बुर्किना फासो हमला: लोकप्रिय महिला फोटोग्राफर की मौत से पूरे अफ्रीका में फैला शोक

नई दिल्ली (22 जनवरी): अफ्रीका में एक महिला कलाकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता की मौत के बाद उसे अंतिम विदाई देने के मौके पर महिलाओं का तांता लगा रहा। कार्यकर्ता की हत्या के बाद पूरे अफ्रीका को एक धक्का लगा है। फ्रांसीसी-मोरक्कन फोटोग्राफर लीला एलाउई उन मृतकों में शामिल हैं, जिनकी बुरकिना फासो के ओयूगाडॉउगॉउ के कैपूचीनो कैफे में हुए अलकायदा के आतंकी हमले में मौत हो गई। 

ब्रिटिश अखबार 'द इंडिपेंडेंट' की रिपोर्ट के मुताबिक, माराकेच में हुए उसके अंतिम संस्कार में शामिल हुए एक हजार से भी ज्यादा लोगों में काफी संख्या में महिलाएं मौजूद रहीं, जो कि स्थानीय मानकों से अलग घटना थी। यह उस बात का सबूत देता है जो लीला की विरोधी दुनिया के बीच के बाधाओं को तोड़ने की दुर्लभ क्षमता का प्रतीक है।  

फ्रांस में जन्मी, मोरक्को में पली बड़ी और न्यूयॉर्क में फोटोग्राफी की ट्रेनिंग लेने वाली लीला के परिवार का कहना है, कि वह लोगों के विभिन्न देशों, नस्लों, धर्मों और लिंगों की सीमाओं को पार करने के विचार को लेकर काफी उत्साहित थी। 33 वर्षीय लीला एमनेस्टी इंटरनेशनल के लिए एक अहम प्रोजेक्ट पर काम करती थी। जिसमें महिलाओं के अफ्रीका में अधिकारों के विस्तार किया जा रहा था। जिसके लिए उसे एक्यूआईएम ग्रुप में अलकायदा के जिहादियों ने मार डाला। 

लीला की टांग और सीने में दो बार गोली लगी। लीला की हालत में इलाज के बाद काफी सुधार आया था। वह अपने माता पिता से बातचीत कर पा रही थी। लेकिन छुट्टी मिलने की तैयारी से पहले ही उसे एक घातक दिल का दौरा पड़ा। जिससे बुरकिना फासो के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई। सोमवार सुबह उसकी मौत की घोषणा एमनेस्टी की तरफ से जारी बयान में की गई। जिस जगह उसकी मौत हुई, ये जगह पेरिस से 3,000 मील दूर है, जहां उसने अपने आखिरी प्रदर्शिनी लगाई थी। उसकी कृति 'द मोरक्कन्स' प्रतिष्ठित मैसन यूरोपीनी डी ला फोटोग्राफी के आखिर में आने वाली थी। 

इस प्रदर्शिनी में पूरे मोरक्को से कई समुदाय के लोगों के लाइफ साइज पोर्टेट्स प्रदर्शित किए गए थे। लीला का कहना था कि यह प्रोजेक्ट उत्तरी अफ्रीका और अरब वर्ल्ड के  'विदेशीकरण' का मुकाबला करना था।

लीला के अंतिम संस्कार में उसकी चचेरी बहन यालदा ने बताया, कि लीला गृह देश में तेजी से एक प्रतिष्ठित शख्सियत बन रही थी। उसने बताया, ''वह अरब महिलाओं का कला के क्षेत्र में प्रतिनिधित्व करती थी। जब प्रवासन और महिलाओं के हक की बात आती थी तो वह एक दूरदर्शी भी थी। आज उसके नाम से मोरक्को में प्रदर्शन होते हैं। इसके अलावा 2,100 से भी ज्यादा लेख उसके बारे में लिखे जा चुके हैं। फ्रांसीसी पार्लियामेंट ने भी उसके लिए शोक में एक मिनट का मौन रखा। फिर भी, इन सब चीजों से मेरी सबसे करीबी चचेरी बहन मेरे पास वापस नहीं आएगी। हम काफी मिलते जुलते थे। शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से।''

मोरक्को में लीला ने शरणार्थियों की मदद के लिए कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया था। यूरोपीय संकट से पहले लीला ने यूनाइचेड नेशन्स ह्यूमन राइट्स काउंसिल (यूएनएचआरसी) और दानिश रिफ्यूजी काउंसिल में भी काम किया था। जिससे वह लेबनान में शरणार्थियों में जागरुकता फैला सके। 2013 में उसने कहा था कि वह पहले से ही प्रवास, शरणार्थी, सांस्कृतिक विविधता पर पिछले 6 सालों से दस्तावेज तैयार कर रही है।

अपने विषयों के बारे में बताते हुए लीला ने बताया था, "मैं उन्हें कमजोर और दुखी नहीं दिखाना चाहती। जब कोई आपकी तरफ देखता है, आप केवल व्यक्ति की तरफ देखते हो कि वह सिर्फ एक इंसान है, सच्चा, मजबूत, खूबसूरत। मैं एक दयालु का नजरिया नहीं रखना चाहती।"