Monday, April 6, 2020

Coronavirus को लेकर आई ये अच्‍छी खबर, जल्‍द बनेगा टीका

वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वो कोरोना का पक्का इलाज करने वाला ऐसा टीका बना सकते हैं, जो लंबे समय तक काम करेगा यानी अगर किसी को कोरोना वायरस का संक्रमण हो गया, तो वो ठीक हो जाएगा और काफ़ी समय तक कोरोना फैमिली का वायरस उस पर हमला नहीं कर सकेगा।

नई दिल्‍ली: देश में 21 दिन का लॉकडाउन है, ये कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने वाला सबसे कारगर तरीका है। इसी के साथ वैज्ञानिकों की लैब में कोरोना वायरस की दवा को लेकर एक अच्‍छी खबर सामने आई है। खबर के अनुसार, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वो कोरोना का पक्का इलाज करने वाला ऐसा टीका बना सकते हैं, जो लंबे समय तक काम करेगा यानी अगर किसी को कोरोना वायरस का संक्रमण हो गया, तो वो ठीक हो जाएगा और काफ़ी समय तक कोरोना फैमिली का वायरस उस पर हमला नहीं कर सकेगा।

अमेरिकी अख़बार वॉशिंटगटन पोस्ट ने कोरोना वायरस को लेकर सारी दुनिया के लिए बहुत अच्छी ख़बर दी है। अख़बार ने अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के बारें लिखाते हुए कहा, ‘हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में कोरोना वायरस की दवा को लेकर बहुत तेज़ी से स्टडी चल रही है, वहां के वैज्ञानिकों का दावा है कि कोरोना वायरस की रिसर्च में देखा गया है कि वायरस अपना नेचर नहीं बदल रहा है। इससे कई सकारात्मक नतीजे आने की उम्मीद है।’’

वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस अलग-अलग देशों में रूप नहीं बदल रहा यानी वायरस अलग-अलग देशों में एक ही तरह का व्यवहार कर रहा है। वायरस अलग-अलग देशों में एक ही तरह से लोगों की जान ले रहा है। वायरस का संक्रमण और ख़तरा सभी देशों में एक जैसा नज़र आ रहा है, ऐसे में वायरस की प्रकृति समझकर टीका बनाने में बहुत मदद मिल सकती है।

वैश्विक महामारी घोषित हो चुके कोरोना वायरस के कारण अब तक दुनिया में 18 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। भारत की बात करें तो संक्रमण का आंकड़ा पांच सौ को पार कर गया है, ऐसे में इस वायरस के जेनेटिक कोड पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि कोरोना वायरस के जानलेवा विषाणुओं का पता लगाया जा चुका है। इसमें सार्स-कोव 2 के लक्षण मिले हैं।

कोविड 19 यानी कोरोना वायरस में सार्स-कोव-2 के विषाणु है। ये वायरस प्राकृतिक रूप से चमगादड़ों में पाया जाता है। वैज्ञानिक अब वायरस के एक हज़ार अलग-अलग नमूने लेकर जांच कर रहे हैं। रिसर्च में अब तक के तमाम परिणाम सकारात्मक आए हैं यानी कोरोना की सटीक दवा की दिशा में वैज्ञानिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

कोरोना को लेकर वैज्ञानिकों की रिसर्च में जो बातें सामने आई हैं, वो पूरे विश्व के लिए बहुत अहम हैं।

पेंगोलिन से फैला कोरोना वायरस ?

  • वैज्ञानिकों के मुताबिक वुहान में सार्स-कोव 2 वायरस मनुष्यों में मिला था
  • ये वायरस मध्यवर्ती प्रजाति संभवत: पेंगोलिन के जरिए फैला है
  • पेंगोलिन की तस्करी पारंपरिक दवा बनाने के लिए की जाती है
  • भारत, चीन, इंडोनेशिया समेत कई देशों में पेंगोलिन का शिकार होता है
  • पेंगोलिन यानी रोल करने वाला स्तनधारी पहाड़ी जानवर

कोरोना वायरस की रिसर्च में अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी को कुछ अहम जानकारी मिली हैं। इनके बारे में भी आपको ज़रूर जानना चाहिए।

कोरोना के सारे वायरस एक जैसे मिले। बहरहाल, सभी वायरस समय के साथ विकसित होते हैं। वायरस एक होस्ट सेल के अंदर रहकर खुद को बढ़ाते हैं, फिर जनसंख्या के जरिए आस-पास फैलते जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ अपने प्राकृतिक रूप में ही रहते हैं। जबकि कुछ वायरस लगातार अपना स्वरूप बदलते रहते हैं। हालांकि कोरोना वायरस अपना रूप नहीं बदल रहा है, जिससे इसकी सटीक दवा बनाने में बहुत मदद मिलेगी। ऐसे सबूत नहीं मिले हैं कि कोरोना का एक वायरस दूसरे से ज़्यादा खतरनाक है। वैज्ञानिक अब तक मिले 1,000 नमूनों का अध्ययन कर रहे हैं।

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में molecule जेनेटिस्ट पीटर थीलन कोरोना वायरस का अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने वायरस की रिसर्च के दौरान एक अहम बात कही हैं।

अमेरिका में संक्रमित लोगों और वुहान में फैलने वाले मूल वायरस के बीच केवल चार से 10 आनुवंशिक अंतर हैं। बड़ी संख्या में लोगों को अपनी चपेट में लेने के बावजूद इस वायरस में बहुत कम अनुवांशिक अंतर आया है। ऐसे में उम्मीद है कि सार्स-कोव-2 के लिए एक ही टीका बनाया जा सकता है, जबकि फ्लू के लिए हर साल नया टीका बनाना पड़ता है। ये खसरे या चिकनपॉक्स के टीकों की तरह होगा, कुछ ऐसा जो लंबे समय तक रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाएगा।

कोरोना के जिस दौर में सारी दुनिया से संक्रमण और मौत के आंकड़े बढ़ने की ख़बरें आ रही हैं,  ऐसे में अमेरिकी वैज्ञानिकों की रिसर्च उस दिशा में बढ़ रही है, जहां कोरोना वायरस के अंत की शुरुआत हो सकती है।

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