सुप्रीम कोर्ट ने जेल सुधार के लिए जारी किए निर्देश

नई दिल्ली ( 16 सितंबर ): सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में जेल सुधार के लिए दिशानिर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट से कहा है कि वह 2012 के बाद जेल में जिन भी कैदियों की अस्वभाविक मौत हुई हो, उनके परिजनों की पहचान के लिए संज्ञान लें और इस मामले में परिजनों को उचित मुआवजा दिलाया जाए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी. लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने जेल सुधारों के बारे में विस्तार से दिशा निर्देश जारी किए हैं।

-सुप्रीम कोर्ट का सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वह ओपन जेल सिस्टम के बारे में अध्ययन करें। अदालत ने कहा है कि एमिकस क्यूरी ने सुझाव दिया है कि ओपन जेल सिस्टम पर विचार किया जाए। शिमला में ऐसा किया गया है और साथ ही दिल्ली में सेमी-ओपन जेल बेहद कारगर रहा है। इस बारे में विचार की जरूरत है। अदालत ने इसको लेकर स्टडी करने को कहा है। 

-कैदियों की परिजनों से मुलाकात को बढ़ावा देना चाहिए। 

-कैदियों के साथ उनके परिजनों की फोन पर बातचीत और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की संभावना को देखना चाहिए। 

-कैदियों से वकील की बातचीत के बारे में भी विचार करना चाहिए। 

-जेल में बंद कैदियों की आत्महत्या से संबंधित मामले को रोकने के लिए योजना तैयार की जाए। आत्महत्या का विचार करने वाले कैदियों और हिंसक प्रवृत्ति के कैदियों की काउंसलिंग की जाए। 

-गृह मंत्रालय से कहा गया है कि वह एनसीआरबी को कहे कि वह अपने आंकड़े में प्राकृतिक और अप्राकृतिक मौत को अलग करें। 

-सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के हाईकोर्ट से कहा है कि वह 2012 के बाद जेल में अप्राकृतिक मौत का शिकार कैदियों के परिजनों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए संज्ञान ले और उन्हें उचित मुआवजा दिलाया जाए। देश भर के हाई कोर्ट रजिस्ट्रार को आदेश की प्रति एक हफ्ते में उपलब्ध कराने को कहा है।

-सरकार से कहा गया है कि पहली बार अपराध करने वाले कैदियों के लिए उचित काउंसलिंग की व्यवस्था की जाए। इसके लिए मान्यता प्राप्त एनजीओ की मदद ली जा सकती है। 

-राज्य सरकारों से कहा है कि वह राज्य लीगल सर्विस अथॉरिटी के साथ मिलकर जेलों के तमाम सीनियर पुलिस ऑफिसर के साथ मिलकर एक कार्यक्रम और ट्रेनिंग का आयोजन करे और बताएं कि उनकी जिम्मेदारी क्या है और जेल में बंद कैदियों के प्रति उनकी ड्यूटी क्या है और कैदियों के अधिकार क्या हैं।

-स्वास्थ्य का अधिकार मानवाधिकार है और राज्य सरकारों को चाहिए कि वह इस ओर ध्यान दें। तमाम कैदियों को उचित मेडिकल सुविधा मुहैया कराई जाए।