नामधारी संप्रदाय की गुरुमाता की हत्या के पीछे हो सकता है यह कारण

मोहित मल्होत्रा, लुधियाना (5 अप्रैल): नामधारी संप्रदाय की गुरुमाता चंद कौर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल खुद पहुंचे थे, लेकिन इस वारदात के बाद से ही जो एक सवाल खड़ा हुआ है उसे वारदात के 32 घंटे बाद भी नहीं सुलझाया जा सका कि आखिर किसी की 90 साल की गुरुमाता से भला क्या दुश्मनी थी। गुरुमाता की हत्या के पीछे कहीं गद्दी का विवाद तो नहीं है।

नामधारी संप्रदाय की गुरुमाता की हत्या के बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था, क्योंकि नामधारी संप्रदाय जाना ही जाता है, शांति के लिए, सदभावना के लिए और इस बात की तस्दीक करती है, उनकी ये सफेद ड्रेस। हत्यारों ने पहले माथा टेका और फिर गुरुमाता को निशाने पर लेते हुए दाग दी दो गोलियां। एक गोली गुरुमाता के सीने पर लगी और दूसरी गोली 90 साल की गुरुमाता के पेट में लगी। जिस वक्त ये वारदात हुए गुरुमाता का सुरक्षाकर्मी उनके साथ नहीं था। हत्यारे तुरंत ही फरार हो गए। गुरुमाता को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिसके बाद खबर आई कि गुरुमाता अब इस दुनिया में नहीं हैं।

नामधारी संप्रदाय की स्थापना 1870 के करीब हुई। गुरु राम ने इस संप्रदाय की स्थापना की थी, उस वक्त हिन्दुस्तान में अंग्रेजी शासन थी। इसलिए राम सिंह आजादी के आंदोलन में कूद और अंडरग्राउंड हो गए, लेकिन अंडरग्राउन्ड होने से पहले नामधारी संप्रदाय की जिम्मेदारी गुरू राम सिंह ने अपने छोटे भाई हरि सिंह को गद्दी सौंप दी।

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