जगत में एक दमदार हस्ताक्षर हैं। अनुराधा प्रसाद जी न्यूज़ 24 की एडिटर-इन-चीफ और बीएजी नेटवर्क की सीएमडी हैं  । बतौर टेलीविजन पत्रकार हर भारतीय की आवाज बुलंद करने की ईमानदार कोशिश किया और हमेशा Think First के फलसफे पर आगे बढ़ने में यकीन करती हैं। न्यूज़ 24 पर इतिहास गवाह है...सीरीज के जरिए दर्शकों को अतीत के पन्नों से रू-ब-रू करवाती रही हैं.. तो भारत भाग्य विधाता जैसी सीरिज के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों से दर्शकों का परिचय कराया- जो आजाद भारत में लोकतंत्र को  मजबूत और गणतंत्र को बुलंद बनाने में खामोशी से कर्मयोगी की भूमिका में हैं। इसी तरह भारत एक सोच के जरिए वक्त से आगे की सोच से भी दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । ये अनुराधा प्रसाद की मुखर और प्रखर सोच का ही नतीजा है कि न्यूज़ 24 पर माहौल क्या है-कार्यक्रम में आम आदमी की आवाज को  पूरी तवज्जो मिलती है...तो India’s Tiger जैसी टेली सीरीज के जरिए उन गुमनाम जासूसों के योगदान से भी दर्शकों तो मिलवाने का भगीरथ प्रयास हो रहा है, जो खामोशी से अपना काम कर नेपथ्य में चले गए । मंथन का मंच सजा कर समाज और सिस्टम के असरदार लोगों की सोच से दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । 1990 के दशक में प्रसारित आपके The horse's mouth और Let’s Talk शो ने भारतीय टेलीविजन को चर्चित शख्सियतों के इंटरव्यू का नया अंदाज दिया...तो आमने-सामने में आपके तीखे सवालों का देश के ज्यादातर सियासतदानों ने सामना किया। आपकी अगुवाई में बीएजी नेटवर्क ने सामाजिक सरोकार और जागरूकता के संदेश वाले कई कार्यक्रम बनाए तो चुनावी मौसम में नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे को भी रोचक अंदाज में दर्शकों के सामने रखने का सफल प्रयोग किया । अनुराधा प्रसाद भारत में टेलीविजन पत्रकारिता में पहली पीढ़ी की पत्रकार हैं...जिन्होंने अपनी बुलंद सोच और नए-नए शोज से भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा बदला । अनुराधा प्रसाद भारत को समर्पित एक ऐसी शख्सियत हैं... जो पत्रकारिता के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने के मिशन में पूरी शिद्दत से जुटी रहती हैं...जुटी हुई हैं और जुटी रहेंगी।
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