मिलिए उन गुमनाम चेहरों से जिन्हें मिलेगा पद्म पुरस्कार

नई दिल्ली(26 जनवरी):रिपब्लिक-डे से एक दिन पहले सरकार ने पद्म पुरस्कारों का एलान किया। 89 पद्म पुरस्कारों में से 7 लोगों को पद्म विभूषण, 7 को पद्म भूषण और 75 को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। इनमें 15 आम लोग भी शामिल हैं, जो निजी तौर पर समाज को बेहतर बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। पद्मश्री पाने वालों में कई लोग ऐसे हैं, जो गुमनामी में अपना काम करते हैं और सुर्खियों से दूर रहते हैं।

आइए, जानते हैं इन हस्तियों के बारे में।

-91 वर्षीय भक्ति यादव एक स्री रोग विशेषज्ञ हैं। करियर के शुरुआती दिनों में ही उन्हें सरकारी नौकरी का प्रस्ताव मिला था, लेकिन भक्ति ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने 'नंदर बाल भंडारी' नाम के प्रसूति केंद्र में डॉक्टर की हैसियत से काम करना शुरू किया। इस प्रसूति गृह में गरीब मिल मजदूरों की पत्नियों का प्रसव कराया जाता था। पिछले 68 सालों से वह मुफ्त में मरीजों का इलाज कर रही हैं। अपने 68 साल लंबे करियर के दौरान डॉक्टर भक्ति यादव ने 1,000 बच्चों का प्रसव करवाया। वह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सक्रिय रहीं।

-केरल की 76 साल की मीनाक्षी पिछले 68 सालों से 'कलरीपयट्टु' कर रही हैं और दूसरों को सिखा भी रही हैं। वह केरल के वटकल गांव में कदातनदन कलारी संगम स्कूल में छात्रों को कलरीपयट्टु सीखा रही हैं। लोग उन्हें प्यार से मानीक्षी गुरुक्कल कहते हैं। कलरीयपट्टु का उद्गम दक्षिण-पश्चिम केरल में हुआ है और इसे चाइनीज मार्शल आर्ट का रूट कहा जाता है। मीनाक्षी को उनके पिता ने सात साल की उम्र से कलरीपयट्टु के लिए प्रोत्साहित किया और तब से उन्होंने खुद को इसके लिए समर्पित कर दिया। इन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा।

-तेलंगाना का एक आम आदमी, जिसने अपना पूरा जीवन देश को हरा बनाने में लगा दिया। दारिपल्ली रमैया ने एक करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए हैं। 68 साल के चेतला रमैया नाम से जाने जाते हैं (चेतू का अर्थ- वृक्ष)। देश में हरियाली वापस लाने के निशन पर, जहां भी खाली जमीन देखते हैं, जेब से बीज निकालते हैं और पौधा लगा देते हैं। पेड़ लगाने के इनके इस काम में इनकी पत्नी जनम्मा का खास योगदान।

-  विपिन- एक आम आदमी जो पूरे कोलकाता में कहीं भी आग लगने पर लोगों को बचाने पहुंचने के लिए फेमस हैं, कई बार खुद को खतरे में डाल चुके हैं। वॉलंटिअर फायर फाइटर। पिछले 40 वर्षों से दमकल अधिकारियों के अलावा अकेले ऐसे शख्स जो आगजनित हादसे की तकरीबन हर साइट पर पहुंचे। कोलकाता अग्नि विभाग ने इन्हें वॉलंटिअर फायर-फाइटर का नाम दिया। स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़कर कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं। फिलहाल जूट कारोबारी के लिए काम करते हैं, साथ में मीटर फिक्सिंग और इलेक्ट्रिशन का काम। अग्नि हादसे में अपने भाई को खोने के बाद से ऐसे हादसों में फंसे लोगों को बचाने का काम करने का फैसला किया।

- डॉ. सुब्रतो दास-  गुजरात के रहने वाले सुब्रतो दास एक बार खुद हादसे के शिकार हुए तो अहसास हुआ कि हाइवे पर ऐक्सिडेंट होने पर घायलों को मिलने वाली इमर्जेंसी सर्विस ठीक नहीं है। इसके बाद उन्होंने लाइफलाइन फाउंडेशन की शुरुआत की, जिसका विस्तार अब महाराष्ट्र, केरल, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में 4000 किलोमीटर तक है। लाइफलाइन फाउंडेशन की टीम्स हादसा होने पर 40 मिनट से कम वक्त में पहुंच जाती हैं। अब तक 1200 से ज्यादा घायलों को बचाया जा चुका है।

- सीचेवाल- पंजाब की काली बेन नदी को पुनर्जीवित किया। सीचेवाल मॉडल नाम से भूमिगत सीवरेज सिस्टम विकसित किया। स्वयंसेवकों को संगठित कर स्थानीय लोगों से फंड जमा किया। लोगों में चेतना जाग्रत कर उन्हें समझाया कि सीवर का गंदा पानी नदी में न छोड़ें। रिवरबेड को साफ कर उसका कुदरती रूप लौटाया और नदी एक बार फिर साफ पानी से लबालब हो गई।

-डॉक्टर सुनीति ने वाई.आर. गायतोंडे HIV/AIDS के खिलाफ भारत की जंग में तमिलनाडु की सुनीति सोलोमन की अहम भूमिका रही है। रिसर्च, ट्रीटमेंट और अवेयरनेस में उनका बड़ा योगदान रहा है। 1985 में उन्होंने भारत के पहले AIDS केस की पहचान की थी। भारत का पहला AIDS रिसोर्स ग्रुप स्थापित करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

-  गिरीश - 6 वर्षीय गिरीश पेशे से इंजिनियर हैं। वह कर्नाटक के रहने वाले हैं। गिरीश ने इंजिनियरिंग में स्नातक किया, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। इसके बाद तो जैसे उन्होंने पुल बनाने को अपने जीवन का मकसद बना लिया। भारत के दूर-दराज के गांवों और पिछड़े इलाकों में उन्होंने कम बजट वाले करीब 100 पुल बनाए। इन सस्पेंशन पुलों की खासियत यह है कि ये इको-फ्रेंडली हैं। पूरे कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में गिरीश ने 100 से भी ज्यादा पुलों का निर्माण किया है।