INSIDE STORY: ट्रंप की जीत से भारत में जश्न, पाकिस्तान डरा

डॉ. संदीप कोहली, 

नई दिल्ली (9 नवंबर): अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बड़ा उलटफेर हो गया है। सारे चुनावी सर्वेक्षण फेल हो गए हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्‍मीदवार डॉनल्‍ड ट्रंप ने डेमोक्रैटिक पार्टी की उम्‍मीदवार हिलेरी क्लिंटन को 288-215 से हरा दिया है। ट्रंप को जीत के जादुई आंकड़े 270 से ज्यादा वोट मिले हैं।  इस चुनाव से न सिर्फ वैश्विक समीकरण बदलने वाले हैं, बल्कि दुनियाभर की अर्थव्‍यवस्‍थाओं पर भी भारी असर पड़ने वाला है। अब बड़ा सवाल ये है कि डॉनल्‍ड ट्रंप के राष्ट्रपति बन जाने के बाद भारत को फायदा होगा या नुकसान? अर्थशास्त्रियों के मुताबिक ट्रंप की जीत भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए नकरात्‍मक साबित होगी। लेकिन वहीं रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की जीत से भारत की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और पाकिस्तान से आतंक के निर्यात का खत्म करने में मदद मिलेगी। गौरतलब है कि ट्रंप ने एक चुनावी रैली में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत की भूमिका की सराहना की थी। इसके अलावा भारत के लिहाज से देखें तो ट्रंप की जीत का एक फायदा और है ट्रंप की जीत से अमरीका चीन की जगह भारत के नजदीक आएगा। क्योंकि हाल ही में ट्रंप ने चीन को पूरे व्‍यापारिक घाटे के आधे भाग के लिए जिम्‍मेदार ठह‍राया था। आइए जानते हैं कि ट्रंप बने राष्ट्रपति तो भारत को क्या होगा फायदा और क्या होगा नुकसान-  

भारत क्या चाहता है अमेरिका से...

1) पाकिस्तान को अलग थलग करे: आतंकवाद के मसले पर कार्रवाई न करने के मुद्दे पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए भी जरूरी है कि भारत लगातार अमेरिका से सुरक्षा संबंधी बातचीत करता रहे। समय-समय पर उसके साथ सैन्य अभ्यास भी किए जाते रहें। यह मसला दक्षिण एशिया के तेजी से बदलते सुरक्षा संबंधी माहौल के मद्देनजर और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। सितंबर में जम्मू-कश्मीर के उरी में भारतीय सैन्य शिविर पर आतंकी हमले के बाद तो स्थिति ज्यादा तनावपूर्ण है।

2) चीन के खिलाफ भारत का करे समर्थन: जहां तक सुरक्षा का ताल्लुक है तो विवादित इलाकों जैसे कि उत्तर-पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और उत्तर-पश्चिम में लद्दाख में चीन की बढ़ती दखलंदाजी भारत की चिंताएं बढ़ा रही है। साथ ही, बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच बढ़ता सहयोग भी भारत की चिंता का विषय बना हुआ है। यहां बताते चलें कि इस वक्त पाकिस्तान को उसके रक्षा साजो-सामान का करीब 63 फीसदी हिस्सा चीन की ओर से उपलब्ध कराया जा रहा है। ऐसे में अमेरिका चीन पर लगाम लगाने के लिए भारत के साथ खड़ा हो। ऐसे में नई दिल्ली को लगता है कि दक्षिण एशिया में अमेरिका की मौजूदगी से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को उसके पक्ष में बनाए रखने में मदद मिलेगी।

3) सेना के आधुनिकीकरण और मेक इन इंडिया में करे मदद: अमेरिका इस वक्त भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता भी हो चुका है। दोनों देशों के बीच 2015 में रक्षा साजो-सामान की आपूर्ति का कारोबार 14 अरब अमेरिकी डॉलर यानी करीब 934 अरब रुपए तक पहुंच चुका है। ऐसे में, भारत को अब अपने मेक इन इंडिया कार्यक्रम की सफलता के लिए भी अमेरिका से नजदीकी मदद की दरकार है। भारत सरकार यह भी अच्छी तरह जानती है कि अपनी सेना के आधुनिकीकरण का अभियान वह तब तक प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ा सकती, जब तक कि अमेरिकी हथियारों और उनसे संबंधित तकनीक तक उसकी पहुंच न हो जाए।

4) अमेरिका से कारोबार बड़े: अभी दो साल पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक लक्ष्य निर्धारित किया था। इसके मुताबिक, दोनों देशों के बीच के कारोबार को 2020 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर यानी 33 अरब रुपए तक ले जाना तय किया गया है। भारत सरकार को उम्मीद है कि अमेरिका का सत्ता संभालने वाला नया प्रशासन भी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए नए कदम उठाएगा।

5) स्मार्ट सिटी परियोजना को मदद करता रहे: भारत सरकार को यह भी उम्मीद है कि उसकी महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए भी अमेरिका का नया प्रशासन प्रतिबद्ध रहेगा। अमेरिका ने अजमेर, विशाखापट्‌टनम और इलाहाबाद को स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित करने में रुचि दिखाई है।

ट्रंप की इन नीतियों से भारत को पहुंचेगा नुकसान...

वीजा और आप्रवासन: ट्रंप- भारत से नौकरियां वापस अमेरिका ले जाने की बात करते हैं, मतलब सीधा है वो राष्ट्रपति बने तो एच-1बी वीजा पर अमेरिका गए लोगों की दिक्कतें बढ़ेंगी। ऐसा हुआ तो भारत के सॉफ्टवेयर बिजनेस का दम निकल जाएगा।  इस संबंध में ट्रंप पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगर वे राष्ट्रपति चुने गए तो उनका प्रशासन आव्रजन नीति को सख्त बनाने की दिशा में काम करेगा। साथ ही, एच-1बी वीजा लेने वालों पर दिया जाने वाला न्यूनतम शुल्क भी बढ़ाएगा। 2014 में वहां कुल 8,16,000 एच-1बी वीजा जारी हुए, इनमें से करीब 70 फीसद भारतीयों को मिले थे।

मेक इन इंडिया और निवेश: ट्रंप अमेरिकी मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत बनाने पर जोर दे रहे हैं, इस क्षेत्र में जनवरी 2004 से दिसंबर 2014 के बीच 50 लाख नौकरियां खत्म हुई हैं, मुख्य चुनावी मुद्दा होने के कारण  ट्रंप का जोर उन अमेरिकी कंपनियों पर अधिक कर लगाने पर है, जो विदेशों में नौकरियां बढ़ा रही हैं। ऐसे में अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में आकर मैन्यूफैक्चरिंग और निवेश करने में मुश्किल आ सकती है, जो कि भारत सरकार के महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के लिए शुभ संकेत नहीं है।

ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप यानि टीपीपी: ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप यानि टीपीपी के ट्रंप कट्टर विरोधी हैं जबकि हिलेरी इसके पक्ष में हैं। टीपीपी पैसिफिक से भारत को फायदा है। यूरोपियन यूनियन की तरह यूएस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, चिली, पेरू, मेक्सिको, विएतनाम, सिंगापुर, ब्रुनेई, मलेशिया को मिलाकर टीपीपी बना है। लेकिन ट्रंप इसमें बदलाव की दलील देते हैं। इससे भारत की परेशानी बढ़ सकती है।

क्या डोनाल्ड ट्रंप भारत के अच्छे दोस्त साबित होंगे...
- भारतीय मूल के वोटर्स को रिझाने में डोनाल्ड ट्रंप भी पीछे नहीं रहे।
- ट्रंप नें हिंदू संस्था रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)संस्था के कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
- अमेरिकन-इंडियन बिजनेसमैन शलभ कुमार ने डोनाल्ड ट्रम्प का खुलकर सपोर्ट किया है।
- शलभ ने ट्रंप के समर्थन में उनकी पार्टी को 7 करोड़ का डोनेशन भी दिया है।
- शलभ कुमार ने ही 2015 में रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)नाम की संस्था बनाई है।
- एक इंटरव्यू में शलभ ने कहा- ट्रम्प को गलत समझा जा रहा है, वे एंटी-इंडिया नहीं हैं।
- शलभ कुमार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका में प्रभावशाली समर्थकों में से एक हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े प्रशंसक हैं डोनाल्ड ट्रंप...
- रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं।
- जब मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने थे तो ट्रंप ने कहा था कि सालों की सुस्ती के बाद निवेशक अब भारत लौट रहे हैं।
- ट्रंप ने कहा था, 'मोदी से मेरी मुलाकात नहीं हुई है लेकिन वह प्रधानमंत्री के रूप में शानदार काम कर रहे हैं।
- मोदी लोगों को साथ ला रहे हैं, अब भारत के बारे में अब धारणा बदल रही है और आशावाद लौट रहा है।
- पीएम मोदी को एक ‘महान शख्सियत’ बता चुके हैं, साथ ही कह चुके हैं कि वे हिंदुओं के बड़े प्रशंसक हैं।
- ट्रंप ने कहा था कि भारत और चीन की एक जैसी शुरुआत हुई, इंडिया अच्छी तरक्की कर रहा है।
- लेकिन तुरंत ही सफाई देते हुए भारत को एक महान देश बताते हुए कहा था कि वह भारतीय नेताओं से नाराज नहीं है।
- डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के लिए हिन्दू सेना के कार्यकर्ता दिल्ली के जंतर-मतंर पर हवन-पूजन भी कर चुके हैं।
- ट्रंप ‘हिंदू राष्ट्रवादी शब्दावली’ से भारतीय-अमेरिकी समुदाय का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहते हैं। 
- उन्होंने उरी में हुए आतंकी हमले की सख्त शब्दों में निंदा कर यह भी संकेत देने की कोशिश की है।
- उनका प्रशासन सीमा पार आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान से सख्ती से बातचीत करेगा।
- एक कारोबारी के तौर पर भी भारत के साथ ट्रंप के साथ निजी हित हैं।
- उनकी कम्पनी मुम्बई के पॉश इलाके में एक शानदार व्यावसायिक इमारत बना रही है।

डोनाल्ड ट्रंप का सफर
1986 में ट्रंप ने पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के व्हॉर्टन स्कूल ऑफ फाइनेंस से इकोनॉमिक्स में बैचलर डिग्री हासिल की थी।
1971 में ट्रंप ने अपने पिता की रीयल एस्टेट कंपनी- एलिजाबेथ एंड संस- को अपने हाथों में ले लिया, जिसे बाद में ट्रंप ऑर्गनाइजेशन नाम दिया गया।
1987 में ट्रंप की किताब ‘आर्ट ऑफ डील’ प्रकाशित हुई, जो 51 सप्ताह तक न्यूयॉर्क टाइम्स पर बेस्टसेलर बनी रही।
1990 में ट्रंप को फोर्ब्स के धनी व्यक्तियों की सूची से बाहर कर दिया गया।
2000 में ट्रंप ने पहली बार एक अनजानी सी रिफॉर्म पार्टी से यूएस राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन भरा था।
2004 में यूएस टेलीविजन पर एक लोकप्रिय शो ‘द अप्रेंटिस’ टेलीकास्ट हुआ, जिसके प्रोड्यूसर और एंकर डोनाल्ड ट्रंप थे।
2007 में उन्हें हॉलीवुड हॉल ऑफ फेम से स्टार प्रदान किया गया।
2015 में ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना नामांकन भरा।

गैर राजनीतिक छवि: डोनाल्ड ट्रंप की छवि एक परंपरागत राजनीतिक उम्मीदवार से अलग एक आत्मनिर्भर उम्मीदवार की है। स्टीरियोटाइप राजनीतिक उम्मीदवार से थक चुके लोगों के लिए ट्रंप एक उम्मीद हैं. वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव चाहनेवाले लोग ट्रंप का समर्थन कर सकते हैं।

स्थापित बिजनेसमैन: ट्रंप एक स्थापित बिजनेसमैन हैं। इस कारण वे न सिर्फ वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर हैं, बल्कि वित्तीय मामलों को लेकर जागरूक भी हैं। यूएस का एक बड़ा मतदाता वर्ग इस वजह से भी ट्रंप की तरफदारी कर सकता है कि वे यूएस की अर्थव्यवस्था को बेहतर करने में मददगार साबित होंगे।

जॉब क्रिएटर की छवि: अपने बिजनेस के माध्यम से ट्रंप ने बहुत से लोगों को रोजगार प्रदान किया है। उनकी यह छवि लोगों को पसंद आ रही है और उनका मानना है कि ओबामा की असफल आर्थिक नीतियों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने के लिए ट्रंप सबसे सही व्यक्ति होंगे।