स्टूडेेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा, 'मेन्स्ट्रुएशन धार्मिक निषेध क्यों?'

नई दिल्ली (15 फरवरी): 'हैप्पी टू ब्लीड' अभियान से जुड़े स्टूडेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट से एक बेहद गंभीर सवाल पूछा है। स्टूडेंट्स ने सवाल किया है कि एक स्वस्थ शारीरिक प्रक्रिया 'मासिक धर्म (मैन्सट्रुएशन)' का इस्तेमाल धर्म के आधार पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करने में क्यों किया जाता है?

अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली एक स्पेशल बेंच जो सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के मामले की सुनवाई कर रही है, वही इस इंटरवेंशन एप्लीकेशन की भी सुनवाई करेगी। स्टूडेंट्स चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अपनी राय रखे। साथ ही तय करे कि क्या आधुनिक समाज को 'मासिक धर्म के कारण होने वाले भेदभाव' को आगे भी 'झेलना' जारी रखना चाहिए। जबकि, लिंग आधारित न्याय हासिल करने के लिए भारतीय संविधान समानता का अधिकार और महिलाओं के स्वास्थ्य को अनिवार्य करता है।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंग के प्रतिनिधित्व में स्टूडेंट्स ने सवाल किया है, कि किस तरह एक धार्मिक ''निषेध (टैबू)'' जो 10-50 वर्षीय महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाता है। उसे व्यापक तौर पर स्वीकृति कैसे मिली हुई है? यहां तक कि इसे अथॉरिटीस की तरफ से जायज ठहराया गया है। जो कि संविधान के अनुच्छेद 14-15 के तहत महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है।

शुक्रवार को एक प्रारंभिक सुनवाई में, जस्टिस मिश्रा ने सवाल किया कि क्या वेद, उपनिषद और पौराणिक कथाएं पुरुषों और स्त्रियों में भेदभाव करते हैं? जस्टिस मिश्रा ने कहा, "क्या आध्यात्मिकता पूरी तरह से पुरुषों का विषय है? क्या आप कह रहे हैं कि धर्म के विषय के अंतर्गत आध्यात्मिकता हासिल करना महिलाओं के वश का नहीं? क्या आप एक मां को वंचित कर सकते हैं?"