'मर्द 4 बीवियां रख सकता है तो मुस्लिम औरत चार शौहर क्यों नहीं'

कोझिकोड :  अगर एक मुस्लिम शख्स चार पत्नियां रख सकता है तो एक मुस्लिम महिला चार पति क्यों नहीं रख सकती? ये सवाल किया है केरल हाईकोर्ट के जज बी केमाल पाशा ने।

जस्टिस पाशा ने ये सवाल एक मुस्लिम महिला फोरम की ओर से आयोजित सेमिनार मे किया। उन्होंने कहा कि एक सही ज़िंदगी जीने के लिए महिला या पुरुष को एक ही पार्टनर की ज़रूरत होती है।

जस्टिस पाशा ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ ने महिलाओं के साथ दहेज, तलाक और उत्तराधिकार के मामले में भेदभाव किया है, जो कि इन मुद्दों पर कुरआन की स्थिति से विरोधाभासी है।

जज ने कहा- "ये भेदभाव है और धार्मिक नेता, जिन्होंने ऐसी स्थिति बनाई है वो इसे संबोधित करने से बच नहीं सकते। उन्हें अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि वो फैसले देने के लिए योग्य हैं। जिन लोगों के लिए ये फैसले होते हैं, वो भी इस पर सोचें।"    जस्टिस पासा निसा और पुनारजानी चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित समारोह में बोल रहे थे।

जज ने कहा कि कुरआन ने वास्तव में महिलाओं को फ़साख़ के जरिए न्यायिक क्षेत्र से बाहर तलाक का अधिकार दिया। वही मुस्लिम पर्सनल लॉ पुरुषों को तो तलाक का अधिकार देता है लेकिन महिलाओं को इसे नहीं दिया। जस्टिस पाशा ने कहा कि संविधान पुरुष और महिलाएं, दोनों को बराबरी का अधिकार देता है। देश के सभी क़ानून अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) की निगरानी के दायरे में आते हैं।

जज ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ की कई खामियां इस वजह से है क्योंकि इसे सही तरीके से कोडिफाइड नहीं किया गया।  

जस्टिस पाशा ने कहा, अभी अदालतें पहले की नज़ीर और क़ानूनी विशेषज्ञ डी एफ मुल्ला के संकलित किए मोहम्मडन लॉ के आधार पर फैसले देती हैं। क्या लागू किया जा रहा है वो पूर्णत:  कुरआन की आयतों के आधार पर नहीं है। पहले पर्सनल लॉ को कुरआन के सिद्दांतों के हिसाब से कोडिफाइड होने दीजिए, जहां महिलाओं और पुरुषों के लिए बराबरी की बात कही गई है।