मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा, तीन तलाक हराम है, पर मंजूर नहीं पाबंदी

नई दिल्ली ( 22 जनवरी ): लंबे समय से तीन तलाक को लेकर देश में बहस छिड़ी हुई है। देश की सर्वोच्च अदालत में चल रहे मामले में तीन तलाक पर पाबंदी न लगाने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बार्ड पैरवी कर रहा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्पष्ट राय है कि इस्लाम में तीन तलाक हराम है, लेकिन वह इस पर पाबंदी लगाने के पक्ष में नहीं है। 'तलाक : हकीकत और गलतफहमी' विषय पर आयोजित सेमिनार में पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव ज़फरयाब जिलानी ने कहा कि भले ही तीन तलाक को इस्लाम में सबसे बुरा माना गया है, लेकिन उस पर पाबंदी लगाना शरीयत में दखलअंदाजी है। तीन तलाक को लेकर बोर्ड की बैठकों व नदवा कॉलेज से उठने वाली आवाज शनिवार को खुले मंच से सुनाई दी।

अन्नूर सोशल केयर फाउंडेशन की ओर से आयोजित 'तलाक : हकीकत और गलतफहमी' विषयक सेमिनार में पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क था कि तीन तलाक पर पाबंदी लगाकर शरीयत में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि दारुल कजा को सजा देने का अधिकार नहीं है। इसलिए यदि कोई तीन तलाक को हथियार बनाता है तो कोर्ट और सरकार उसको सजा दे। जैसा पहले भी होता था। सदस्यों ने बताया कि एक प्रतिशत ही सही पर कई मामलों में तीन तलाक ने जिंदगी बचाने का भी काम किया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव अपर महाधिवक्ता जफरयाब जिलानी ने कहा कि यह सही है कि तीन तलाक इस्लाम में अच्छा नहीं समझा गया है, लेकिन रसूल अल्लाह ने अपने दौर में इस पर कोई पाबंदी नहीं लगाई। दूसरे खलीफा के दौर में भी तीन तलाक होते रहे हैं, लेकिन उस दौर में तीन तलाक लेने वालों को सजा दी जाती थी। हम तीन तलाक के पक्ष में नहीं है, हमारा कहना सिर्फ इतना है कि शरई कानून में कोई तब्दीली नहीं की जा सकती। इसलिए हम तीन तलाक पर रोक के खिलाफ हैं। देश की सर्वोच्च अदालत में चल रहे मामले में तीन तलाक पर पाबंदी न लगाने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पैरवी कर रहा है।

सबसे बेहतर तलाक-ए-अहसन

अंजुमन फलाह-ए-दारैन के अध्यक्ष मौलाना जहांगीर आलम कासिमी ने कहा कि तलाक ऐसा जायज अमल है जो अल्लाह को सबसे ज्यादा नागवार लगता है। इसलिए तलाक से पहले रिश्ते को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करने का हुक्म दिया गया है। इसके बाद भी बात न बने तो पति तलाक की पहल कर सकता है। इस्लाम में तलाक के तीन तरीके दिए गए है। पहला तलाक-ए-अहसन है, जिसमें पति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। इसमें इद्दत तक अगर दोनों में समझौता हो जाता है तो दोनों फिर से जिंदगी शुरू कर सकते हैं। इद्दत के बाद उनको फिर से निकाह करना होगा।

तीन तलाक को लेकर गलतफहमी

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नदवा कॉलेज स्थित दारुल कजा कमेटी के कन्वीनर मुफ्ती अतीक अहमद बस्तवी ने कहा कि तीन तलाक को लेकर मुस्लिम समाज में गलतफहमियां हैं, जिसे दूर किया जाना चाहिए। यह हमारी गलती है कि हम निकाह से पहले लड़का-लड़की को उनकी जिम्मेदारियों से आगाह नहीं करते। शादी करना पूरी जिंदगी की इबादत है।

लोगों के बीच जाकर करेंगे जागरूक

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की महिला सदस्य निगहत परवीन खान ने कहा कि तीन तलाक को लेकर हमें दूसरों को समझाने की जगह अपनों को समझाना होगा। लोगों को बताना होगा कि तीन तलाक का तरीका सबसे खराब है। तलाक के लिए सबसे अच्छा तरीका तलाक-ए-अहसन है।