संसद से ऊपर नहीं पर्सनल लॉ- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली (19 जनवरी): सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि संसद से ऊपर पर्सनल लॉ नहीं है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपने एक फैसले में कहा कि चर्च संबंधी ट्राइब्यूनल द्वारा कैनन लॉ (क्रिस्चन पर्सनल लॉ) के तहत तलाक देना कानूनी तौर पर मान्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि डिवॉर्स एक्ट के बाद क्रिस्चन पर्सनल लॉ के तहत तलाक नहीं हो सकता बल्कि डिवॉर्स ऐक्ट प्रभावी होगा।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि क्रिस्चन कपल का कानूनी रूप से तलाक तभी मान्य होगा जब वह भारतीय कानून के तहत लिया गया हो। पर्सनल लॉ संसद द्वारा बनाए गए कानून को ओवरराइड नहीं कर सकता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उस पीआईएल को भी खारिजकर दिया जिसमें चर्च कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के मामले को कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग की गई थी।

चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने इस मामले में कर्नाटक कैथलिक असोसिएशन के पूर्व प्रेजिडेंट सी पाइस की ओर से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 1996 में सुप्रीम कोर्ट से मॉली जोसेफ बनाम जॉर्ज सेबेस्टियन के मामले में पहले ही फैसला दिया जा चुका है और इससे संबंधित व्यवस्था दी जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डिवॉर्स ऐक्ट आने के बाद से पर्सनल लॉ के तहत शादी खत्म करने के प्रावधान का कोई कानूनी प्रभाव नहीं है।

याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में कहा था कि चर्च द्वारा तलाक को मान्यता दी जानी चाहिए क्योंकि ये पर्सनल लॉ के तहत होता है और इसे भारतीय कानून के तहत स्वीकार किया जाना चाहिए। उनकी दलील दी थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत जिस तरह से तीन तलाक को मंजूरी दी जाती है उसी तरह से उन्हें भी मान्यता मिलनी चाहिए।