Thursday, July 9, 2020

चीन ने ऐसा फंसाया कि अब नेपाल के पीएम को भारत के खिलाफ साजिश रचना पड़ रहा है भारी

चीन की जाल में फंसकर भारत के खिलाफ साजिश रचना नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भारी पड़ गया है। इस कदम के बाद देश में ही उनका विरोध होने लगा है। नेपाल की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने भी ओली को फटकार लगाते हुए कहा है कि उनकी यह हरकत देश और देशवासियों के हित में नहीं है।

नई दिल्‍ली: चीन की जाल में फंसकर भारत के खिलाफ साजिश रचना नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भारी पड़ गया है। इस कदम के बाद देश में ही उनका विरोध होने लगा है। नेपाल की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने भी ओली को फटकार लगाते हुए कहा है कि उनकी यह हरकत देश और देशवासियों के हित में नहीं है। एक बैठक के दौरान फैसला लिया कि देश के विवादित नक्शे को संसद में रखने से पहले भारत से बातचीत जरूरी है।

नेपाल की जनता भी नहीं चाहती कि इस मुद्दे को लेकर भारत के साथ कोई विवाद खड़ा किया जाए, क्‍योंकि यूपी और बिहार में उनकी काफी रिश्‍तेदारी है। इसके साथ ही नेपाल के लोग बड़ी तादाद में भारत में काम करते हैं और यहां से बड़ी तादाद में उनका व्‍यापार चलता है। ऐसे में वहां के नेताओं ने भी साफ कर दिया है कि इस मुद्दे पर हमें राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर भारत के साथ बातचीत शुरू करने की जरूरत है। ओली सरकार ने नेपाल के इस नक्‍शे में संशोधन तो कर दिया है, लेकिन वह इसको मंजूरी दिलाने के लिए अबतक संसद में विधेयक पेश नहीं कर पाई है।

नेपाल की इस हरकत के बाद भारत सरकार ने भी कड़ा रुख अख्तियार कर लिया और वहां की सरकार से किसी भी तरह की बातचीत करने से पहले विश्‍वास बहाल करने की बात कही है। भारत ने साफ कहा है कि इस प्रकरण से दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट पैदा हुआ है। बातचीत के लिए नेपाल को पहले भारत का विश्वास जीतना होगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, ”भारत अपने सभी पड़ोसियों के साथ भरोसे और विश्वास के माहौल में परस्पर सम्मान की भावना के साथ बात करने को तैयार है। यह एक सतत प्रकिया है और इसके लिए रचनात्मक और सकारात्मक प्रयासों की जरूरत है।”

क्‍या है विवाद
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्‍व में कैबिनेट की बैठक के दौरान नए मैप को मंजूरी दी है, जिसमें लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी के अलावा गुंजी, नाभी और कुटी गांवों को भी शामिल किया गया है, जबकि दरअसल ये इलाके भारत में आते हैं। यह इलाका करीब 395 वर्ग किलोमीटर का है। नेपाल के नए नक्‍शे में कालापानी के कुल 60 वर्ग किलोमीटर के इलाके को अपना बताया है। इसमें लिंपियाधुरा के 335 किलोमीटर के इलाके को जोड़ दें तो यह कुल 395 वर्ग किलोमीटर हो जाता है।

1816 में ब्रिटिश राज में नेपाल के राजा कई इलाके हार गए थे, जिनमें लिपुलेख और कालापानी शामिल हैं। इसके बाद सुगौली की संधि हुई, जिसमें उन्‍हें सिक्किम, नैनीताल, दार्जिलिंग, लिपुलेख, कालापानी को भारत को देना पड़ा था। हालांकि अंग्रेजों ने बाद में कुछ ह‍िस्‍सा लौटा द‍िया। यही नहीं तराई का इलाका भी अंग्रेजों ने नेपाल से छीन ल‍िया था, लेकिन भारत के वर्ष 1857 में स्‍वतंत्रता संग्राम में नेपाल के राजा ने अंग्रेजों का साथ दिया था। अंग्रेजों ने उन्‍हें इसका इनाम दिया और पूरा तराई का इलाका नेपाल को दे द‍िया।। इन इलाकों को लेकर कभी भी दोनों देशों के बीच विवाद नहीं हुआ, लेकिन अब अचानक नेपाल ने आक्रामण रुख अपना लिया है। जिससे साफ पता चलता है कि वह चीन के जाल में फंसकर ऐसा कर रहा है। यही नहीं नेपाल ने चांगरु में कालापानी के नजदीक आर्म्ड पुलिस फोर्स का आउटपोस्ट बनाया है।

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