कश्मीर में पत्थर उठाने के लिए भड़काने वाले कौन? जानिए...

डॉ. संदीप कोहली, नई दिल्ली (2 अगस्त):  कश्मीर में लगातार 25वें दिन कर्फ्यू और प्रतिबंध जारी हैं। दक्षिणी कश्मीर में अभी भी तनाव बना हुआ है। श्रीनगर शहर समेत कई जिलों में धारा 144 लागू है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सीधे अलगाववादियों को आड़े हाथों लिया है। बारामुला में सिविल सोसायटी सदस्यों से मुलाकात ने दौरान महबूबा मुफ्ती ने कहा कुछ लोग अपने स्वार्थ की खातिर हिंसा को बढ़ावा भी दे रहे हैं। जब रियासत में आर्थिक गतिविधियां रफ्तार पकड़ने लगती हैं तभी घाटी में हिंसा क्यों भड़काई जाती है। महबूबा ने कहा हिंसा का सबसे ज्यादा असर युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। जहां एक तरफ हमारे बच्चे, बच्चियां राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परचम फहरा रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीब घरों के युवा हाथों में पेन की जगह पत्थर पकड़े हुए हैं। कश्मीर के युवाओं को पुस्तक से पत्थर की तरफ ले जाने वाले कौन लोग है? आइए जानते हैं...

महबूबा मुफ्ती के बयान की मुख्य बातें

- लोगों को विचार करना चाहिए कि कैसे कश्मीर के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक संरचना को व्यवस्थित बर्बाद किया जा रहा है।  - टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए जब भी आर्थिक गतिविधियां शुरू होती है, इस तरह की भयानक स्थिती पैदा कर दी जाती है।  - शैक्षिक और आर्थिक अभाव और सामाजिक विकार की ओर कश्मीरियों को धकेलने के पीछे एक बड़ी साजिष की जा रही है।  - कश्मीर में हिंसक विरोध प्रदर्शन के समर्थक केवल अपने ही लोगों के लिए मौत और विनाश ला रहे हैं। - युवाओं महिलाओं और बच्चों को बर्गलाया जा रहा है, धार्मिक स्थलों से एनाउंसमेन्ट कर विरोध-प्रदर्शन करने को कहा जाता है। - कश्मीरी नौजवान की बात करने वाले ही कश्मीर को तबाह कर रहे हैं।  - विरोध जताने का हक हरेक को है, लेकिन यह कौन-सा विरोध है जहां एक दस साल का बच्चा घर से रोटी कमाने निकले 70 साल के बुजुर्ग को पीटे।  - स्कूटी चलाने वाली लड़कियों को जलाने की धमकी दी जाए। यह कौन-सा कश्मीर बन रहा है, ऐसा कश्मीर तो नहीं चाहिए। - कश्मीर ने पहले ही हिंसा में युवाओं की एक पीढ़ी को खो दिया है और अब युवाओं की जानें हम सहन नहीं कर सकते। 

25वें दिन भी घाटी बंद.... कश्मीर में लगातार 25वें दिन कर्फ्यू और प्रतिबंध जारी हैं। जम्मू-श्रीनगर और श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात रात के दौरान शुरू हुआ। स्वास्थ्य, जल आपूर्ति, बिजली, खाद्य आपूर्ति, पुलिस और अन्य सेवाओं को छोड़कर रेल सेवा, शैक्षिक संस्थान, बैंक, डाकघर और सरकारी कार्यालय पिछले 24 दिनों से बंद हैं।  

कश्मीर में लगे पोस्टर- लड़कियां स्कूटी न चलाएं वर्ना गाड़ी समेत जला दिया जाएगा... पोस्टर में वार्निंग दी गई है कि लड़कियां स्कूटी न चलाएं। उसमें लिखा है, 'हम सभी लड़कियों से गुजारिश करते हैं कि स्कूटी न चलाएं। अगर हमने किसी लड़की को स्कूटी चलाते देख लिया तो स्कूटी और लड़की दोनों को जला देंगे।' अंग्रेजी और उर्दू में लिखे पोस्टर ‘संघबाज एसोसिएशन ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ के नाम से लगाए गए हैं। उसके साथ आगे लिखा है- कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों का संगठन।

कश्मीर में दीवारों पर लिखे जा रहे हैं भारत विरोधी नारे... अलगाववादी अपने-अपने इलाकों में दीवारों पर भारत विरोधी नारे लिखे जा रहे हैं। खुद अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने भी दीवारों पर ऐसे ही नारे लिखे। 

15 अगस्त तक बढ़ाना चाहते हैं हड़ताल... अलगाववादी नेताओं के आव्हान पर हड़ताल 5 अगस्त तक बढ़ाई गई है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अलगाववादी इसे 15 अगस्त तक ले जाना चाहते हैं। आरोप है कि इसके लिए पत्थरबाजों को पैसे देकर जगह-जगह हिंसा फैलाई जा रही है। हड़ताल से स्कूल-कॉलेज बंद हैं। ऐसे में, बच्चे 15 अगस्त को होने वाले प्रोग्राम एवं परेड में शामिल होने की तैयारी नहीं कर पाएंगे।

कौन हैं ये अलगाववादी... क्यों फैला रहे हैं कश्मीर में हिंसा

कश्मीर में 1989 से अलगाववादी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। जब पाकिस्तान भारत को तीन युद्धों में नहीं हरा पाया तो उसने भारत के खिलाफ छद्म युद्ध (Proxy War) की शुरूआत की। भारत के खिलाफ हिंसक आंदोलनों को बढ़ावा दिया गया। कश्मीरी युवाओं को भारत के खिलाफ भड़काया गया। पाकिस्तान ने दोहरी चाल चलते हुए एक तरफ पाकिस्तान में आतंकवाद को पाला-पोसा तो दूसरी तरफ कश्मीर में अलगाववादियों को बढ़ावा दिया। कश्मीर में रोजाना हिंसक प्रदर्शन होने लगे। कश्मीरी पंडितों की हत्या की जाने लगी। घाटी में चारों ओर एके-47 लहराती नजर आने लगीं। 3 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों को अलगाववादियों ने अपना घर, जमीन, व्यापार सबकुछ छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। 23 अलग-अलग अलगाववादियों ने मिलकर संगठन बनाया 'हुर्रियत कॉन्फ्रेंस'। गठन के दो साल के भीतर ही अलगाववादियों में भी मतभेद होने लगे मीरवायज उमर फारुक, प्रोफेसर अब्दुल गनी भट और बिलाल लोन जैसे नेता मुख्यधारा में शामिल होना चाहते थे। लेकिन कट्टरपंथी धड़े की कमान संभालने वाले सैय्यद अली शाह गिलानी को यह मंजूर नहीं था।

क्या है हुर्रियत कॉन्फ्रेंस

- हुर्रियत का गठन 1993 में 23 अलगाववादी दलों के शीर्ष संगठन के रूप में हुआ था। - इसकी माँग कश्मीरियों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिए जाने की है। - इसमें 23 अलग-अलग गुट थे, जिनका बाद में बिखराव हो गया। - हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की कार्यकारी परिषद में सिर्फ सात गुटों को ही प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ।           * पीपुल्स कांफ्रेंस  (अब्दुल गनी लोन)           * जमात-ए-इस्लामी (अली शाह गिलानी)           * अवामी एक्शन कमेटी (मिरवाइज उमर फारूख)           * पीपुल्स लीग (शेख अब्दुल अजीज)           * एतिहाद -उल -मुस्लिमीन (मौलवी अब्बास अंसारी )           * मुस्लिम कांफ्रेंस (अब्दुल गनी बट)           * जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (यासीन मलिक) - जेकेएलएफ और पीपुल्स लीग के अलावा बाकी सभी गुट चुनाव प्रक्रिया में शामिल थे लेकिन सरकार में शामिल होने के लिए उन्हें पर्याप्त जनमत नहीं मिला। - लेकिन जल्द ही यह पार्टी 2002 के चुनाव के बाद बिखर गयी, जिसमें से पीपुल्स कांफ्रेस (अब्दुल गनी लोन) ने अपने आपको अलग कर लिया था। - सैयद अली शाह गिलानी ने उनपर आरोप लगाया कि 2002 के चुनाव में उन्होंने नकली उम्मीदवार खड़े किए, इसको लेकर हुर्रियत में विभाजन हो गया। - इसी साल 21 मई, 2002 को अब्दुल गनी लोन की श्रीनगर में हत्या कर दी गई। - इसके बाद अब्दुल गनी लोन के बेटे सज्जाद गनी लोन ने भाई बिलाल गनी लोन के साथ फरवरी, 2004 में पीपुल्स कांफ्रेस का अपना अलग धड़ा बनाया। - गिलानी ने 23 सदस्यों में से पाकिस्तान समर्थक आठ सदस्यों को अपने साथ मिला लिया, गिलानी के इस गुट को कट्टरपंथी गुट कहा गया। - जिसके बाद यह पार्टी दो टुकड़ों में बिखर गयी, एक गुट उदारवादी जिसका मुखिया मीरवाइज बना जबकि दूसरा कट्टर बना जिसका नेता गिलानी बना। - बाद में मीरवाइज के गुट में में दो फाड़ हो गए और तीसरा गुट सामने आया शब्बीर शाह और नईम अहमद खान का है। - बाद में हुर्रियत कई गुटों में बंट गया जिसमें यासीन मलिक समेत करीब 5 अलगाववादी संगठन हैं जो हुर्रियत कांफ्रेंस के किसी भी गुट में शामिल नहीं हैं।

उदारवादी बिखरे, कट्टर नेताओं की बढ़ी ताकत 

- अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में 22 जनवरी 2004 को दिल्ली के नॉर्थब्लाक तक हुर्रियत नेता पहुंचे थे।  - मनमोहन सिंह के दौर में हुर्रियत नेताओ को पाकिस्तान जाने का वीजा दिया गया।  - इससे उदारवादी गुट के नेात मीरवाइज ने भारत सरकार के साथ परदे के पीछे शुरू की गई बातचीत में भाग लेने की इच्छा जताई। - मीरवाइज मौलवी उमर फारूक के इस प्रस्ताव का सैयद अली शाह गिलानी जैसे कट्टर नेताओं ने विरोध किया। - नवंबर 2009 में अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुक ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की सभी समितियों को भंग कर दिया। - 2014 में शबीर शाह ने मीरवाइज का साथ छोड़ते हुए एक अलग पार्टी जम्मू-कश्मीर हुर्रियत कांफ्रेंस का निर्माण किया। - बाद में 2015 में शाबिर शाह, नईम खान ने हुर्रियत के गिलानी गुट का दामन थाम लिया। - शब्बीर अहमद शाह डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी और नईम खान की नेशनल फ्रंट का विलय गिलानी की अगुवाई वाली हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में हो गया। - अप्रैल 2015 में ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के उदारवादी गुट (मीरवाइज) में दूसरा विभाजन हो गया है - मीरवाइज से अलग हुए इन अलगाववादियों में पूर्व हिज्ब कमांडर व सॉल्वेशन मूवमेंट के चेयरमैन जफर अकबर फतेह,  - पूर्व जेकेएलएफ कमांडर जावेद अहमद मीर के अलावा मुस्लिम ख्वातीन मरकज की यासमीन रजा,  - पीपुल्स लीग के याकूब शेख, सलीम गिलानी, हकीम रशीद व बशीर अंद्राबी शामिल थे। - आज स्थिती यह हो गई है कि अपने घड़े को बचाने और पाकिस्तान से नजदीकी दिखाने के लिए मीरवाइज की रैली में भारत विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं। - हुर्रियत की सियासत पर नजर रखने वालों ने बताया यह विभाजन पूरी तरह पाकिस्तान के दबाव में हुआ था।  - दूसरी तरफ हुर्रियत नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटा रहा पाक उच्चायोग।  - पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित भारत के विरोध के बावजूद गिलानी, लोन और मीरवाइज से अलग-अलग मिलते रहे। - नतीजतन मीरवाइज को झुकना पड़ा, 11 जुलाई 2015 को 12 साल बाद सभी अलगाववादी एक मंच पर आए। - कट्टरपंथी गुट के गिलानी, उदारवादी गुट के उमर फारूक और जेकेएलएफ के यासीन मलिक दावत-ए-इफ्तार पर इक्कठा हुए। - लेकिन पाक उच्चायोग की तमाम कोशिशों के बावजूद बिलाल गनी लोन, अब्दुल गनी बट, मौलाना अंसारी, हिलाल वार, शब्बीर शाह इसमें शामिल नहीं हुए।

कश्मीर के बच्चों से पत्थर फिंकवाते हैं और अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाते हैं कश्मीर के ये अलगाववादी

सैय्यद अली शाह गिलानी(हुर्रियत नेता)- गिलानी का बडा बेटा नईम तथा बहू बजिया पाकिस्तान के रावलपिंडी में डॉक्टर हैं। छोटा बेटा जहूर परिवार के साथ दिल्ली में रहता है। पोता इजहार दिल्ली में एक प्राइवेट एयरलाइन्स कंपनी में काम करता है। बेटी फरहत जेद्दा में रहती है। टीचर है। भाई गुलाम नवी लंदन में रहता है।

यासीन मालिक(हुर्रियत नेता)-  दूसरी मुस्लिम महिलाओं के लिए इस्लामिक ड्रेस कोड का सपोर्ट करते हैं, पर पत्नी के साथ ट्रेन्डी आउटफिट में घुमते हैं। 2015 में यासीन मलिक और पत्नी मुशहाला का फोटो सोशल मीडिया पर हुआ था वायरल।

मीरवाइज उमर फारूक(हुर्रियत नेता)- अमेरिकी मूल की मुस्लिम शीबा मसदी से शादी की है। एक बेटी है, जो मां के साथ अमेरिका में ही रहती है। बहन राबिया फारूक अमेरिका में डॉक्टर है।

मोहम्मद अशरफ सहराई(हुर्रियत नेता)- कभी गिलानी का उत्तराधिकारी माना जा रहा मोहम्मद अशरफ सहराई का बेटा आबिद दुबई में कम्प्यूटर इंजीनियर है।

गुलाम मोहम्मद सुमजी(हुर्रियत नेता)- इनका बेटा जुगनू दिल्ली में पढाई कर रहा है। वह कम उम्र में ही दिल्ली भेज दिया गया। रिश्तेदारों के पास रहकर पढ़ाई कर रहा है।

फरीदा(दुख्तरान ए मिल्लत)- महिला अलगावादी नेता फरीदा का बेटा रूमा मकबूल साउथ अफ्रीका में डॉक्टर है। 2014 के चुनावों मे फरीदा को गिरफ्तार कर लिया गया था।

मसरत आलम(हुर्रियत नेता)- उसके दो बेटे हैं। दोनों की उम्र कम है। वह श्रीनगर के ही एक बड़े स्कूल में पढाई करते हैं। मसरत 2008-10 में प्रदर्शनों का मास्टरमाइंड रहा है।

एयाज अकबर(हुर्रियत नेता)- सैय्यद अली शाह गिलानी गुट के प्रवक्ता एयाज अकबर का बेटा सरवर याकूब पुणे में रहकर मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा है।

आसिया अंद्राबी(दुख्तरान ए मिल्लत)- आसिया अंद्राबी के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा मोहम्मद बिन कासिम मलेशिया में मौसी के साथ रहता है।  मौसी वहीं नौकरी करती है। वह बैचलर ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का कोर्स कर रहा है। छोटा बेटा श्रीनगर में पढ़ाई कर रहा है। एक भतीजा पाकिस्तानी सेना में कैप्टन तथा दूसरा इस्लामाबाद यूनिवर्सिटी में नौकरी करता है।