उर्दू लेखकों को हलफ़नामा देना होगा, किताब में देश के ख़िलाफ़ कुछ नहीं

 

नई दिल्ली (19 मार्च): सरकार ने उर्दू लेखकों से कहा गया है कि वे साल में एक बार इस बात को सुनिश्चित करें कि वे देश और सरकार के खिलाफ कोई भी 'आपत्तिजनक' सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) ने उर्दू लेखकों के लिए एक घोषणा पत्र (डिक्लेरेशन फॉर्म) भी जारी किया है। गौरतलब है, एनसीपीयूएल मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत आने वाला संस्थान है।

अंग्रेजी अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, कई उर्दू लेखकों और संपादकों को पिछले कुछ महीनों के दौरान एक घोषणा पत्र/फॉर्म प्राप्त हुआ है। जिसमें लेखकों को दो गवाहों के दस्तखत करवाने के लिए भी कहा गया है। यह फॉर्म उर्दू में ही सर्कुलेट किया गया है।

फॉर्म इस प्रकार है: "मैं... पुत्र/पुत्री... यह पुष्टि करता हूं कि मेरी किताब/मैगजीन शीर्षक... जिसे एनसीपीयूएल के मॉनीटरी असिस्टेंस स्कीम के तहत बड़ी तादाद में खरीददारी के लिए मंजूरी मिली है। इसमें कोई भी सामग्री भारत सरकार की नीतियों और राष्ट्र के हितों के खिलाफ नहीं है। यह देश के विभिन्न वर्गों के बीच समरसता को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती। साथ ही यह आर्थिक तौर पर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से समर्थित नहीं है।"

इसमें यह भी चेतावनी दी गई है कि इसका उल्लंघन करने पर एनसीपीयूएल लेखक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है। इसके अलावा आर्थिक सहयोग भी वापस ले सकता है।

एनसीपीयूएल के डायरेक्टर इरतज़ा करीम जिन्हें पिछले साल नियुक्त किया गया। उन्होंने बताया, "अगर एक लेखक सरकार की तरफ से आर्थिक मदद चाहता है। तो बिल्कुल ही सामग्री (सरकार के) खिलाफत में नहीं हो सकती। एनसीपीयूएल एक सरकारी संस्थान है और हम सरकारी कर्मचारी हैं। हम निश्चित तौर पर सरकार के हितों की रक्षा करेंगे।"

करीम ने बताया, "डिक्लेरेशन फॉर्म को शामिल करने का फैसला करीब एक साल पहले काउंसिल के सदस्यों के बीच हुई बैठक में लिया गया। जिसमें एचआरडी मंत्रालय भी शामिल है। गृह मंत्रालय को भी इस विषय में जानकारी है।"

उन्होंने बताया, "काउंसिल को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार एक लेखक की लिखी गई किताब दूसरे के नाम से सबमिट की जाती है। इससे हम कानूनी मामलों में फंस जाते हैं। क्योंकि हमारे पास इतनी मैनपॉवर नहीं है कि हर किताब की हर एक लाइन की जांच करें। इसके लिए यह फॉर्म हमें लेखकों पर जवाबदेही डालने में मदद करेगा।"

करीम ने कहा कि यह कदम पिछले साल हुई एक घटना के बाद उठाया गया। जब अब्दुल कलाम आज़ाद पर आधारित एक किताब में गलत सूचना दी गई। करीम ने कहा, "वह एक राष्ट्रीय हस्ती हैं और उनके संबंध में गलत जानकारी एक राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है। हम हर चीज की जिम्मेदारी नहीं ले सकते।"

उर्दू लेखकों ने इस फॉर्म की आलोचना की है। उनका कहना है, कि यह "असहमति का गला दबाने" के लिए उठाया गया कदम है। कोलकाता यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और लेखक शानाज़ नबी को इस हफ्ते एक फॉर्म प्राप्त हुआ। जिसके साथ उनके साहित्यिक निबंधों- 'तमक़ीवी मुतालियत' के चयन के बारे में एक चिट्ठी भी थी। जिन्हें एनसीपीयूएल में संकलन के लिए 2016 में चयनित किया गया।

नबी ने कहा, "एक लेखक से डिक्लेरेशन पर दो गवाहों को दस्तखत करवाने के लिए कहना अपमान है। जो कि उनके अभिव्यक्ति के अधिकार पर भी हमला है।" नबी ने कहा कि यह लेखकों को सरकारी "धोखाधड़ी" के लिए मजबूर करना है। क्योंकि उर्दू साहित्य इस समय समस्याग्रस्त है और लेखकों को पैसों की जरूरत है।

जमशेदपुर में एक छमाही मैगजीन रावी के संपादक, अबरार मुजीब ने कहा, साहित्य का बिंदु है- सरकार की आलोचना करना और समाज की कमियों को उजागर करना। "लेकिन इस तरह के अनुचित शब्दों में लिखा गया घोषणा पत्र हर किसी को कमजोर करता है और इससे सरकार को काफी ताकत देगा जो असहमत होने पर बड़ी आसानी से सरकार के हाथों दबा दिया जाएगा।" उन्होंने कहा कि किसी को भी कोई दिशानिर्देश जारी नहीं किए गए हैं, जो 'आपत्तिजनक' को परिभाषित करें।