भारत की इस कामयाबी से घबराया चीन, नेपाल के जरिए इस साजिश में लगा

नई दिल्‍ली: नेपाल से भारत के ताजा सीमा विवाद का मामला गर्माता जा रहा है। भारत ने नेपाल को कड़े शब्दों में समझा दिया है कि बेवजह के विवाद से कोई फायदा नहीं। नेपाल हिदुस्तान का सबसे भरोसेमंद और सांस्कृतिक तौर पर सबसे करीबी पड़ोसी था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। ड्रैगन की शह पर नेपाल ने भारत के खिलाफ बेहद खराब रवैया अख्तियार कर लिया है। इस मामले पर कांग्रेस भी अब केंद्र पर हमलावर हो गई है। हर कोई जानता है कि नेपाल की बागी तेवरों के पीछे चीन है।

दरअसल, नेपाल ने अपने नक्शे में आनन-फानन में बदलाव कर भारत के 3 इलाकों कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपना बताया और इन पर कब्जा करने का दावा भी ठोक दिया है। वहीं चीन वायरस को लेकर दिए नेपाली पीएम के बेतुके बयान के बाद ये साफ हो चुका है कि जुबान भले ही उनकी है। लेकिन शब्द चीन के ही है। पर यहां ये गौर करने वाली बात है कि हिंदुस्तान के लिए ये तीनों इलाके धार्मिक लिहाज से ज्यादा सुरक्षा कारणों के लिए जरुरी है।

नेपाल जैसे दोस्त से बिगड़ते रिश्ते के बीच जमकर सियासत भी शुरु हो चुकी है। कांग्रेस ने बीजेपी पर निशाना साधा है और रिश्तों की तल्खी के लिए केन्द्र की विदेश नीति को जिम्मेदार बताया है। कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट कर लिखा, ”क्या ऐसा कोई रास्ता है कि नेपाल के साथ मौजूदा रिश्तों को लेकर नेहरू पर आरोप लगाया जा सके? अगर है तो मैं सुनना चाहूंगा कि ये कैसे हुआ। क्योंकि सभी अच्छे काम तो 2014 के बाद ही हुए हैं। सारे गलतियां या तो 1950 से 67 में हुई, या 1980-84, 2004 से 2014 के बीच। अद्भुत और अविश्वसनीय बेशर्मी!”

हालांकि नेपाल के इस कदम पर भारत ने भी जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि ‘हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वो ऐसे बनावटी कार्टोग्राफिक प्रकाशित करने से बचे। साथ ही भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करे।’ लिपुलेख पर बन रही सड़क भारत के लिए हर लिहाज से बेहद जरुरी है। इसलिए भारत ने यहां सड़क का निर्माण किया है। चीन को बात नागवार गुजर रही है और इसीलिए वो नेपाल के जरिए भारत पर अपनी खुन्नस निकाल रहा है।

भारत-नेपाल लिपुलेख दर्रा विवाद क्या है?
धारचूला लिपुलेख सड़क 90 किलोमीटर लंबी है, जिससे लिपूलेख दर्रा अब उत्तराखंड के धारचूला से जुड़ेगा। लेकिन नेपाल का कहना है कि लिपूलेख दर्रा उसके हिस्से में आता है। इसलिए भारत की यह सड़क उसकी सीमा का अतिक्रमण है।

चीन रच रहा है साजिश
भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच जहां सीमा है, उसे कहते हैं लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल। भारत ने जो नई सड़क बनाई है, वो लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल तक जाती है। भारत से जो यात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाएंगे, वो लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को पार करके लिपुलेख दर्रे के जरिए तिब्बत में दाखिल होंगे और फिर इसी रास्ते से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करके भारत लौट आएंगे। ये सड़क बन गई है, लेकिन अब भी करीब 4 किलोमीटर लंबी सड़क बननी बाकी है, जिसके लिए कुछ पहाड़ काटे जाने हैं। ये नई सड़क पिथौरागढ़ के घटियाबाघड़ से शुरू हो रही है और लिपुलेख तक जा रही है। इससे सबसे बड़ा फायदा ये है कि अभी तक कैलाश मानसरोवर के यात्रियों को अपनी यात्रा का 80 फीसदी हिस्सा चीन में तय करना पड़ता था और महज 20 फीसदी हिस्सा भारत में होता था, वो अनुपात अब बदल जाएगा। भारतीय यात्री अब अपनी यात्रा का करीब 84 फीसदी हिस्सा भारत में तय करेंगे और 16 फीसदी हिस्सा चीन का होगा।

भारतीय सेना के लिए ज़रूरी थी ये सड़क
चीन से लगती सड़क बनाने के लिए भारत सरकार ने 1990 में ही एक प्रस्ताव रखा था। 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने इस सड़क को बनाने की मंजूरी दी थी, लेकिन फिर मामला आगे बढ़ गया और सड़क नहीं बनी। 2017 में जब भारत का चीन के साथ डोकलाम मुद्दे पर करीब 70 दिन लंबा विवाद चला तो भारत सरकार को ये समझ आया कि सड़कें बनानी कितनी ज़रूरी है। इसके बाद 2017-18 में रक्षा मंत्रालय की स्टैंडिंग कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि देश कुछ ऐसे पड़ोसियों से घिरा है, जिनसे रिश्ते संभालने में काफी मुश्किल होती है। ऐसे में सीमावर्ती इलाके में सड़कें बनाना और विकास के कुछ काम करवाना बेहद ज़रूरी है। सड़क बनने के बाद सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ये पहली बार होगा, जब सीमावर्ती इलाकों के गांव भी सड़क से जुड़ जाएंगे।

भारत के इलाकों को अपने नक्शे में दिखाकर मनमानी कर रहे नेपाल को नई दिल्ली ने सख्त संदेश दिया है। भारत ने कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा पर नेपाल के दावे को न केवल खारिज कर दिया, बल्कि दो टूक ढंग से यह भी कहा कि भौगोलिक क्षेत्रों के कृत्रिम विस्तार को स्वीकार नहीं किया जाएगा। नई दिल्ली की नेपाल को यह भी नसीहत है कि उसे अनुचित दावों से बचना चाहिए।

पहले से पाकिस्तान और चीन की चालाकियों को झेल रहे भारत के लिए ये बेहद तनाव भरी खबर है। कूटनीतिक तौर पर इस मसले पर तनाव बरकरार है और सियासी तौर पर देश में ही अब देश की सरकार पर सवाल भी उठने लगे हैं। सवाल उठ रहा है कि पिछले लंबे वक्त से भारत के साथ नेपाल के रिश्तों में तल्खी आती जा रही है। क्या ये सरकार की विफलता है।

जानकार मानते हैं कि भारत को इस वक्त जोश से नहीं होश से काम लेना चाहिए। भारत को नेपाल को समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि वो चीन की बातों में न आए, क्योंकि इस अहम वक्त में हम एक और दुश्मन पैदा नहीं कर सकते। कोरोना के कलंक के चलते अपनी खराब होती छवि से चीन परेशान है। दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां चीन छोड़कर वैक्लिपक बाजार तलाश रही हैं और भारत में उन्हें बड़ी संभावना नजर आ रही है। दुनिया के दूसरे मंचों पर भी भारत अब खुलकर चीन की मुखालफत कर रहा है। इसीलिए चालाक चीन नेपाल के जरिए हिंदुस्तान की शांति में खलल डालना चाहता है।

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