यहां कभी गरीब भी थे करोड़पति, सब्जी खरीदने के लिए झोलों में भरकर ले जाते थे नोट

नई दिल्ली (9 नवंबर): अफ्रीकी देश जिम्बाब्वे की अपनी कोई करेंसी नहीं है। 1980 से लेकर 2009 तक यहां की करेंसी जिम्बाबवियन डॉलर थी, लेकिन सरकार की गलत नीतियों की वजह से यहां एक वक्त ये आलम था कि लोग यहां सब्जी तक खरीदने के लिए ट्रॉली में पैसा भरकर ले जाते थे। 2009 तक जिम्बाब्वे की सड़कों पर ट्रॉली में नोट भरकर खड़े लोग आसानी से दिख जाते थे।

दरअसल, इस देश में महंगाई काफी ज्यादा बढ़ गई थी। इस वजह से लोगों को छोटे से सामान के लिए भी काफी ज्यादा पैसे देने पड़ते थे। यहां जिन लोगों को गरीब कहा जाता था, उनके पास भी करोड़ों रुपए हुआ करते थे। लेकिन उसका कोई फायदा नहीं था, क्योंकि उन पैसों की वैल्यू यहां काफी कम थी। आपको बता दें कि जब इस देश के लोगों के पास पैसों की कमी होने लगी थी, तो यहां की सरकार ने अंधाधुंध नोट छापने शुरू किए थे। इसी का नतीजा था कि लोगों के पास काफी ज्यादा पैसे इक्कठा हो गए। लेकिन फिर, महंगाई इतनी बढ़ गई कि लोगों को जरुरत का सामान खरीदने के लिए सूटकेस में पैसे भरकर देने पड़ते थे।


1980 से लेकर अप्रैल 2009 तक जिम्बाब्वे की करेंसी जिम्बाबवियन डॉलर थी। उससे पहले यहां की करेंसी रोडेशियन डॉलर थी। फिलहाल इस देश में कई देशों की करेंसी का इस्तेमाल होता है। जैसे कि साउथ अफ्रीका का रैंड, जापानी येन, चाइनीज युआन, ऑस्ट्रेलियाई और US डॉलर। इसके अलावा यहां भारतीय करेंसी का भी इस्तेमाल होता है। इस देश में काफी महंगाई थी। इस कारण से यहां लोगों को एक पैकेट ब्रेड के लिए भी लाखों रुपए खर्च करने पड़ते थे।


इस देश की सरकार के पास अच्छी पॉलिसीज की कमी रही। उन्होंने बिना किसी प्लानिंग के बस नोट छापने शुरू कर दिए। जिसकी वजह से लोगों के पास काफी पैसे आ गए। किसी भी कामयाब देश की इकॉनमी में फ्लो होना जरुरी है। सरकार ने अगर ज्यादा नोट छापने की जगह अनाज उगाने के लिए किसानों को सही ट्रेनिंग दी होती, तो शायद इस देश में इतनी महंगाई नहीं होती। यहां लोगों के पास पैसे तो आ गए, लेकिन खाने-पीने की चीजें कम होने के कारण काफी महंगे हो गए।