जयंती विशेषः दुनिया के पहले इंजीनियर थे विश्वकर्मा !

नई दिल्ली (9 फरवरी): हिंदू धर्म के अनुसार अलग-अलग कर्म करने के लिए अलग-अलग देवी-देवताओं है जैसे- पवनदेव का कार्य है वायु प्रवाहित करना तथा इंद्रदेव का कार्य है समय पर बारिश करना। इसी प्रकार भगवान विश्वकर्मा को निर्माण व सृजन का देवता माना गया है। भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पी भी कहा जाता है।ग्रंथों के अनुसार विश्वकर्मा दुनिया के पहले जो देवताओं के लिए भवनों, महलों व रथों आदि का निर्माण  करते हैं।

आज  (9 फरवरी को) विश्वकर्मा जयंती है इसे के अवसर पर हम आपको भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी कुछ खास बातें बता रहे हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार द्वारिका नगरी का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था। उस नगरी में विश्वकर्मा का विज्ञान (वास्तु शास्त्र व शिल्पकला) की निपुणता प्रकट होती थी। द्वारिका नगरी की लंबाई-चौड़ाई 48 कोस थी। उसमें वास्तु शास्त्र के अनुसार बड़ी-बड़ी सड़कों, चौराहों और गलियों का निर्माण किया गया था। महाभारत के अनुसार, तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली के नगरों का विध्वंस करने के लिए भगवान महादेव जिस रथ पर सवार हुए थे, उस रथ का निर्माण विश्वकर्मा ने ही किया था। वह रथ सोने का था। उसके दाहिने चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विराजमान थे। दाहिने चक्र में बारह आरे तथा बाएं चक्र में 16 आरे लगे थे।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार सोने की लंका का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था। पूर्वकाल में माल्यवान, सुमाली और माली नाम के तीन पराक्रमी राक्षस थे। वे एक बार विश्वकर्मा के पास गए और कहा कि आप हमारे लिए एक विशाल व भव्य निवास स्थान का निर्माण कीजिए। तब विश्वकर्मा ने उन्हें बताया कि दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट नामक एक पर्वत है, वहां इंद्र की आज्ञा से मैंने स्वर्ण निर्मित लंका नगरी का निर्माण किया है। तुम वहां जाकर रहो। इस प्रकार लंका में राक्षसों का आधिपत्य हो गया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम के आदेश पर समुद्र पर पत्थरों से पुल का निर्माण किया गया था। रामसेतु का निर्माण मूल रूप से नल-नील नाम के वानर योद्धाओं ने किया था। नल शिल्पकला (इंजीनियरिंग) जानता था क्योंकि वह देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा का पुत्र था। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था। स्कंद पुराण प्रभात खण्ड के श्लोक की तरह यह श्लोक मिलता है-

बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी।

प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च।

विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति:।।

अर्थात- महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, वह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उससे संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ।