डायबिटीज के मरीजों के लिए राम-बाण है यह तकनीक

पल्लवी झा, नई दिल्ली (14 जुलाई): बिगड़ते लाइफस्टाइल ने डायबिटीज को ऐसी हवा दी है कि यह बीमारी बड़ी तेज़ी से बढ़ती जा रहा है। जो बीमारी एक उम्र के बाद ही अटैक करती थी, अब हर उम्र में पाई जा रही है। इससे हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, किडनी फेलियर और अंधापन जैसी बीमारी भी बढ़ रही है।

इसी समस्या को देखते हुए डॉक्टरों ने मिलकर एक खास मॉडल तैयार किया है, जिससे इस बीमारी से लड़ने में काफी हद तक फ़ायदा मिलेगा। एम्स और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के डॉक्टरों ने अमेरिका के अटलांटा स्थित एमोरी यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक तकनीक इजात की है, जिसका क्लीनिक ट्रायल भी किया है। अभी तक डायबिटीज के सिर्फ 20 परसेंट ही मरीज़ कंट्रोल में आ पाते है, बाकि को इंसुलिन या दावा पर जीवन भर रहना पड़ता है। नए शोध से नई किरण दिखाई दे रही है।

क्या है तकनीक, कैसे हुआ शोध: - एम्स ,PHFI और अमेरिका के विशेषज्ञों ने साथ मिलकर भारत और पाकिस्तान के 10 अस्पतालों के ओपीडी में 1146 मरीजों पर रिसर्च हुआ। - मरीज़ों को दो हिस्सों में बांट दिया गया, जिसमें एक पर ट्रेडिशनल तरीका अपना गया और दूसरे पर नई तकनीक। - नई तकनीक में कंप्यूटर साफ्टवेयर और केयर संयोजक की भूमिका का इस्तेमाल हुआ। इसमें पाया गया कि नई तकनीक ने ग्लाइकोसोलेटेड हीमोग्लोबिन को काफी सुधारा। - क्लीनिकल ट्रायल के दौरान मरीजों का ढाई साल तक फालोअप किया गया। खास तकनीक वाले मरीजों के ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर के स्तर में ज्यादा सुधार हुआ। - इस पूरी प्रक्रिया के दौरान केयर संयोजक ने मरीजों को समय-समय पर फोन पर सलाह देता था कि उन्हें कब दवा लेनी है और कब डॉक्टर से मिलना है।

इसके अलावा मरीजों की जांच और इलाज का पूरा ब्यौरा इलेक्ट्रोनिक मेडिकल रिकॉर्ड सिस्टम में अपलोड किया गया। उसकी मेडिकल जांच और दवाओं को साफ्टवेयर में डालने पर कंप्यूटर से ये जानकारी मिल जाती है कि कौन किस दवा को बंद किया जा सकता है और उसके बदले कौन दवा दी जा सकती है। फ़िलहाल अभी नेटल स्टेज पर है। डॉक्टरों की मानें तो अगर इसे अपनाया गया तो ये एक राम बाण की तरह होगा।