जानिए, सोशल मीडिया से क्या हो रहा है आपको नुकसान?

नई दिल्ली (9 अप्रैल): क्या फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल हमें ज्यादा खुश करता है? इसका जवाब है: नहीं। हाल ही में एक सर्वे किया गया, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया है कि 5 में से एक व्यक्ति का कहना है, कि वे सोशल मीडिया के इस्तेमाल के फलस्वरूप अवसादग्रस्त (डिप्रैस्ड) महसूस करते हैं। 

30 साल से कम उम्र के लोगों के लिए यह हैरान करने वाला तथ्य है। क्योंकि सोशल मीडिया उनकी लाइफ का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यहां तक कि अब वे बिना स्मार्टफोन्स के कम्यूनिकेट करने में तेजी से कमी कर रहे हैं। लेकिन लगातार फेसबुक, स्नैपचैट और इंस्टाग्राम के जरिए हर स्टेटस की लगातार मॉनीटरिंग और जिंदगी के हर पहलू की कभी ना खत्म होने वाली डॉक्यूमेंटिंग कहीं ना कहीं खतरे की घंटी बजाता है।

'टाइम्स ऑफ इंडिया' के मुताबिक, एम्प्लॉयर्स का कहना है कि स्कूल से निकलने वाले कई छात्र कामकाजी दुनिया के लिए तैयार ही नहीं हैं। क्योंकि वहां उन्हें अपने पीयर ग्रुप्स से बाहर निकलकर कम्यूनिकेट करना होता है। तब उन्हें सच में अजनबी लोगों से आमने सामने बातचीत करना होता है। 

2015 तक सोशल मीडिया के नकारात्मक असर पर बड़ी संख्या में एकेडमिक स्टडीज़ की गई हैं। जिसमें निष्कर्ष निकला कि सोशल मीडिया के नियमित इस्तेमाल से चिंता, अकेलापन और आत्मविश्वास में कमी महसूस हो सकती है। इसके अलावा नींद में भी कमी तो होती ही है। हम इन माध्यमों का अपनी जिंदगी की गलत तस्वीर ऑनलाइन कम्यूनिटी के सामने पेश करते हैं। जिसमें झूठी तारीफ के लिए सेल्फीज़ और छुट्टियों में पार्टियों और खाने पीने की ग्लैमरस तस्वीरें पेश करते हैं। हम ऐसे व्यवहार करते हैं, जैसे हम किसी जिंदगी की फिल्म में स्टार कर रहे हों। जिसमें हम लीड करना चाहते हैं। ऐसे में लाइक्स और शेयर्स की कमी की वजह से कुछ कमी सी महसूस करते हैं। 

हम अपने निजी अनुभवों को बिल्कुल अजनबी लोगों के सामने पेश करते हैं। हम गलत मानते हैं कि ऑनलाइन फ्रैंड वास्तविक फ्रैंड नहीं है। जिनकी राय महत्व नहीं रखती। जहां तक ट्विटर का सवाल है, यह भी बस चिल्लाने का एक माध्यम बन गया है। ट्विटर गुस्सा और मूड अपसेट करने के प्रभाव पैदा कर रहा है। कई महिलाओं को भी ट्विटर पर टारगेट किया जाता है।

एरियाना हफिंगटन ने 'द स्लीप रिवॉल्यूशन' नाम से एक किताब लिखी है। जिसमें एक्सपर्ट्स का हवाला देते हुए वह कहती हैं, कि बेडरूम में कोई भी स्क्रीन नहीं होनी चाहिए। हमें आराम करने के एक घंटे के दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

हम कितनी बार अपने फोन पर मैसेजेस पढ़ते हैं? इसके बाद घंटों तक उथल-पुथल में समय गुजार देते हैं। सोशल मीडिया कभी स्विच ऑफ नहीं होता। कोई ना कोई किसी जगह पिक्चर्स, कमेंट्स और मैसेजेस पोस्ट करता रहता है। हमसे हर वक्त चैट में शामिल होने या ओपिनियन देने के लिए कहा जाता है। इसके चलते कई टीनएजर्स 'डिसीजन पैरालिसिस' से पीड़ित होते जा रहे हैं। क्योंकि ऑपशन्स किसी भी ह्यूमन ब्रेन के लिए डील करने के लिए काफी ज्यादा संख्या में हैं। 

सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक लत की तरह होता जा रहा है। जो कि उसी तरह से बुरा है, जिस तरह ड्रिंक्स और ड्रग्स की लत में पड़ जाने से स्वास्थ्य पर असर होता है।