बचपन में ऐसीं थीं साक्षी, मां नहीं चाहती थीं बेटी बने पहलवान

नई दिल्ली(18 अगस्त): ओलिंपिक गेम्स में भारत को पहला मेडल हरियाणा की साक्षी मालिक ने दिलाया। साक्षी ने रेसलिंग के 58 किलो वेट में ब्रान्ज मेडल के लिए किर्गिस्तान की रेसलर को हराया। खास बात यह कि साक्षी ओलिंपिक में मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बन गई हैं। 

- 15 साल पहले जब साक्षी की मां उनको खिलाड़ी बनाने के लिए रोहतक के छोटूराम स्टेडियम लेकर गईं थी, तो कोच ने लड़की होने के नाते जिमनास्ट बनने के लिए कहा था।

- कोच की सलाह को साक्षी ने दरकिनार कर दिया, उन्होंने कई स्पोर्ट्स देखा, लेकिन उन्हें कोई गेम पसंद नहीं आया।

- जब वह कुश्ती हॉल में पहुंची तो यहां पहलवानों को कुश्ती ड्रेस में देखा। उन्हें ड्रेस इतनी पसंद आ गई कि उन्होंने रेसलर बनने का फैसला किया।

- पिता सुखबीर मलिक ने भास्करको बताया कि पांच साल पहले केवल ड्रेस के लिए कुश्ती खेलने वाली साक्षी इतनी ऊंचाई तक पहुंचेगी, यह किसी ने नहीं सोचा था।

मां नहीं चाहती थी पहलवान बने बेटी

- बचपन में साक्षी को पहलवान न बनाने की इच्छा रखने वाली मां सुदेश मलिक ने कभी नहीं सोचा होगा कि रोहतक की यह बेटी एक दिन पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा कर देगी।

- साक्षी की मां कहती हैं कि मैं कभी नहीं चाहती थी कि बेटी पहलवान बने। समाज में अक्सर यही कहा जाता रहा कि पहलवानों में बुद्धि कम होती है, पढ़ाई में पिछड़ गई तो करियर कहां जाएगा।

- हालांकि उन्होंने बताया कि रेसलिंग के साथ-साथ साक्षी पढ़ाई में भी आगे रही। रेसलिंग में उसने गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीते, तो पढ़ाई में 70 प्रतिशत से ज्यादा मार्क्स हासिल किए।

पहलवानों में आईएएस से कम दिमाग नहीं

- साक्षी की मां कहती हैं कि अब करीब 15 साल बाद उसी बेटी ने साबित कर दिया है कि पहलवानों में किसी आईएएस से कम दिमाग नहीं होता। अपने प्रतिद्वंद्वी काे पछाड़ने के लिए दांव लगाने का फैसला एक पल में लेना होता है।

पहलवान बन कर बदल गया स्वभाव

- सुदेश मलिक ने बताया कि साक्षी अब चुप-चुप रहती है और अब गंभीर भी हो गई है। कुछ कहना हो या करना हो, वह पूरी तरह गंभीर नजर आती है। पहले ऐसी नहीं थी।

- उन्होंने बताया कि बचपन में वह बेहद चुलबुली, नटखट, शरारती हुआ करती थी। दादी चंद्रावली की लाडली थी। पहलवान बनने के बाद वह एकदम बदल गई है। अब परिजन उसकी पुरानी हरकतों को याद करके हंसते हैं।

- साक्षी की मां ने बताया कि वो तीन महीने की थी, तक नौकरी के लिए उसे अकेला छोड़ना पड़ा। वह अपने दादा बदलूराम व दादी चंद्रावली के पास मौखरा में तीन साल रही। छोटी उम्र में ही उसे काम करने का बहुत शौक था। अब भी घर आती है तो रसोई में मदद करती है।

बेटी की उपलब्धि से पिता हैरान

- डीटीसी दिल्ली में बतौर कंडक्टर तैनात सुखबीर मलिक अपनी बेटी साक्षी की उपलब्धियों से हैरान हैं।

- उन्होंने बताया कि उसका ओलिंपिक में मेंडल जीतना, उन्हें रोमांचित कर रहा है। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा कि बेटी देश के लिए मेडल जीती है।

- रोहतक सेक्टर चार में रहने वाली आंगनबाड़ी सुपरवाइजर सुदेश मलिक का कहना है कि मेरी बेटी साक्षी पिछले करीब दस साल से कुश्ती खेल रही है।

- उन्होंने बताया कि वह शुरू से ही ओलिंपिक में जाना चाहती थी। अब उसका सपना साकार हो रहा है। यही उसकी दुनिया है। पिछले ही साल उसने एमए की पढ़ाई पूरी की है।