दवाओं पर ऐसे मोटी कमाई करते हैं प्राइवेट हॉस्पिटल

नई दिल्ली(24 जुलाई): प्राइवेट अस्पताल दवाओं और डिवाइस में किस तरह मरीजों की जेब पर डाका डालते हैं आप जानकर हैरान हो जाएंगे। क्वॉलिटी के नाम पर वे मरीजों को बाहर से दवा खरीदने से मना करते हैं और उसी दवा एवं चिकित्सीय उपकरण को भारी कीमत पर मरीजों को बेचते हैं। इस तरह से वे 15 से 35 फीसदी प्रॉफिट कमाते हैं।

लेकिन, सिर्फ क्वॉलिटी ही एकमात्र इशू नहीं है जिसकी वजह से अस्पताल ज्यादा से ज्यादा महंगे विकल्प मरीजों पर थोपते हैं। इसके पीछे प्रॉफिट का मार्जिन भी प्रमुख कारण है। एक वेबसाइट के मुताबिक जोमेटा स्टॉकिस्ट को 13,000 रुपये में बेची जाती है यानी अस्पताल को इस पर 2,200 रुपये का बड़ा प्रॉफिट होता है। स्पष्ट है कि 2,800 रुपये वाले इंजेक्शन में इतना फायदा नहीं होगा।

आइये अब मेरोपीनम का उदाहरण लेते हैं जो बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाला ऐंटिबायॉटिक है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर गंभीर संक्रमण वाले मरीजों के लिए आईसीयू में किया जाता है। सिप्ला ब्रैंड के मेरोक्रिट को एक टॉप अस्पताल 2,965 रुपये प्रति ग्राम बेचता है। एक व्यस्क व्यक्ति को करीब 10 दिनों तक इसकी 1-2 ग्राम खुराक लेनी होती है। यानी एक मरीज को सिर्फ एक ऐंटिबायॉटिक पर 90,000 रुपये से 1.8 लाख रुपये खर्च करना पड़ता है। मेरोक्रिट अस्पतालों को 700-900 रुपये प्रति ग्राम के हिसाब से बेची जाती है। इस तरह से अस्पताल सिर्फ एक मरीज से 70,000 रुपये से 1.4 लाख रुपये तक कमाई कर लेता है।

जुवेंट्स द्वारा निर्मित मेरोपीनम के एक ग्राम की कीमत 698 रुपये है ल्युपिन द्वारा निर्मित एक खुराक की कीमत 988 रुपये। अस्पताल ल्युपिन ब्रैंड की मेरोट्रॉल को 600 रुपये ग्राम के हिसाब से खरीदते हैं। मरीज से अगर एमआरपी भी वसूली जाती है तो अस्पतालों को हर ग्राम में 400 रुपये का प्रॉफिट होता है और इस तरह से ज्यादा महंगे नहीं समझे जाने वाले अस्पताल भी दस दिन में एक ऐंटिबायॉटिक्स से एक मरीज से 12,000 से 24,000 रुपये कमा लेते हैं।'

सिर्फ बात दवाओं तक सीमित नहीं है, अस्पताल इलाज में इस्तेमाल होने वाली हर चीजों जैसे सिरिंज और कैथेटर्स से लेकर बैंडेज और डायपर्स तक भारी डिस्काउंट पर खरीदते हैं और मरीजों को एमआरपी पर बेचते हैं। मरीजों को क्वॉलिटी का हवाला देकर बाहर से दवाएं और उपकरण खरीदने से मना किया जाता है। इस तरह से अस्पतालों का फायदा ही फायदा होती है।