यह काम करने के बाद महिलाएं फील करती हैं गिल्ट!

नई दिल्ली (14 मई): यूं तो जब भी कोई इंसान गलत काम करता है तो उसे अपराधबोध होता है, लेकिन वयस्क महिलाएं युवतियों की तुलना में अपराधबोध का अधिक शिकार बनती हैं, खासतौर पर वर्किंग वुमन।

हमारे यहां आज भी परिवारों में महिलाओं से हर भूमिका में खुद को बेहतरीन साबित करने की अपेक्षा की जाती है। उनसे जितनी अच्छी मां बनने की आशा रहती है उतनी ही अच्छा मेजबान भी। कामकाजी हों या गृहिणी, सामाजिक-पारिवारिक दायित्वों में कोई छूट नहीं। घर-परिवार की सारसंभाल की फेहरिस्त में स्वयं को सबसे नीचे रखने के बाद भी उनके लिए 'दिनभर तुम करती ही क्या हो बहू तुम्हें कुछ आता भी है 'मां तुम कुछ नहीं जानती 'घर सिर्फ तुम्हारी तनख्वाह के भरोसे नहीं चलता जैसे जुमले परिवारों में आम हैं।

जो उनके मन को आघात पहुंचाते हैं, अपराधबोध का शिकार बनाते हैं। एक अध्ययन में भी सामने आया है कि 96 फीसदी महिलाएं दिन में कम से कम एक बार खुद को दोषी या अपराधी मानती हैं। अपराधबोध से जुड़ा उनका यह भाव अधिकतर मामलों में परिवार की संभाल से ही जुड़ा होता है। महिलाओं का स्वयं को दोषी समझने का नतीजा भी हम सबके सामने है। आज के दौर में जागरूक और शिक्षित मांओं और पत्नियों की बड़ी संख्या इसी अपराधबोध के चलते अवसाद ग्रस्त हैं।

अवतार ह्यूमन कैपिटल ट्रस्ट की ओर से किए गए 'व्यूपोर्ट 2009 अध्ययन के अनुसार भारत में घर के कामकाज में पतियों के सहयोग के बारे में कामकाजी महिलाओं की राय जानने के लिए हुए अध्ययन में पाया गया है कि अब भले ही पुरुष घरेलू कामकाज में पहले की तुलना में अधिक सहयोग करने लगे हैं लेकिन आज भी 57 प्रतिशत पुरुष चाहते हैं कि बच्चों और घर के बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारियां औरतें ही संभाले। जब तक इस मानसिकता में बदलाव नहीं आता काम का बोझ कम नहीं हो सकता।

यूनिवर्सिटी ऑव कंट्री के अध्ययन में सामने आया है कि यूं तो महिलाएं अपराधबोध के भाव का शिकार हर उम्र में बनती हैं पर वयस्क महिलाएं युवतियों की तुलना में अपराधबोध का अधिक शिकार बनती हैं। इस अध्ययन में जो सबसे जरूरी बात सामने आई है उसके मुताबिक महिलाओं में अपराधबोध की सबसे बड़ी वजह वो अपेक्षाएं है जो परिवार और समाज उनसे रखता है। इसके चलते शुरू से ही उनमें असुरक्षा की भावना बसी रहती है। जो बढ़ती उम्र और जिम्मेदारियों के साथ और बढ़ती जाती है। रिश्तों की उलझनों से उपजती ये तनाव भरी परिस्थितियां उन्हें अवसाद की ओर ले जाती हैं।