...जब भावुक हो गईं सोनिया, कहा 'हिंदुस्तान में ही जिऊंगी, हिंदुस्तान में ही मरुंगी', पढ़ें पूरा सफ़र

नई दिल्ली (10 मई): कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भले ही भारतीय मूल की ना हों लेकिन उन्हें भारत में रहते हुए 48 साल हो गए। सवा सौ साल पुरानी पार्टी को संभालते हुए उन्हें करीब 20 साल हो गए लेकिन आज भी उन्हें एक आरोप झेलना पड़ता है विदेशी मूल का। आज भी राजनीतिक विरोधी उनके विदेशी मूल पर निशाना साधते हैं और आज भी सोनिया गांधी को ये साबित करना पड़ता है कि वो भारत की बहू हैं। यानि, इंदिरा गांधी की बहू हैं।

48 साल से सोनिया गांधी ये साबित करने में लगी हैं कि वो हिंदुस्तान की बहू हैं। 48 साल से उन्हें बार बार ये सफाई देनी पड़ रही है कि अब भारत ही उनका घर है। 48 साल में सोनिया गांधी का ये दर्द कई बार छलका कि उनके हिंदुस्तानी होने पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है। एक बार फिर वो दर्द छलका केरल की चुनावी रैली में, जब सोनिया को ये कहना पड़ा कि वो हिंदुस्तान में ही जियेंगी, हिंदुस्तान में ही मरेंगी।

अगस्ता वेस्टलैंड विवाद में तीखे हमले झेल रहीं सोनिया गांधी भावुक थीं ये साफ नजर आ रहा था। भावुक वो इसलिए थीं क्योंकि उनके देशप्रेम पर सवाल उठाया गया, वो भी देश के प्रधानमंत्री की ओर से। पीएम नरेंद्र मोदी ने केरल की ही रैली में एक बार फिर सोनिया गांधी और इटली का नाता जोड़ते हुए उनपर तीखा हमला किया था। 

सालों से विपक्षी दल सोनिया गांधी को विदेशी मूल के मुद्दे पर घेरते आ रहे हैं और सालों से ही सोनिया गांधी उनका जवाब दे रही हैं। पिछले साल दिसंबर में सोनिया ने ये जवाब बेहद ही कड़क अंदाज में दिया था.. इंदिरा गांधी की बहू किसी से नहीं डरतीं। करीब 16 साल पहले भी सोनिया ने इंदिरा गांधी की बहू के तौर पर ही अपना बचाव किया था। ये वो वक्त था जब उन पर विदेश होने के सबसे ज्यादा और तीखे हमले होते थे।

इंदिरा गांधी की बहू सोनिया हर हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार रहती हैं क्योंकि कांग्रेस नेताओं की नजर में वो शेरनी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पर जब जब निशाना लगाया गया। तब तब पूरी कांग्रेस उनके साथ खड़ी रही। सोनिया पर पीएम के इस हमले के बाद कांग्रेस ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामा हुआ। 

तारीख गवाह है कि जब देश में किसी नेता पर व्यक्तिगत हमले ज्यादा तेज हो जाते हैं तो विरोधियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। इमरजेंसी के बाद यही गलती जनता पार्टी सरकार ने की थी। इंदिरा गांधी को वापस सरकार में आने का मौका सरकार ने ही दिया। एक वो भी समय था जब 2014 लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी पर विपक्ष के हमले बेहद तीखे और तेज हो गए थे। नतीजा ये हुआ कि मोदी लहर में सारी पार्टियां धरातल में पहुंच गईं। क्या अब बारी सोनिया गांधी की है। 

विरोधियों को इंदिरा गांधी की बहू होने का रिश्ता याद दिलाने वाली सोनिया गांधी की पार्टी पर पकड़ वैसी ही सख्त है जैसी कभी इंदिरा गांधी की हुआ करती थी। विरोधियों के हमलों का जवाब कब और कैसे दिया जाता है ये हुनर सोनिया गांधी ने इंदिरा गांधी से ही सीखे हैं। विरोधी भी इनकार नहीं करते कि सोनिया गांधी सियासत के हर दांव के आगे कभी हार नहीं मानतीं। 

साल 1968 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर एक विदेशी बहू आई- नाम था सोनिया। इंदिरा गांधी ने इटली मूल की अपनी बहू को अपनाया ना सिर्फ अपनाया बल्कि अपने जैसा बनाया। विदेशी मूल की सोनिया जल्द ही भारत की संस्कृति में रम जाएं इसके लिए इंदिरा ने भी मेहनत की और खुद सोनिया ने भी। गांधी परिवार के करीबी बताते हैं कि इंदिरा गांधी ने घर मे बहू आने के बाद ये आदेश दिया कि अब घर में लोग सिर्फ हिंदी में बात करेंगे। ताकि सोनिया जल्द हिंदी सीख सकें। घर की पूरी जिम्मेदारी इंदिरा ने बहू सोनिया के कंधे पर डाल दी। 

धीरे धीरे सोनिया ने खुद को भारतीय संस्कृति में ढालने की जी तोड़ कोशिश की। अपनी सास इंदिरा के तौर तरीकों को अपनाया। उनकी तरह साड़ियां पहनना शुरू किया। 48 साल पहले भारत में बहू बनकर आईं सोनिया गांधी ने राजनीति के मंच पर दिखने की शुरुआत की राजीव गांधी के साथ। लेकिन किसी नेता के तौर पर नहीं बल्कि गांधी परिवार की बहू के तौर पर। राजनीति में एंट्री को सोनिया गांधी ने कभी पावर की भूख से जोड़ कर नहीं देखा।  

बहू सोनिया ने सियासत के तेवर अपनी सास इंदिरा गांधी से ही सीखे हैं। जनता पार्टी सरकार के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपो में जब इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने पुलिस घर पहुंची थी तब इंदिरा गांदी ने बहू सोनिया से ही अपना सामान पैक करने को कहा था। सोनिया के सामने इंदिरा गिरफ्तार तो हो गईं लेकिन फिर उसके बाद ऐसी विजेता बन कर निकली कि पूरी दुनिया देखती रह गई। आज सोनिया पर भ्रष्टाचार के हमले हो रहे हैं और शिवसेना ने बीजेपी को आगाह किया है कहीं सोनिया के पीछे पड़कर बीजेपी सोनिय़ा को भी इंदिरा न बना दे।

इमरजेन्सी के बाद मिली करारी हार के बाद इंदिरा ने सियासत छोड़ने की बात सोच ली थी लेकिन जनता पार्टी की सरकार इंदिरा गांधी पर हाथ धोकर पीछे पड गई नतीजा एक गिरफ्तारी ने इंदिरा की तकदीर ही बदल दी। आज बहू को 38 साल पहले आंखों के सामने अपने सास के साथ घटी वो पूरी घटना याद है और ये भी अच्छी तरह पता है कि ऐसा ही होता रहा तो आगे क्या हो सकता है। 

सोनिया बहुत कम बोलती है लेकिन 18 सालों से जिस तरह की पकड़ संगठन और सरकार में बहू सोनिया की है ठीक उसी तरह की पकड़ इंदिरा गांधी की भी थी। अब जब विरोधी दल सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर सवाल करते हैं तो कांग्रेस के नेताओं के लिए ये सिर्फ एक बेतुका मुद्दा कहलाता है। 

इस बात से विरोधी भी इनकार नहीं करते कि सोनिया गांधी सियासत के हर दांव के आगे कभी हार मानकर नहीं बैठतीं। प्रधानमंत्री पद की जो कुर्सी सजी हुई मिल रही थी, उसे विदेशी मूल के मुद्दे पर छोड़ देने वाली.. लाभ के पद के आरोप पर संसद की सदस्यता से इस्तीफा देकर चुनौती स्वीकार करने वाली सोनिया गांधी के सामने फिर से चुनौतियों ने सिर उठाया है। और शायद 69 साल की कांग्रेस अध्यक्ष को इन सबसे डटकर लड़ने की शक्ति इंदिरा गांधी से मिली सीखों ने दे रखी है।