INSIDE STORY: #TripleTalaq विवाद- जानिए क्यों मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने खोला मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा...

नई दिल्ली (13 अक्टूबर): देश में एक बार फिर तीन (ट्रिपल) तलाक का मुद्दा गरमा उठा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB)ने आज ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बोर्ड द्वारा ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई। जिसमें आज ऐलान किया गया कि अगर तीन तलाक के प्रावधान को खत्म किया गया, तो उसका पुरजोर तरीके से विरोध क्या जाएगा। साथ ही बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने केंद्र पर आरोप लगाया कि वह यूनिफार्म सिविल कोड लाकर देश को तोड़ने की कोशिश कर रही है। इतना ही नहीं मौलाना रहमानी ने यह भी कहा कि भारत जैसे विविधता में एकता वाले देश के लिए यूनिफार्म सिविल कोड बिलकुल मुनासिब नहीं है। ये सोच मुल्क को तोड़ने वाली, गैरवाजिब और नामुनासिब है। रहमानी ने कहा कि मोदी ने ढाई साल की नाकामी और असल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए लिए ये शोशा छोड़ा है, हम इसका विरोध करेंगे। जानिए ट्रिपल तलाक और यूनिफार्म सिविल कोड पर मौलाना रहमानी ने क्या कहा... 

- ट्रिपल तलाक पर मोदी सरकार का विरोध गलत है। - तीन तलाक पर आयोग का बहिष्‍कार करेगा बोर्ड। - यूनिफॉर्म सिविल कोड भारतीय संविधान के खिलाफ है। - भारत जैसे विविधता में एकता वाले देश की विविधता बरकरार रहनी चाहिए। - संविधान में हमें अलग-अलग तरीके से, अपने तरीके से रहने का अधिकार है।  - अमेरिका में जितने राज्य हैं उनका अलग-अलग पर्सनल लॉ है - अमेरिका में पर्सनल लॉ को लेकर कोई विवाद नहीं है।  - हमारी हुकूमत हर बात में अमेरिका की पिछलग्गू बनती है।  - पर इस मामले में नहीं देख रही है कि वहां क्या हो रहा है। - देश के भीतर लड़ाई की तैयारी में है मोदी सरकार। - ढाई साल की नाकामियां छुपाने की कोशिश कर रही है सरकार। - सरहद तो संभल नहीं रही और अंदरुनी जंग के हालात पैदा किए जा रहे हैं। - पहले दुश्‍मनों से निपटे मोदी सरकार, अंदर दुश्‍मन न बनाएं। - ये बात सिर्फ मुसलमानों की तरफ से नहीं, सिख, इसाइयों की तरफ से भी है।  - हम हुकूमत के इस हलफनामे की मुखालफत करेंगे, पूरा मुल्क हमारे साथ है। 

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा था... - पिछले शुक्रवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था। - हलफनामे में तीन तलाक को खत्म करने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत की थी। - केंद्र ने कहा है भारत में जारी तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह का इस्लाम में रिवाज नहीं है। - तीन बार तलाक कहना महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है, कई मुस्लिम देशों ने इसमें सुधार किए हैं। - ईरान, मिस्र, इंडोनेशिया, तुर्की, मोरक्को, बांग्लादेश और पाकिस्तान की दिया था उदाहरण। 

बोर्ड भी दे चुका है कोर्ट में हलफनामा... - 2 सितंबर को तीन तलाक के मामले में AIMPLB ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था।  - जिसमें बोर्ड ने साफ किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को कोर्ट तय नहीं कर सकता है।  - बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिखा जा सकता। 

क्या है ट्रिपल तलाक पर पूरा विवाद... - तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। - चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर सुनवाई के दौरान कह चुके हैं। - कोर्ट तय करेगा कि अदालत किस हद तक पर्सनल लॉ में दखल दे सकती है। - क्या उसके कुछ प्रावधानों से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। - कोर्ट केंद्र समेत इस मामले में सभी पक्षों से जवाब दाखिल करने को भी कह चुकी है। - इसी साल मार्च में उत्तराखंड की शायरा बानो की भी याचिका सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार की थी। - शायरा बानो ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। - अप्रैल में भी कोर्ट ने हरियाणा की एक मुस्लिम महिला के मामले में स्वत संज्ञान लिया था। - साथ ही मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव पर गंभीर टिप्पणी की थी। - कोर्ट ने इस मसले पर टीवी पर हो रही बहस पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था। - इसके अलावा कोर्ट 1986 का शाहबानो मामल में फैसला दे चुका था। - जिसके बाद राजीव गांधी सरकार ने कोर्ट के फैसले उलट कर कानून बना दिया था। - मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट 1986 लागू किया था। - शाहबानो मामले में पर्सनल लॉ बोर्ड की अगुवाई में देश भर में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी।

दुनिया के कई इस्लामिक देशों में भी बैन है ट्रिपल तलाक... - पाकिस्तान में यह 1961 से ‘तीन तलाक’ बैन है। - बांग्लादेश ने 1971 से ही इसे बैन कर दिया था। - मिस्र 1929, तुर्की 1926 से तीन तलाक की इजाजत नहीं है। - सूडान 1935, सीरिया 1953, इंडोनेशिया 1974, जोर्डन 1951।

पाकिस्तान और बांग्लादेश में क्या है कानून- वहां कोई भी व्यक्ति ‘किसी भी रूप में तलाक’ कहता है तो उसे यूनियन काउंसिल (स्थानी निकाय) के चेयरमैन को इस बारे में जानकारी देते हुए एक नोटिस देना होगा और इसकी कॉपी अपनी बीवी को देनी होगी. यदि कोई व्यक्ति ऐसा करने में असफल रहता है तो उसे एक साल की सजा हो सकती है. 5000 रुपये का जुर्माना देना पड़ सकता है. चेयरमैन को नोटिस देने के 90 दिन बाद ही तलाक प्रभावी माना जाएगा. नोटिस पाने के 30 दिन के भीतर चेयरमैन को एक पंच परिषद बनानी होगी जो तलाक के पहले सुलह करवाने की कोशिश करेगी. यदि महिला गर्भवती है तो तलाक 90 दिन या प्रसव, जिसकी समयावधि ज्यादा हो, के बाद ही प्रभावी होगा। संबंधित महिला तलाक होने के बाद भी अपने पूर्व पति से शादी कर सकती है और इसके लिए उसे बीच में किसी तीसरे व्यक्ति से शादी करने की जरूरत नहीं है।