'जब भगवान महिला-पुरुष में भेद नहीं करते, तो फिर मंदिर परिसर में भेद क्यों?'

प्रभाकर मिश्रा, नई दिल्ली (12 फरवरी): सबरीमाला मंदिर मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी भी ग्रन्थ में महिला और पुरूष के बीच कोई भेदभाव नहीं किया गया है।

सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई आज न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने की। न्यायमूर्ति ने कहा कि जब भगवान महिला और पुरुष के बीच कोई भेदभाव नहीं करते तो फिर मंदिर परिसर में लैंगिक भेदभाव क्यों किया जा रहा है?

दरअसल, सबरीमाला में भगवान अयप्पा मंदिर में मासिक धर्म आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा सवाल उठाये जाने के एक दिन बाद त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) ने कहा था कि यह रोक मंदिर की प्रथा और परंपरा का हिस्सा है और यह जारी रहनी चाहिए।

मंदिर का प्रबंधन करने वाले टीडीबी के अध्यक्ष प्रायर गोपालकृष्णन ने कहा था कि बोर्ड 10 वर्ष की आयु से लेकर 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक जारी रखने के लिए उच्चतम न्यायालय में अपना पक्ष रखेगा।

सबरीमाला मंदिर में सभी महिलाओं एवं लड़कियों के प्रवेश की इजाजत की मांग वाली यंग लायर्स ऐसोसिएशन की जनहित याचिका पर सुनवायी करते हुए न्यायालय ने कहा था कि यह प्रचलन संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।