एच-1बी बिल से भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ेगा यह बुरा असर

नई दिल्ली (31 जनवरी): अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे देशों से अमेरिका में जॉब के लिए आने वाले लोगों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। चुवानों के दौरान अपने 'हायर अमेरिकन' नारे को जमीं पर उतारने के लिए उन्होंने एच1बी वीजा की शर्तों को सख्त करने के लिए अमेरिकी संसद में बिल रखा है।

अगर ट्रंप का यह बिल पास हो गया तो इससे भारतीय आईटी प्रफेशनल्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। अमेरिकी संसद में जैसे ही यह बिल पेश हुआ, आईटी कंपनियों के शेयर गिर गए। बिल में एच-1बी वीजा के लिए न्यूनतम वेतन की सीमा को दोगुने से ज्यादा बढ़ाते हुए 1,30,000 अमेरिकी डॉलर करने का प्रस्ताव है। फिलहाल यह लिमिट 60,000 अमेरिकी डॉलर है। इससे कंपनियों को अमेरिकी कर्माचारियों की जगह भारत समेत दूसरे देशों से आने वाले प्रफेशनल्स को रखना कठिन हो जाएगा।

कंपनियों को होगी ये समस्याएं...

- अमेरिकी कंपनी जैसे माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, एप्पल की भर्ती प्रक्रिया के साथ-साथ भारतीय कंपनियों जैसे विप्रो, इंफोसिस को भी विदेशों में भर्ती प्रक्रिया में बदलाव करना पड़ेगा।

- सूत्रों के मुताबिक भारतीय कंपनियां अगर किसी विदेशी की भर्ती करती हैं तो उन्हें उस विदेशी नागरिक को उतनी ही सैलरी देने पड़ेगी, जितना की अमेरिकियों को दी जाती है।

- अभी तक ये सभी आईटी कंपनियां सस्ते श्रम के लिए विदेशी नागरिकों को भर्ती करती थीं। जिसके चलते अमेरिकियों को नौकरियां नहीं मिल पा रही थीं।

- भारतीय कंपनियां विप्रो और इंफोसिस टीसीएस के जरिए कर्मचारियों को भर्ती करती है। इन्होंने अपील की है कि हम अपने विशेषज्ञ कर्मचारियों के साथ तकनीक के जरिए उन्हें अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर रहे हैं।

- वीजा प्रोग्राम बहाल रखने से नौकरियां अमेरिका में ही रहेगीं। अगर कर्मचारियों को ज्यादा पैसे देगें तो वे भारत जैसे सस्ते बाजार से ज्यादा काम करेंगे।

क्या है H-1B वीजा?

H-1B वीजा बाहरी विशेषज्ञों को अमेरिका आकर वहां अपनी विशेषज्ञता का लाभ देने के लिए जारी किया जाता है। पिछले कुछ सालों से इसे लगातार महंगा और मुश्किल बनाया जा रहा है, लेकिन भारतीय इंजीनियरों का मेहनताना अमेरिकी इंजीनियरों की तुलना में इतना कम पड़ता है कि कंपनियां थोड़ा नुकसान उठाकर भी उन्हें हायर करना या भारत से अमेरिका ट्रांसफर करना बेहतर समझती हैं।