INSIDE STORY: बलूचिस्तान में जुल्म की दास्तान, PAK से क्यों अलग चाहता है पहचान?

डॉ. संदीप कोहली

नई दिल्ली (16 अगस्त): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 70वें स्वतंत्रता दिवस पर बलूचिस्तान और पीओके का जिक्र क्या किया, पाकिस्तान इतना डर गया कि शरीफ सरकार ने आनन-फानन में बलूचिस्तान के निकाले गए नेताओें को बातचीत का न्योता भेज दिया। दूसरी तरफ आजादी की मांग को लेकर बलूचिस्तान में जगह-जगह हो रहे जलसों और प्रदर्शनों की खबरें आ रही है। यह पहली बार है कि लाल किले की प्राचीर से किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के नियंत्रण वाले अशांत क्षेत्रों का जिर्क कर उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है। दरअसल बलूचिस्तान और पीओके के निर्वासित लोग भारत से समर्थन की मांग लंबे समय से करते रहे हैं। भारत में भी बलूचिस्तान में हो रहे अत्याचारों पर आवाज उठाई जाती रही है। आईए जानते हैं कि आखिर क्या है बलूचिस्तान का पूरा विवाद और यहां के लोग क्यों चाहते हैं पाकिस्तान से आजादी...  

- बलूचिस्तान ईरान और पाकिस्तान के बीच का हिस्सा है।  - बलूचिस्तान पूरे पाकिस्तानी प्रांत का 44 फिसदी हिस्सा है। - पर यहां पाक की कुल आबादी के मात्र 5 फिसदी लोग रहते हैं। - 19 करोड़ पाक आबादी में से 1.3 करोड़ लोग ही यहां रहते हैं। - पाकिस्तान में 7 करोड़ मतदाताओं में से सिर्फ 40 लाख वोटर बलूचिस्तान में हैं। - नेशनल एसेंबली की 342 सीटों में बलूचिस्तान से सिर्फ 17 सीटें बलूचिस्तान में हैं। - जिनमें से 14 सामान्य हैं और तीन महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं। - बलोच, बलूचिस्तान प्रान्त में रहने वाले मुख्य लोग है।  - इनकी भाषा भी बलोच है जो ईरानी भाषा से मिलती जुलती है। - इसमें प्राचीन अवस्ताई भाषा की झलक मिलती है  - जो वैदिक संस्कृत की बड़ी करीबी भाषा मानी जाती है। - बलोच लोग कबीलों में पहाड़ी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहते हैं। - बलूचिस्तान में खनिज और गैस प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। - इसी पर कब्जे को लेकर पाकिस्तानी सेना वहां जुर्म ढहा रही है। - 1948, 1958-59, 1962-63 और 1973-77 में यहां सैन्य अभियान चलाए। - कब्जे के बावजूद यह सूबा है पूरी तरह से कभी पाक हुकूमत के कब्जे में नहीं रहा। - बलूचिस्तान में पाकिस्तान सरकार की नहीं कबीलाई सरदारों की चलती है।  - धूल भरी आंधी, रेतीला इलाका, बंजर जमीन और कबीले ये बलूचिस्तान की असली तस्वीर है।  - इन कबीलों का अपना कानून है, इसमें हाथ के बदले हाथ और सिर के बदले सिर लेने की परंपरा है।  - आजादी की मांग तो 1948 से ही उठाई जा रही है, लेकिन 2000 के बाद से आग और भड़क गई। - यही वजह है कि कई बलूच नेताओं को दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ रही है। 

बलूचिस्तान का इतिहास

ब्रिटिश राज में बलूचिस्तान ब्रिटिश इंडिया में ही आता था। अंग्रेजी हुकूमत के वक्त बलूचिस्तान चार रियासतों में बंटा हुआ था। मकरान, लसबेला, खरान और कलात। इनमें खारन और लसबेला पर कलात के खान ही राज करा करते थे। 1947 में भारत की आजादी के बाद बलूचिस्तान पाकिस्तान के हिस्से में आया था। 

1947 से पहले- 1839 में पहली बार ब्रिटिश बलूचिस्तान में घुसे थे। 1869 में कलात रियासत ने ब्रिटिश आधिपत्य को स्वीकार कर लिया था। आजादी की जंग में 1931 में कलात स्टेट नेशनल पार्टी का जन्म हुआ। लेकिन खानों के समूह Khanate ने इसे खारिज कर दिया। फिर 1939 में दो पार्टियों का जन्म हुआ। पहली प्रो इंडियन नेशनल कांग्रेस अंजुमन और दूसरी वतन मुस्लिम लीग थी। 4 अगस्त 1947 को कलात ने अपने आप को आजाद घोषित कर दिया।

1947 से बाद- पाकिस्तान बनने से तीन महीने पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने कलात के अधीन पूरे बलूचिस्तान की स्वतंत्रता और उसके पाकिस्तान में विलय पर अंग्रेजी हुकूमत से बातचीत की। जिन्ना, 'खान आफ कलात' मीर अहमद यार खान और वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के बीच कई दौर बैठक हुई।

जिन्ना ने दिया कलात के खानों को धोखा-  फरवरी, 1948 में खान को लिखे पत्र में जिन्ना ने कहा, मैं आपको सलाह देता हूं कि अब बिना देर किए कलात का पाक में विलय कर दीजिए। कुछ समय बाद खान ने पत्र का जवाब दिया, जिसमें कहा गया कि विलय के मसले पर संसद के दोनों सदनों की बैठक बुलाई गई है। जो राय बनेगी, आपको सूचित कर दी जाएगी। 

जिन्ना ने कब्जे के लिए सेना भेजी- मीर अहमद यार खान ने इस पर आपत्ति जताई और दलील दी कि पाकिस्तान ने समझौते का उल्लंघन किया है। मोहम्मद अली जिन्ना ने 26 मार्च 1948 को बलूचिस्तान को कब्जे में करने के लिए थल और वायुसेना भेजी। सेना बलूचिस्तान के तटीय इलाकों पासनी, जिवानी और तुरबत में घुस गई। सेना और वायुसेना ने कलात के शासकों को हराकर राजधानी क्वेटा पर कब्जा कर लिया।

1948 में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ फूंका बिगुल- मई 1948 में अब्दुल करीब खान ने पाक सरकार के खिलाफ अलगाव का बिगुल फूंका और अफगानिस्तान से पाक सैनिकों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया जो अब तक जारी है। 

1960 में विद्रोह- 14 अक्टूबर 1955 कलात को पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया। लेकिन 1960 के दशक में नवाब नवरोज खान ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया और पाकिस्तान के खिलाफ जंग शुरू कर दी, लेकिन 15 मई 1959 को नवाब नवरोज खान ने हार स्वीकार कर ली और पाकिस्तान सरकार के साथ समझौता किया। नवरोज खान के बेटों और भतीजों को फांसी दे दी गई। नवाब की भी 1964 में जेल के अंदर ही मौत हो गई। 

बलूचिस्तान में नरसंहार- 1970 में बलूचिस्तान में गृह युद्ध छिड़ गया। गुल खान नासिर और अकबर खान बगुती जैसे बड़े बलोच नेता इसकी अगुवाई कर रहे थे। गृह युद्ध के दौरान पाक सेना ने बलूचिस्तान में नरसंहार मचा दिया। नेताओं को जेलों में ठूस दिया गया। विद्रोहियों को चुन-चुन कर मारा गया। मरने वालों का आंकड़ा 6 हजार पहुंच गया था। पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान ने बलूचिस्तान को पाक का चौथा राज्य घोषित कर दिया। 

मार्शल लॉ किया लागू- जुल्फिकार भुट्टो ने 1973-74 के दौरान वहां मार्शल लॉ लागू कर दिया और वहां कि सरकार को बर्खास्त कर दिया। उस दौरान बलूचिस्तानी आंदोलनकारियों के ऊपर दमनात्मक कार्रवाई भी हुई और 7 से 8 हजार बलूचिस्तानी जनता को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन साथ ही साथ पाकिस्तान की सेना के भी चार सौ से ज्यादा जवान मारे गये।

कई हथियारबंद अलगाववादी सक्रिय - पाकिस्तान से आजादी के लिए कई हथियारबंद अलगाववादी समूह बलूचिस्तान में सक्रिय हैं। - बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और लश्कर-ए-बलूचिस्तान प्रमुख अलगाववादी समूह हैं। - पाकिस्तान सरकार पर बलूच आंदोलन को दबाने के आरोप लगते रहे हैं। - पाकिस्तान सेना हजारों बलूचियों को नजरबंद कर चुकी है। - सरकारी नौकरियों में बलूचियों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है। - स्थानीय बलूच नेताओं के प्रभाव को खत्म करने के लिए पाक सेना ने तालिबानियों की मदद ली। - पाकिस्तानी सेना ने इस इलाके में मीडिया कवरेज पर भी रोक लगा रखी है। - खुफिया एजेंसियां अक्सर इस इलाके में काम कर रहे विदेशियों को प्रताड़ित करती रहती हैं। - बलूच नेताओं के मुताबिक पाकिस्तानी सेना यहां "Kill and Dump" की पॉलिसी पर चल रही है।  - पुरुषों की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार के जरिए विद्रोह को दबाने में लगी हैं।

2005 में नवाब अखबर खान बुगती ने सरकार के सामने रखी 15 मांगे- 2005 में बलूच के नेता नवाब अखबर खान बुगती और मीर बलाच मार्री ने पाक सरकार के सामने 15 सूत्री मांग रखी। इनमें प्रांत के संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण और सैनिक ठिकानों के निर्माण पर रोक जैसे मुद्दे शामिल थे। इन्हें नकार दिया गया और संघर्ष चलता रहा।

विद्रोह को दबाने के लिए नवाब अखबर खान बुगती को मार दिया पाकिस्तान ने- अगस्त 2006 में 79 साल के अखबर खान की सेना से मुठभेड़ में बेहरहमी से मार दिया। इसी संघर्ष में 60 पाकिस्तानी सैनिक और 7 अधिकारियों की जान भी चली गई

बलूचिस्तान हिंसा और दमन के आग में झुलस रहा है, 5वां संघर्ष जारी- 2000 के बाद से विरोध की आग और भड़क गई।  पाकिस्तान के खिलाफ 5वें बलूच संघर्ष की शुरुआत 2003 में शुरू हुई। स्वायत्तता की मांग करने वाले कुछ बलूच समूहों ने गुरिल्ला हमलों से की थी। यह समूह बढ़ते-बढ़ते अलगाववादी बन गए। इनके अधिकांश नेता विदेशों में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं और अब पाकिस्तान से आजादी मांग रहे हैं। 

पाकिस्तानी सेना ने किए 19 हजार कत्ल

- कबीलों के कब्जे वाले 95 फीसदी क्षेत्र को 'B एरिया' कहा जाता है  - जबकि 5 फीसदी के बाकी इलाके को 'A एरिया' कहते हैं।  - इस इलाके पर पाकिस्तान पुलिस और सेना का कब्जा है।  - पाकिस्तान B एरिया को A में तब्दील करना चाहता है। - इसके लिए जोर जबरदस्ती के चलते बलूचिस्तान में विरोध की आग भड़क चुकी है। - बलूचिस्तान के लोग अब पाकिस्तान से अलग देश की मांग करने लगे हैं।  - हर साल बलूचिस्तान में 27 मार्च को काला दिन मनाया जाता है।  - बलूच नेता बलाच पुरदली ने खोली पाकिस्तान की पोल। - पुरदली के मुताबिक पाकिस्तान अब तक करीब 19 हजार बलूचियों को मार चुका है। 

अलग-अलग संस्थाओं की रिपोर्ट खोलती है पोल-

यूएनपीओ(UNREPRESENTED NATIONS AND PEOPLES ORGANIZATION)की रिपोर्ट के मुताबिक 1948 के बाद से अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और लाखों बेघर हो चुके हैं।

यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक 33 हजार बलोच बच्चे विकलांग हो चुके हैं। 8 से 10 बच्चे रोजाना भूखमरी की वजह से मर रहे हैं। सैंकड़ों स्कूल बमबारी में बर्बाद हो चुके हैं। 2006 में 84 हजार लोग जिसमें 26 हजार महिलाएं और 33 हजार बच्चे डेरा बुगती और कोह्लू से पलायन कर चुके हैं।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के मुताबिक(Human Rights Commission of Pakistan) पाकिस्तानी सेना की कार्यवाही में 2.5 लाख लोग डेरी बुगती से पलायन कर चुके हैं और 10 हजार लोग भूखमरी का शिकार हुए हैं।

जून 2011 की रिपोर्ट में कहा है कि 140 लापता व्यक्तियों के शव जुलाई 2010 से मई 2011 के बीच बरामद हुए हैं।हाल ही में सुरक्षा बलों की तरफ से बलूच लोगों और नेताओं की हत्याओं ने इस क्षेत्र में तनाव बढ़ाया है।

पाकिस्तानी सेना ने बलुचिस्तान के खिलाफ तालिबानियों की मदद की- तालिबान शुरू से ही पाकिस्तान में आतंकी हमले कर बलुचिस्तान में अपना हक जताता रहा है। सैन्य बलों द्वारा बलूच लोगों पर अत्याचार और हिंसा का अंतहीन सिलसिला पिछले 16 सालों से बदस्तूर जारी है। शुरू में पाकिस्तानी सेना ने तालिबान से हजारों बलूचियों को अगवा कर उन्हें तरह-तरह की यातना दिलवाई और बाद में उनकी हत्या करवा दी।

नवाज सरकार मुद्दे को सुलझाने में असफल- पाकिस्तानी सेना, अर्धसैनिक बल और सरकार हमेशा से बलूचिस्तान में हिंसा के लिए ज़िम्मेदार होने से इनकार करते रहे हैं। इसके लिए वो इस इलाक़े में सक्रिय हथियारबंद समूहों को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं। इस तरह ग़ायब हो रहे लोगों के कुछ मामलों को पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में लिया है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की सरकार इस मुद्दे से जुड़ पाने में असफल रही है। 

बलूचिस्तान के पास कौन सा खजाना है?

- बलूचिस्तान के पास है एक ऐसा खजाना जो पाकिस्तान के हाथ लग जाए तो उसकी तकदीर बदल जाए।  - इस खजाने पर कब्जे के लिए परवेज मुशर्रफ ने जबरदस्त कोशिश की, लेकिन सिर धुनने के अलावा उन्हें कुछ न मिला।  - अब पाक सरकार भी इसी कोशिश में जुटी है। बलूचिस्तान का यही खजाना सारी आफत की जड़ है।  - दरअसल बलूचिस्तान के इस रेतीले इलाके में यूरेनियम, पेट्रोल, नेचुरल गैस, तांबा और ढेर सारी दूसरी धातु।  - पाकिस्तान इस खजाने का दोहन करना चाहता है।  - यहां के सुई नामक जगह पर मिलनेवाली गैस से पूरे पाकिस्तान की आधी से ज्यादा जरूरत पूरी होती है।  - लेकिन इसके बदले स्थानीय बलूची लोगों को न तो रोजगार मिला और न ही रॉयल्टी।  - हर मौके पर पाकिस्तान ने दिखाया बलूचियों को ठेंगा। विरोध की आवाज को कुचलने की कोशिश की गई। 

1952 में इस क्षेत्र में गैस भंडार का पता चला- 1952 में इस क्षेत्र के डेरा बुगती में गैस के भंडार का पता लगाया गया। 1954 से यहां से गैस का उत्पादन शुरू हुआ और उसका लाभ पूरे पाकिस्तान को मिलने लगा लेकिन बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा को नजरअंदाज किया गया।

ग्वादार पोर्ट चीन के हवाले- ग्वादार पोर्ट बलूचिस्तान प्रांत में पड़ने वाले बड़ा बंदरगाह है। हिंद महासागर में अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति के तहत चीनी इंजीनियर मकरान तट पर ग्वादर में पाकिस्तान के दूसरे प्रमुख बंदरगाह के निर्माण में लगे हुए हैं। इस बंदरगाह को आसानी से चीनी नौसेना के जहाजों के लिए एक नौसेना बेस के तौर पर खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। 

चीन बना रहा है सड़कें- इसी क्षेत्र के चगाई मरूस्थल में साल 2002 से सड़क परियोजना शुरू की गई। जो कि चीन के साथ तांबा, सोना और चांदी उत्पादन करने की पाकिस्तानी योजना है। इससे प्राप्त लाभ में चीन का हिस्सा 75 प्रतिशत है और 25 प्रतिशत पाकिस्तान का. इस 25 प्रतिशत में से इस क्षेत्र को महज 2 प्रतिशत की हिस्सेदारी दी गई है।