Monday, July 6, 2020

अमेरिका के इस दांव से चीन के होंगे टुकड़े, पाकिस्तान पर भी बंटवारे का खतरा!

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को उइगुर मुस्लिमों का उत्पीड़न करने के जिम्मेदार चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। अब इस बिल को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए व्हाइट हाउस भेजा गया है। इस बिल के पास होने के बाद पाकिस्तान के सिंधी और बलूच काफी उत्साहित हैं और उन्हें यह लगता है कि जल्द ही अमेरिका में सिधं और बलूचों की आजादी का प्रस्ताव टेबल पर रखा जायेगा। 

नई दिल्ली। उइगर मुसलमानों के हक में बिल पारित करने के बाद एक ओर जहां चीन के बंटवारे के बाद अब अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ भी बड़ी कार्रवाई कर सकता है। अनाधिकृत कब्जे के बाद से आजादी की मांग कर रहे बलूचों को अमेरिका से अब उम्मीद जागी है। पाकिस्तान के राजनीतिक दल के नेता अलताफ हुसैन ने कहा है कि पाकिस्तान की सरकार और फौज सिंधी और बलूचों के खिलाफ दमनचक्र चला रही है। हमें उम्मीद है कि उइगरों की तरह ही अमेरिकी सरकार आजाद सिंध और बलूचिस्तान के लिए भी ऐसा ही बिल पास करेगी।

चीन के उइगर मुसलमानों को अब जल्द ही चीन के जुल्मो-सितम से निजात मिलेगी। इसके साथ ही बलूचों को भी पाकिस्तान से आजादी की उम्मीदें मजबूत हुई हैं। चीन में उइगरों का जो हाल है उससे भी बदतल हाल पाकिस्तानी फौज और सरकार ने बलूचों का कर रखा है। अमेरिकी सीनेट ने उइगर मुसलमानों के हक में एक बिल पारित किया है। बलूचों को उम्मीद है कि अब उनके साथ भी इंसाफ होगा।

अमेरिकी सीनेट ने तुरुप का इक्का चल दिया है। इस तुरुप के इक्के से चीन के साथ-साथ पाकिस्तान भी दुनिया भर में एक्सपोज हो जायेगा। इसी के साथ अब पाकिस्तान से बलूचिस्तान की आजादी का रास्ता खुलने जा रहा है। अमेरिकी सीनेट ने चीन के उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न पर यह बिल पास किया है। इस बिल पर अब सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर होने हैं। ट्रंप के हस्ताक्षर होने के साथ ही यह बिल कानून बन जायेगा। इसके बाद अमेरिका उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न पर चीन के खिलाफ कार्रवाई के लिए अधिकृत हो जायेगा। अमेरिकी सीनेट ने में इस उइगर उत्पीड़न बिल के पक्ष में 413 और विरोध में मात्र एक वोट पड़ा। बिल व्हाइट हाउस भेज दिया गया है।

हालांकि ये बिल चीन पर कार्रवाई के लिए है लेकिन इस बिल के पारित होने के बाद पाकिस्तान पर न केवल भी लगाम लगाई जा सकेगी। बल्कि पाकिस्तान से बलूचिस्तान की आजादी का नया रास्ता भी खुलेगा। क्यों कि उइगर मुसलमानों की तरह पाकिस्तान में अहमदिया, सिंधी, पश्तून और बलोच मुसलमानों पर पाकिस्तान की सरकारें दमन चक्र चलाती रही हैं। उइगर मुसलमानों की व्यथा अंतर्राष्ट्रीय स्तार पर उठाए जाने से अब पाकिस्तान के इन समुदायों को भी इंसाफ मिलने की उम्मीद जागी है। इसके अलावा दूसरी खास बात यह कि पाकिस्तान और उसके नेता भारत के मुसलमानों को लेकर दुनिया भर में झूठ प्रचारित करता रहता है लेकिन वो आज तक चीन के उइगर मुसलमानों के अत्याचारों पर होठ सिल कर बैठा हुआ है। अब दुनिया के लोग सवाल कर रहे हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार क्यों नहीं दिखाई दिये। ओआईसी में उइगर मुसलमानों का मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया।

बहरहाल, कोरोना वायरस को लेकर जारी तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने मुस्लिम कार्ड खेलते हुए चीन को पटखनी देने का प्लान बना लिया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को उइगुर मुस्लिमों का उत्पीड़न करने के जिम्मेदार चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। अब इस बिल को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए व्हाइट हाउस भेजा गया है। इस बिल के पास होने के बाद पाकिस्तान के सिंधी और बलूच काफी उत्साहित हैं और उन्हें यह लगता है कि जल्द ही अमेरिका में सिधं और बलूचों की आजादी का प्रस्ताव टेबल पर रखा जायेगा।

इस बिल के लिए हुए वोटिंग में पक्ष में 413 वोट जबकि खिलाफ में केवल 1 वोट पड़ा। बिल के पास होने के बाद कई नेताओं ने कहा कि सीनेट ने इस बिल को सर्वसम्मति से पास किया है जिससे मानवाधिकारों का हनन करने पर चीन पर प्रतिबंध लगाया जा सके। रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि राष्ट्रपति ट्रंप इस बिल पर जल्द हस्ताक्षर करेंगे।

उइगुर मुस्लिमों को लेकर पारित बिल पर अमेरिका और चीन के बीच विवाद और गहराने की संभावना है। चीन जहां इसे अपने संप्रभुता का उल्लंघन बताएगा वहीं अमेरिका इसे मानवाधिकारों से जोड़कर उठाया गया कदम करार देगा। चीन और अमेरिका के बीच पहले से ही ट्रेड वॉर, साउथ चाइना सी और कोरोना वायरस को लेकर जांच पर विवाद है।

उइगुर मुसलमानों को लेकर अमेरिकी सीनेट में पारित बिल इमरान खान के लिए मुसीबत बन सकती है। इमरान न तो इस बिल का खुलकर विरोध करेंगे और न ही समर्थन।  उइगुर मुसलमानों के उत्पीड़न को लेकर आज तक पाकिस्तान से कोई विरोध सामने नहीं आया है। पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मदद के लिए चीन की जरूरत है जबकि चीन को भी भारत को घेरने के लिए आए दिन पाकिस्तान की मदद लेनी पड़ती है। वहीं, इमरान खान यह भी नहीं चाहेंगे कि वह अमेरिका के कानून का विरोध करें क्योंकि वहां से भी पाकिस्तान को भारी-भरकम मदद मिल रही है।

उइगुर मध्य एशिया में रहने वाले तुर्क समुदाय के लोग हैं जिनकी भाषा उइगुर भी तुर्क भाषा से काफी मिलती-जुलती है। उइगुर तारिम, जंगार और तरपान बेसिन के हिस्से में आबाद हैं। उइगुर खुद इन सभी इलाकों को उर्गिस्तान, पूर्वी तुर्किस्तान और कभी-कभी चीनी तुर्किस्तान के नाम से पुकारते हैं। इस इलाके की सीमा मंगोलिया, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के साथ-साथ चीन के गांसू एवं चिंघाई प्रांत एवं तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से मिलती है। चीन में इसे शिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र (एक्सयूएआर) के नाम से जाना जाता है और यह इलाका चीन के क्षेत्रफल का करीब छठा हिस्सा है।

करीब दो हजार साल तक आज के शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र पर एक के बाद एक खानाबदोश तुर्क साम्राज्य ने शासन किया। उनमें उइगुर खागानत प्रमुख है जिसने आठवीं और नौवीं सदी में शासन किया। उइगुरों ने अपने अलग साम्राज्य की स्थापना की। मध्यकालीन उइगुर पांडुलिपि में उइगुर अली का उल्लेख है जिसका मतलब होता है उइगुरों का देश।उइगुर का चीनी इतिहास 1884 में शुरू होता है। चिंग वंश के दौरान इस क्षेत्र पर चीन की मांचू सरकार ने हमला किया और इस इलाके पर अपना दावा किया। फिर इस क्षेत्र को शिंजियांग नाम दिया गया जिसका मैंड्रीन में ‘नई सीमा’ या ‘नया क्षेत्र’ मतलब होता है।1933 और 1944 में दो बार उइगुर अलगाववादियों ने स्वतंत्र पूर्वी तुर्किस्तान गणराज्य की घोषणा की।1949 में चीन ने इस इलाके को अपने कब्जे में ले लिया और 1955 में इसका नाम बदलकर शिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र कर दिया।

चीन में हुई 2003 की जनगणना में उइगुरों की आबादी करीब 90 लाख बताई गई थी जबकि अनाधिकारिक अनुमान में उनकी आबादी उससे भी ज्यादा है। उइगुर चीन के 55 अल्पसंख्यक समुदायों में से पांचवां सबसे बड़ा समुदाय है। 1949 से पहले तक चीन के शिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र की कुल आबादी का 95 फीसदी उइगुर मुस्लिम थे लेकिन चीन में 60 सालों के कम्यूनिस्ट शासन के बाद अब वे सिर्फ 45 फीसदी रह गए हैं।

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