सियाचिन में ऐसे मुश्किल हालात में रहते हैं सेना के जांबाज़...

नई दिल्ली(11 फरवरी): सियाचिन एक ऐसा रणक्षेत्र जहां लड़ाई दुश्मन से नहीं मौसम से होती है। सियाचिन, दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र है। अगर नाम के मतलब पर जाएं तो सिया मतलब गुलाब और चिन मतलब जगह यानी गुलाबों की घाटी।

सियाचिन में ठंड में तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुंच जाता है। सियाचिन बेस कैंप से भारत की जो चौकी सबसे दूर है उसका नाम इंद्रा कॉल है और सैनिकों को वहां तक पैदल जाने में लगभग 20 से 22 दिन का समय लग जाता है।

चौकियों पर जाने वाले सैनिक एक के पीछे एक लाइन में चलते हैं और एक रस्सी सबकी क़मर में बंधी होती है। क़मर में रस्सी इसलिए बांधी जाती है क्योंकि बर्फ़ कहां धंस जाए इसका पता नहीं रहता और अगर कोई एक व्यक्ति खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें।

ऑक्सीजन की क़मी होने की वजह से उन्हें धीमे-धीमे चलना पड़ता है और रास्ता कई हिस्सों में बंटा होता है। साथ ही ये भी तय होता है कि एक निश्चित स्थान पर उन्हें किस समय तक पहुंच जाना है और फिर वहां कुछ समय रुककर आगे बढ़ जाना है। इन हालात में सैनिक कपड़ों की कई तह पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे "स्नो कोट" कहते हैं। इस तरह उन मुश्किल हालात में कपड़ों का भी भार सैनिकों को उठाना पड़ता है। 

वहां टेंट को गर्म रखने के लिए एक ख़ास तरह की अंगीठी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में बुख़ारी कहते हैं। इसमें लोहे के एक सिलिंडर में मिट्टी का तेल डालकर उसे जला देते हैं। इससे वो सिलिंडर गर्म होकर बिल्कुल लाल हो जाता है और टेंट गर्म रहता है।

सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं, मगर ख़तरा सोते समय भी मंडराता रहता है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी की वजह से सोते समय मौत हो सकती है। इस स्थिति से बचाने के लिए वहां खड़ा संतरी उन लोगों को बीच-बीच में उठाता रहता है और वे सभी सुबह छह बजे उठ जाते हैं। 

वहां नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने के लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहां त्वचा इतनी नाज़ुक़ हो जाती है कि उसके कटने का ख़तरा काफी बढ़ जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफ़ी समय लगता है। संघर्ष विराम होने के कारण सैनिकों के पास वहां ज्यादा काम भी नहीं रहता और उन्हें बस समय गुज़ारना होता है।

सियाचिन पर बनी सैनिक चौकियों की जीवन रेखा के रूप में काम करती है वहां वायु सेना। उन चौकियों पर जो हेलिकॉप्टर उतरता है उसे चीता का नाम दिया गया है। संघर्ष विराम से पहले सीमा के नज़दीक़ बनी चौकियों तक हेलिकॉप्टर ले जाने में काफ़ी सावधानी बरतनी होती थी।

चीता हेलिकॉप्टर उन चौकियों पर सिर्फ़ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता है। संघर्ष विराम से पहले ये इसलिए किया जाता था जिससे विरोधी पक्ष जब तक निशाना साधेगा तब तक हेलिकॉप्टर उड़ जाएगा। मगर अब भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिससे सेना किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहे।

सैनिकों को दूसरी जगहों से लाकर जब सियाचिन पर तैनात किया जाता है तो उससे पहले उन्हें इतने ठंडे मौसम के अनुरूप ख़ुद को ढालने के लिए तैयार किया जाता है। सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सिर्फ़ एक सैनिक ही न होकर इन परिस्थितियों में एक पर्वतारोही की तरह काम करें।