तीन तलाक का विरोध शुरू, क्या मुस्लिम महिलाएं ऐसे ही पीती रहेगी जहर ?

नई दिल्ली (13 अक्टूबर): देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के हक पर सुनवाई चल रही है। कुछ मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नियमों को संविधान से मिले मौलिक आधिकारों के हनन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है। मतलब, सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादी, तलाक और गुजारा भत्ते के मसले पर सुनवाई नहीं कर सकता? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मुस्लिम महिलाएं ऐसे ही तीन तलाक का जहर पीती रहेगी।

मुस्लिम समाज में निकाह, तलाक और गुजारा भत्ते को लेकर अलग नियम हैं। दुनिया के सबसे बड़े गठतंत्र और लोकतंत्र में खुली आबो-हवा में सांस लेने वाली ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं अब वक्त के साथ शरिया कानून में बदलाव चाहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं की जमीनी हकीकत देखते हुए उनके अधिकारों पर सुनवाई शुरू की, जिसमें तलाक, पहली बीवी के रहते दूसरा निकाह और गुजारा भत्ता के मुद्दे को संविधान से मिले मौलिक अधिकारों के तकाजे पर विचार करने का फैसला किया। लेकिन कुछ मुस्लिम संगठनों से विरोध शुरू कर दिया।

मौलानाओं का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान पर आधारित है, संसद ने इसे तैयार नहीं किया है। इसलिए इसे संविधान के सांचे में कस कर लागू नहीं किया जा सकता है। हिंदुस्तान की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को शरिया कानून के कड़े चाबूक का डर हमेशा सताता रहता है, जिसमें उन्हें पुरूषों के बराबर हक नहीं मिला है। उनकी जिंदगी का फैसला मर्दों के हाथ में होता है।

दमकते-चमकते हिंदुस्तान में मुस्लिम महिलाएं और लड़कियां अब बदलाव की गवाह बनना चाहती हैं। शरिया कानून में बदलाव चाहती हैं। 4700 से अधिक मुस्लिम महिलाओं पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक...

- 55.3% लड़कियों की शादी 18 साल से कम की उम्र में हो गईं। - 53% महिलाओं को घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ा। - 91.7% महिलाओं ने कहा कि वह अपने पति की दूसरी शादी के खिलाफ हैं। - 95.5% मुस्लिम महिलाओं ने पर्सनल लॉ बोर्ड का नाम तक नहीं सुना था। - 82% महिलाओं के नाम कोई संपत्ति नहीं थी।

मुस्लिम महिलाएं एक साथ तीन बार बोलकर तलाक देने की परंपरा खत्म करना चाहती हैं। महिलाओं का कहना है कि शरिया कानून में तलाक का नियम एकतरफा है। हिंदुस्तान के 13 राज्यों में 70 हजार से अधिक सदस्यों वाले भारतीय महिला मुस्लिम आंदोलन की कार्यकर्ताओं ने वक्त के हिसाब से शरिया कानून में बदलाव की मांग की है।

इनकी मांग है कि... - मुस्लिम समाज में भी लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़कों की 21 साल तय होनी चाहिए। - निकाह के दौरान शौहर की साल भर की कमाई मेहर के रुप में तय होनी चाहिए। - मौखिक तलाक को गैर-कानून करार दिया जाए। - तलाक केस में समझौता-सुलह के लिए 30 दिन का समय दिया जाना चाहिए। - तलाक की स्थिति में बच्चों की कस्टडी को लेकर भी नियमों में बदलाव। - तलाक के बाद गुजारा भत्ता को लेकर भी नियमों में बदलाव। - एक से अधिक औरत से शादी को अवैध करार देने की मांग - कमाऊ बीवी होने पर भी शादी के बाद खर्चे की जिम्मेदारी शौहर की हो। - निकाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया जाए

मुस्लिम महिलाएं हलाला यानी एक ऐसी प्रथा जिसमें अगर कोई अपनी को तलाक दे देता है और फिर उससे निकाह करना चाहता है तो शरिया कानून के मुताबिक महिला को पहले किसी और शख्स से शादी करनी होती है। उसके बाद तलाक देकर ही वो अपने पहले पति से निकाह कर सकती है।

आज की मुस्लिम महिलाएं शरिया कानून की ऐसी क्रूर व्यवस्था में बदलवा की मांग कर रही हैं। 'हलाला' को अपराध घोषित करने के लिए जंग लड़ रही हैं, तो कट्टरपंथी सोच वाले मुल्ला शरिया कानून के नाम पर महिलाओं की जिंदगी से खेल रहे हैं।