सर्जिकल स्ट्राइक की अगुआई करने वाले मेजर का खुलासा, मिशन को अंजाम देकर लौटना था सबसे मुश्किल

नई दिल्ली (10 सितंबर): पिछले साल भारत ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों को कैंपों को तबाह किया था। भारतीय सेना के इस शौर्यगाथा की दुनिया भर में तारीफ हुई थी। इस सर्जिकल स्ट्राइक से देशवासियों का सीन गर्व के चौड़ा हो गया था। लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं था। सर्जिकल स्ट्राइक की अगुवाई करने वाले मेजर का कहना है कि हमला बहुत ठीक तरीके से और तेजी के साथ किया गया था लेकिन वापसी सबसे मुश्किल काम था और दुश्मन सैनिकों की गोली कानों के पास से निकल रही थी। 

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में र्सिजकल स्ट्राइक के एक वर्ष पूरा होने पर प्रकाशित एक किताब में सेना के मेजर ने अपने उस अनुभव को देशवासियों के साथ साझा किया है।‘इंडियाज मोस्ट फीयरलेस : ट्रू स्टोरीज ऑफ मॉडर्न मिलिट्री हीरोज’ शीर्षक किताब में अधिकारी को मेजर माइक टैंगो बताया गया है। सेना ने र्सिजकल स्ट्राइक के लिए उरी हमले में नुकसान झेलने वाले यूनिटों के सैनिकों के इस्तेमाल का निर्णय किया। घटक टुकड़ी का गठन किया गया और उसमें उन दो यूनिट के सैनिकों को शामिल किया गया, जिन्होंने अपने जवान गंवाए थे। 

किताब में कहा गया है कि रणनीतिक रूप से यह चालाकी से उठाया गया कदम था, अग्रिम भूमि की जानकारी उनसे बेहतर शायद ही किसी को थी। उनको मिशन में शामिल करने का मकसद उरी हमलों के दोषियों के खात्मे की शुरुआत भी था। मेजर टैंगो को मिशन की अगुवाई के लिए चुना गया था। किताब में कहा गया है कि टीम लीडर के रूप में मेजर टैंगो ने सहायक भूमिका के लिए खुद से सभी अधिकारियों और कर्मियों का चयन किया। उन्हें इस बात की अच्छी तरीके से जानकारी थी कि 19 लोगों की जान बहुत हद तक उनके हाथों में थी। इन सबके बावजूद अधिकारियों और कर्मियों की सकुशल वापसी को लेकर वो थोड़े चिंतित जरूर थे। उन्हों लगता था कि मिशने को अंजाम देते वक्त उनके साथियों की जान भी जा सकती है।

मेजर टैंगो ने किताब में कहा है कि वास्तविक हमले से कमांडोज घबराए नहीं थे, लेकिन एलओसी पर चढ़ाई वाले रास्ते को पार करते हुए लौटना बहुत कठिन था। जिस ओर सैनिकों का पीठ था वहां से पाकिस्तानी सैनिक गोलीबारी कर रहे थे। सैनिक उनके टारगेट पर थे। सर्जिकल स्ट्राइक के लिए आईएसआई द्वारा संचालित और पाकिस्तानी सेना से संरक्षित प्राप्त आंतकियों के 4 लॉन्चिंग पैड्स को चुना गया था। किताब में बताया गया है कि मेजर के साथियों ने मास्क्ड कम्यूनिकेशन्ज के जरिए सीमा पार 4 लोगों से संपर्क साधा, जिसमें पीओके के 2 स्थानीय ग्रामीण और 2 उस इलाके में सक्रिय पाकिस्तानी नागरिक थे।