भारत की NSG सदस्यता के रास्ते में चीन बना रोड़ा

संजीव त्रिवेदी, नई दिल्ली (9 जून): हिंदुस्तान का पूरी दुनिया में डंका बज रहा है। अफगानिस्तान, कतर, स्विट्जरलैंड, अमेरिका और मेक्सिको में प्रधानमंत्री मोदी ने जो दांव चला। उससे पाकिस्तान और चीन दोनों परेशान हो गए हैं। भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में शामिल होना चाहता है। जिसे रोकने के लिए चीन ने दीवार खड़ी कर दी है। अब सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी मदद से भारत चीन के विरोध की दीवार को तोड़ पाएगा? 

बुधवार को अमेरिकी कांग्रेस में प्रधानमंत्री मोदी के लिए 66 बार तालियों की ऐसी गड़गराहट सुनाई पड़ी जो अभूतपूर्व थी। प्रधानमंत्री मोदी और बराक ओबामा की दोस्ती ने हिंदुस्तान और अमेरिका को बहुत करीब ला दिया। हिंदुस्तान एक जमाने से ही परमाणु आपूर्ति समूह यानी NSG में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। हिंदुस्तान का सिर ऊंचा करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी पिछले दो साल में करीब 45 देशों का दौरा कर चुके हैं। अब NSG में भारत की दावेदारी को अमेरिका का पूरा समर्थन मिल रहा है। स्विटजरलैंड और मेक्सिको में भी मोदी की कूटनीति सुपरहिट रही। 

लेकिन, जब अमेरिकी कांग्रेस में मोदी के एक-एक लफ्ज पर तालियां बज रही थीं। मेज थपथपाई जा रही थी, तब चीन आंखे फाड़-फाड़ कर तालियों की इस गड़गड़ाहट के बीच बदलते शक्ति संतुलन का हिंसाब लगा रहा था। पाकिस्तान की सांस फूल रही थी। ऐसे में चीन ने हिंदुस्तान के इरादों पर पानी फेरने का पूरा प्लान तैयार कर लिया है। विएना में NSG की सदस्यता के मुद्दे पर भारत की अपील पर बैठक होनी है । जहां कोई भी फैसला आपसी रजामंदी से हो सकता है। अब चीन में भारत की NSG में एंट्री रोकने की ठान ली है।

चीन की दलील ये है कि भारत ने NSG की सदस्यता के लिए जरूरी परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किए हैं और अगर भारत के लिए इस अनिवार्यता को समाप्त किया जाता है तो फिर NSG की सदस्यता के लिए भारत के साथ पाकिस्तान के आवेदन पर भी विचार होना ही चाहिए। विएना में हिंदुस्तान का बढ़ता दम देखते हुए पाकिस्तान ने खतरनाक जाल बिछाया। पाकिस्तान ने तुरंत अपनी कूटनीति को टॉप गियर में पहुंचा दिया।

पाकिस्तान ने रूस, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे NSG के सदस्य देशों से बात कर भरोसा ले लिया है कि अगर हिंदुस्तान को NSG की सदस्यता मिले तो फिर पाकिस्तान को भी मिले। बड़ा सच यही है कि ड्रैगन नहीं चाहता कि भारत मजबूत बने। पाकिस्तान को भी हिंदुस्तान का बढ़ता दम हजम नहीं हो रहा है। ऐसे में चीन और पाकिस्तान की दोस्ती और मजबूत होती जा रही है। अब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या भारत विएना में चीन की दीवार तोड़ पाएगा? 

चीन की नाराजगी की वजह है हाल में भारत और अमेरिका की गहरी दोस्ती - जिसे चीन अपने लिए खतरा मानता है। लिहाजा NSG की सदस्यता में रोड़े अटकाने से लेकर हर अंतर्राष्ट्रीय मामले में चीन भारत के मुकाबले पाकिस्तान की तरफदारी शुरु कर दी है। बुधवार को जब प्रधानमंत्री अमेरिकी कांग्रेस में भाषण देने वाले थे तो बीजिंग से प्रकाशित चीनी सरकार द्वारा चलाए गए अखबार Global Times के संपादकीय में लिखा गया कि "चीन को रोकने और एक गुट के बदले दूसरे गुट में शामिल होने की नीति के जरिए भारत प्रगति नहीं कर सकता।" 

कूटनीति में नैतिकता की दुहाई देने वाले चीन ने हालांकि खुद पर इस सिद्धांत को लागू नहीं किया है। ये सारी दुनिया जानती है कि NSG के सदस्य होने के बावजूद चीन ने पूर्व में पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को चुपके-चुपके खूब मदद पहुंचाई। जबकि पाकिस्तान ने इसी मदद से बनी तकनीक और हथियार को उत्तर कोरिया और लीबिया जैसे गैर-जिम्मेदार मुल्कों को बेच डाला।

48 सदस्यों वाले परमाणु संपन्न देशों के समूह में 49वां देश बनते ही भारत को परमाणु बिजली बनाने की सुविधाएं शुरु हो जाएंगी। इतना ही नहीं भारत परमाणु तकनीक की खरीद-बिक्री के भी काबिल हो जाएगा। लेकिन NSG की सदस्यता के लिए विएना में भारत का मुकाबला पेचिदा कूटनीति से है और चीन इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा। मतलब, भारत के लिए NSG की सदस्यता की राह अब भी आसान नहीं है।