यूपी चुनाव: दांव पर सभी पार्टियों की किस्मत, जानें,क्या होंगे हार-जीत के मायने

लखनऊ(11 फरवरी): देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पहले चरण के लिए आज वोट डाला जा रहा है। यहां का चुनाव हमेशा से ही दिलचस्प रहा है। इस बार का चुनाव जिन समीकरणों के बीच हो रहा है, उसकी चर्चा राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले हर शख्स की जुबान पर है।

- 2014 लोकसभा चुनाव में 73 सीट जीतने वाली बीजेपी एक बार फिर उसी करिश्मे की उम्मीद कर रही है।

- कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पहली बार चुनावी मैदान में साथ आए हैं।

- मायावती की बहुजन समाज पार्टी 5 साल बाद फिर सत्ता पर काबिज होना चाहती है। ऐसे में सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है।

- आइये जानते हैं कि सभी मुख्य पार्टियों के लिए विधानसभा चुनाव में हार और जीत के क्या मायने होंगे:

1 मायावती की बीएसपी को अगर हार का सामने करना पड़ता है तो पार्टी एक बार फिर से 1990 के उस दौर में पहुंच जाएगी जिसमें उसे सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों पर निर्भर रहना पड़ता था।

2. चुनाव में हार के बाद मायावती के लिए अपने दलित वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखना काफी मुश्किल हो जाएगा।

3. मायावती इस बार फिर सोशल इंजीनियरिंग कर 2007 का प्रदर्शन दोहराने की कोशिश कर रही हैं, पर इस बार वह मुस्लिमों को अपनी तरफ लाने के लिए काफी आक्रामक हैं जो आमतौर पर मुलायम के साथ जाते हैं।

समाजवादी पार्टी: अखिलेश की असली परीक्षा

1. 2017 के चुनाव में जीत अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी के निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित कर देगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी उनका कद काफी बढ़ जाएगा।

2. अखिलेश ने इस चुनाव में कोई जोखिम न उठाते हुए, कुनबे में चली वर्चस्व की लड़ाई के चलते हुए नुकसान की भरपाई के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया।

3. अखिलेश की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर पेश की गई है जो सांप्रदायिक ताकतों को रोकने को लेकर गंभीर है, ताकि वह मुस्लिमों की पहली पसंद के तौर पर उभरें और पार्टी का कोर वोट बैंक साथ बना रहे। सीएम लगातार अपने कार्यकाल में हुए विकास की बात करते ही नजर आए।

4. चुनाव में हार से परिवार का विवाद एक बार फिर सतह पर आ सकता है और ऐसे में हो सकता है कि अखिलेश के कई समर्थक उनका साथ छोड़ दें।

भारतीय जनता पार्टी: 2014 का प्रदर्शन दोहराने की चुनौती

1. बीजेपी ने इस बार भी अपने चुनाव प्रचार को ध्रुवीकरण और विकास के वादे के इर्द गिर्द रखा।

2. चुनाव में कम अंतर से मिली जीत भी मोदी और उनकी नीतियों पर मुहर लगाने का काम करेगी। खासतौर पर नोटबंदी पर।

3. यह तय है कि पार्टी अपने 2012 के प्रदर्शन को सुधारने वाली है जब उसे महज 47 सीटें मिली थीं।

4. अगर पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, तो इसका सीधा अगर पीएम मोदी की छवि पर पड़ेगा और पार्टी में अंदरूनी कलह शुरू हो सकती है। इसका खामियाजा अमित शाह को भुगतना पड़ सकता है।

5. अगर हार होती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले आरएसएस प्रदेश में हिंदुत्व को लेकर और आक्रामक रवैया अपना सकता है।

कांग्रेस: गठबंधन करेगा नैया पार?

1. यह चुनाव कांग्रेस के लिए भी प्रदेश में प्रासंगिक बने रहने का सवाल है।

2. चुनाव में सफलता मिली तो राहुल गांधी तीन बड़े राज्यों गुजरात, एमपी और राजस्थान में बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में आ जाएंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इन बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

3. इन तीनों राज्यों में कांग्रेस का सामना सीधे बीजेपी से होगा।

4. चुनावी असफलता पार्टी के अंदर राहुल के लिए मुश्किलें लेकर आ सकती है।