INSIDE STORY: #TripleTalaq विवाद- जानिए, क्यों AIMPLB ने SC से कहा, धार्मिक मामलों में न दें दखल...

डॉ. संदीप कोहली 

नई दिल्ली (2 सितंबर): तीन तलाक के मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करते हुए बोर्ड ने साफ किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को कोर्ट तय नहीं कर सकता है। साथ ही बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा से नहीं लिखा जा सकता। सीधे शब्दों में ट्रिपल तलाक सही है। गौरतलब है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहता रहा है कि पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके, बल्कि ये कुरान से लिया गया है। ये इस्लाम धर्म से संबंधित सांस्कृतिक मुद्दा है। 

- हलफनामा में कहा, तलाक, शादी और देखरेख अलग-अलग धर्म में अलग-अलग हैं। - एक धर्म के अधिकार को लेकर कोर्ट फैसला नहीं दे सकता। - कुरान के मुताबिक तलाक अवांछनीय है लेकिन जरूरत पड़ने पर दिया जा सकता है। - अगर दंपती के बीच में संबंध खराब हो चुके हैं तो शादी को खत्म कर दिया जाएो। - तीन तलाक को इजाजत है क्योंकि पति सही से निर्णय ले सकता हैो। - तीन तलाक के मुद्दे पर जल्दबाजी में फैसला नहीं लिया जाना चाहिए।  - तीन तलाक तभी इस्तेमाल किया जाता है जब वाजिफ वजह हो। - पर्सनल लॉ को चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा करना संविधान के खिलाफ होगा - पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है. यह धर्म से जुड़ा सांस्कृतिक मामला है - पर्सनल लॉ के मामले में कोर्ट तलाक की वैधता तय नहीं कर सकता - इससे पहले 27 अगस्त को इस बात लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। - क्या इस्लाम में किसी व्यकित को चार शादियां करने की इजाजत है? - क्या बिना तलाक लिए पति दूसरी शादी कर सकता है?

क्या है तीन तलाक का मामला... - तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। - चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर सुनवाई के दौरान कह चुके हैं। - कोर्ट तय करेगा कि अदालत किस हद तक पर्सनल लॉ में दखल दे सकती है। - क्या उसके कुछ प्रावधानों से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। - कोर्ट केंद्र समेत इस मामले में सभी पक्षों से जवाब दाखिल करने को भी कह चुकी है। - इसी साल मार्च में उत्तराखंड की शायरा बानो की भी याचिका सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार की थी। - शायरा बानो ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। - अप्रैल में भी कोर्ट ने हरियाणा की एक मुस्लिम महिला के मामले में स्वत संज्ञान लिया था। - साथ ही मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव पर गंभीर टिप्पणी की थी। - कोर्ट ने इस मसले पर टीवी पर हो रही बहस पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था। - इसके अलावा कोर्ट 1986 का शाहबानो मामल में फैसला दे चुका था। - जिसके बाद राजीव गांधी सरकार ने कोर्ट के फैसले उलट कर कानून बना दिया था। - मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट 1986 लागू किया था। - शाहबानो मामले में पर्सनल लॉ बोर्ड की अगुवाई में देश भर में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी।

देश की मुस्लिम महिलाओं की स्थिति... - मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के लिए देश में सर्वे करवाया गया था। - भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन(BMMA)ने 10 राज्यों में करवाया था सर्वे। - BMMA ने इन राज्यों में 4710 महिलाओं से बातचीत की थी।  - सर्वे महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल, कर्नाटक, बिहार, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा में किया गया। - संस्था चाहती है कि कुरान पर आधारित एक कानून हो, ताकि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति‍ बेहतर हो सके। - सर्वे के मुताबिक 53.2 फीसदी मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। - 75 फीसदी औरतें चाहती थीं कि लड़की की शादी की उम्र 18 से ऊपर हो और लड़के की 21 साल से ऊपर। - सर्वे में शामिल 91.7 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वह अपने पतियों के दूसरी शादी करने के खिलाफ हैं। - सर्वे में शामिल 40 फीसदी औरतों को 1000 से भी कम मेहर मिली, जबकि 44 फीसदी को तो मेहर की रकम मिली ही नहीं। - सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ। - 2014 में महिला शरिया अदालत में 235 केस आए थे, जिनमें से 80 फीसदी मामले मौखिक तलाक के थे।  - 83.3 फीसदी औरतों को लगता है कि सरकार को इसके लिए कदम उठाना चाहिए। - 90 फीसदी औरतें चाहती हैं कि एक कानूनी सिस्टम के जरिए काजियों पर नियंत्रण रखा जाए। - आंकड़ों के मुताबिक 82 फीसदी महिलाओं के नाम कोई संपत्ति नहीं है।