Blog single photo

शक्तिकांत दास की RBI गवर्नर पद पर नियुक्ति आर्थिक आतंकवाद: शिवसेना

उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद पूर्व वित्त सचिव शक्तिकांत दास को नया गवर्नर बनाया गया है। उनके गवर्नर बनाए जाने को लेकर सामना ने संपादकीय के जरिए केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा है। सामना ने अपनी संपादकीय में लिखा है कि शशिकांत दास की रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर नियुक्ति इसी मकसद से हुई होगी तो यह आर्थिक आतंकवाद की शुरुआत है।

Image source: Google

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (15 दिसंबर): उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद पूर्व वित्त सचिव शक्तिकांत दास को नया गवर्नर बनाया गया है। उनके गवर्नर बनाए जाने को लेकर सामना ने संपादकीय के जरिए केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा है। सामना ने अपनी संपादकीय में लिखा है कि शशिकांत दास की रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर नियुक्ति इसी मकसद से हुई होगी तो यह आर्थिक आतंकवाद की शुरुआत है। भारतीय जनता पार्टी के ही सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ही शशिकांत दास पर गंभीर आरोप लगाए हैं और ये सारे आरोप कागजों पर हैं। फिर भी दास को देश की सर्वोच्च आर्थिक संस्था के शिखर पर बिठाया जाता है, यह खतरनाक है।

यह मामला देश की स्वायत्त संस्थाओं का गला घोंटने का प्रयास है। शशिकांत दास की नियुक्ति से रिजर्व बैंक का ‘मजाक’ और अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। श्री दास ने राजनीतिज्ञों से मधुर संबंध बना रखे हैं। यहां सवाल महंगाई और अर्थव्यवस्था का है। राजनीतिज्ञों द्वारा निर्माण की गई समस्या पर रिजर्व बैंक का गवर्नर किस तरह लगाम लगाएगा? बता दें कि सामना ने संपादकीय में कहा है रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर मोदी सरकार ने अपना आदमी चस्पा कर दिया है। 

चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद को व्यक्तिगत लोभ तथा राजनीतिक स्वार्थ से दूर रखना चाहिए, ऐसा रिवाज रहा है। विगत 4 सालों में यह रिवाज कई बार तोड़ा गया। शशिकांत दास की गवर्नर पद पर नियुक्ति के बाद अर्थ तथा उद्योग जगत में इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। मोदी अथवा जेटली द्वारा अपने आदमी को नियुक्त करने में हर्ज नहीं होना चाहिए लेकिन इस महान आर्थिक शिखर संस्था पर से देश के आर्थिक काम-काज पर नियंत्रण रखने की क्षमता उस व्यक्ति में है क्या? ऐसा सवाल कई लोगों ने पूछा है।

सामना ने संपादकीय में कहा है नोटबंदी और जीएसटी जैसे निर्णय घातक साबित हुए। महंगाई बेशुमार बढ़ी तथा रुपए का अवमूल्यन रोज जारी है। यह सब रोकना रिजर्व बैंक के हाथ में था। मगर 4 सालों में जरूरत से अधिक राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ। यह हस्तक्षेप जब बर्दाश्त नहीं हुआ तब रघुरामन तथा उर्जित पटेल चले गए और हस्तक्षेप बर्दाश्त करनेवाले ‘दास’ लाए गए, ये नीति खतरनाक है। रिजर्व बैंक ने 11 बैंकों पर सख्त प्रतिबंध लगाए हैं। इस प्रतिबंध को ढीला किया जाए तथा बैंकों को कर्ज वितरण की छूट दी जाए, ऐसा सरकार को लगता है। लेकिन बैंकों का कर्ज डुबोकर बड़े उद्योगपति फरार हो गए हैं। उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा और पड़ेगा, ऐसी रिजर्व बैंक की नीति है। सरकार को सच बोलनेवाले लोग नहीं चाहिए। गर्दन हिलानेवाले चाहिए।

Tags :

NEXT STORY
Top