'विचार कुंभ' के नाम पर खेतों से ऐसा खिलवाड़ कि खून के आंसू रो रहे हैं किसान

आनंद निगम, उज्जैन (11 मई): ये खबर उज्जैन के उस गांव की है, जहां के लोगों ने प्रधानमंत्री की अगवानी के नाम पर अपने खेत-खलिहान औनै-पौने मुआवज़े पर कुछ दिनों के लिए सरकार को दे दिए थे। उन्हें बस इतना पता था कि बड़े बड़े विद्वान आकर उनके खेत खलिहानों में कुछ चर्चा वर्चा करने वाले हैं। लेकिन विचार कुंभ के नाम पर उनकी खेतों से ऐसा खिलवाड़ हुआ है कि किसान खून के आंसू रो रहे हैं।

जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाया करती थीं उसे काले कोलतार से पाटकर कंक्रीट सा सख्त बना दिया गया है। खेतों के बीचोबीच हाइवे जैसे रोड निकल आए हैं। भारीभरकम हवाई लोगों के लिए फसलों को नोंचकर कोलतार के हेलीपैड बनाए दिए गए हैं। वैचारिक कुंभ के लिए किसानी का सत्यानाश करने से पहले एक बार भी विचार नहीं किया सरकार से लेकर शासन प्रशासन के विद्वानों ने कि जब साहब लोग चले जाएंगे तो किसानों का क्या होगा। 

सिंहस्थ कुंभ के दौरान उज्जैन के निनोरा में 12 से 14 मई के दौरान वैचारिक कुंभ के मसनद सजाए जाएंगे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत उद्घाटन करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी समापन। इन दोनों बीच देश विदेश के विद्वान अपने अपने विचारों के मंथन से अमृत निकालेंगे और इस सारे नाटक के लिए किसानों के साथ कितना क्रूर मजाक हुआ है इसे यहां के किसानों से सुनिए। दिल कांप जाएगा आपका।

सरकार ने यहां के किसानों की 25 बीघा जमीन बर्बाद कर डाली गई है। किसानों की 25 बीघा जमीन का अधिग्रहण हुआ है, वह भी सिर्फ 4 हजार रुपए बीघे की हिसाब से मुआवजा से। किसान कहते हैं कि कल को उनकी जमीन तो मिल जाएगी लेकिन कोलतार से उनके खेतों को जिस तरह से पाट दिया गया है उसे हटाएगा कौन। अगर हटा भी दिए तो उसमें फसलों के उगने में बरसों निकल जाएंगे।

मोदी आएंगे, भागवत आएंगे इसलिए शिवराज सरकार ने ये ज़मीन पिछले साल ही किसानों से छीन ली थी। सोयाबीन की फसल नहीं लगी। 4 हजार रुपल्ली के टुकड़े पर सरकार ने किसानों को बर्बाद कर दिया है। किसान सिर पर हाथ धरे बैठा है। उन्हें कहां पता कि विचारों के कुंभ को कोलतार से लीपकर किसानी चौपट कर देंगे। 

तीन-तीन पक्के हेलीपैड बना दिए हैं। 5 से ज्यादा पेड़ों को जड़ से उखाड़कर फेंक दिया है। भारीभारी मशीनें लगाकर खेतों को कुचले जा रहे हैं रात दिन। और यहां दिल्ली की तरह कोई एनजीटी भी नहीं आता जो ऐसे श्रीश्री के कारनामों पर दुखी किसानों के जख्म पर मरहम लगाए।