स्कूल ने पेरेंट्स को दी सलाह- 'रमजान में बच्चों को रोजा ना रखने दें', इतने पर हो गया विवाद

नई दिल्ली (15 जून): स्पेन के एक प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर ने स्कूली बच्चों के पेरेंट्स को चिट्ठी लिखकर एक ऐसी सलाह दी, जिसके बाद काफी विवाद पैदा हो गया है। इस हेडमास्टर ने पेरेंट्स से कहा था कि रमजान के महीने में वे बच्चों को रोजा ना रखने दें।

ब्रिटिश अखबार 'इंडिपेंडेंट' की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी अफ्रीका में स्पेन के शहर मेलिल्ला के एक सरकारी स्कूल ने पेरेंट्स से कहा कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों को रोजा रखने से छूट दी जाए। जुआन कारो पब्लिक प्राइमरी स्कूल के हेड अलफॉन्सो गैर्सिया ज़ाफरा ने कहा, "रोजा रखने के नतीजे के तौर पर दिमाग में हल्कापन, माइग्रेन और सनस्ट्रोक महसूस हो सकता है। जो पोषण की कमी और डिहाइड्रेशन की वजह से होता है।"

इस चिट्ठी के साथ में स्कूल के इस्लामिक स्टडीज़ के टीचर की तरफ से एक संदेश यह भी था, "जो स्टूडेंट्स किशोरावस्था तक नहीं पहुंचे हैं और जो 12 साल से कम उम्र के यहां पढ़ते हैं। उन्हें इस्लामी शिक्षा के अनुसार रोजा रखने में छूट दी जाए।"

ज़ाफरा ने लिखा, "इसलिए मैं सुझाव देता हूं- और जिसका इस्लाम के अध्यापक समर्थन करते हैं- कि माता-पिता इस सुझाव का पालन करें। सत्र समाप्त होने तक होने वाली गतिविधियों और गर्मी को देखते हुए..."

इस चिट्ठी के मिलने पर पेरेंट्स ने इसे मानने से इनकार कर दिया है। उनका मानना है कि यह उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है। मेलिल्ला इस्लामिक काउंसिल के नेता डॉ. मोह्म्मद अमर ने कहा, कि स्कूल के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं है।

उन्होंने कहा कि बच्चे के किशोरावस्था में पहुंचने पर स्कूल अपनी मर्जी नहीं चला सकता। ये वह अवस्था है जिससे मुस्लिम बच्चे इस पवित्र महीने में रोजा रखना शुरू करते हैं।

उन्होंने कहा, "ये पेरेंट्स को तय करना है ना कि स्कूलों को कि अगर वे किशोरावस्था में पहुंच चुके हैं तो उन्हें रोजा रखना चाहिए या नहीं।"

मेलिल्ला डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन के जोसे मैउअल कैलजाडो ने बताया कि यह चिट्ठी केवल पेरेंट्स को याद दिलाने के लिए भेजी गई थी कि स्कूल का सत्र अभी भी पूरा नहीं हुआ है। और शारीरिक गतिविधियां स्कूल करिकुलम का हिस्सा रहेंगी। इस वजह से रोजा रखना बच्चों के लिए अनिवार्य नहीं किया जाए।

गौरतलब है, रमजान इस्लामी कलेंडर में सबसे पवित्र महीना माना जाता है। जिसके दौरान बीमार और यात्रा करने वाले मुस्लिमों के अलावा कोई भी सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच कुछ भी नहीं खाता ना ही पीता है।