बीजेपी शासित राज्य में ही कांग्रेस मुक्त भारत का सपना टूटा- शिवसेना


न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (12 दिसंबर): पांच राज्यों में चुनाव परिणाम आने के बाद शिवसेना एकबार फिर बीजेपी पर हमला किया है। बीजेपी पर शिवसेना ने ये हमला अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय के जरिए किया है। शिवसेन ने सामना के संपादकीय में लिखा है कि चार राज्य हुए 'भाजपामुक्त' ज्यादा उड़नेवाले धराशायी हुए। सामना में शिवसेना ने लिखा है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ राहुल गांधी ने पूरे राज्य का दौरा किया और मध्यप्रदेश में बीजेपी का रथ रोक दिया। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता। वहां कांग्रेस को करीब 140 सीटें मिलेंगी, ऐसा माहौल था मगर मुख्यमंत्री पद के लिए अंदरूनी उठा-पटक और गुटबाजी ने कांग्रेस का आंकड़ा कम कर दिया। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच के संघर्ष से राजस्थान में कांग्रेस 100 सीटों पर थम गई। पर उस दल की वहां बहुमतवाली सरकार बननेवाली है। इस तरह हिंदी भाषी क्षेत्र के तीनों राज्य बीजेपी के हाथ से निकल चुके हैं। तेलंगाना में फिर से चंद्रशेखर राव विजयी हुए हैं। वहां पर बीजेपी और कांग्रेस से नीचे है। मिजोरम में स्थानीय दल ने बाजी मारी है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि श्री मोदी तथा श्री शाह ने ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का जो सपना देखा था, वह बीजेपी शासित राज्य में ही धूल में मिल गया है। इन राज्यों की जनता ने ही ‘भाजपामुक्त’ का संदेश दिया है।

पांच राज्यों में क्या होगा? इसका गणित और जमा खर्च लगाया जा रहा था। भारतीय जनता पार्टी एक भी राज्य में गणित हल नहीं कर पाई है तथा राहुल गांधी का ‘पेपर’ कोरा है ऐसा जिन्हें लग रहा था, उनके गणित लड़खड़ा गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह किनारे पर आ गए हैं और राहुल गांधी ‘मेरिट’ अर्थात मेधावी सूची में चमकने लगे हैं। मोदी का उदय तथा भाजपा की विजयी यात्रा जिन राज्यों से शुरू हुई थी, वहीं पर भाजपा के रथ के पहिये धंस गए हैं। मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद का ‘चेहरा’ हैं। ऐसा प्रस्ताव पास होने के बाद चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए (भूल-चूक माफ करें) और वहां प्रचंड जीत हासिल कर ‘यह मोदी के शुभ चरण हैं?’ इस तरह के घंटे पीटे गए। अब मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए ही चार राज्यों में भाजपा को ‘जबरदस्त’ झटका लगा है। इसमें से छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान तो भाजपा के अभेद गढ़ थे और इन गढ़ों में सुराख होगी, ऐसा किसी को नहीं लगा था।

नोटबंदी जैसे दिखावटी निर्णय से अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। लोगों का रोजगार चला गया और महंगाई बढ़ गई। जनता झुलस रही थी, उस समय हमारे प्रधानमंत्री दुनिया की राजनीति करते ‘उड़ते’ रहे। वे सीधे चार राज्यों के चुनाव प्रचार में अवतरित हुए। वहां भी भावनात्मक सवालों को उठाकर भाषण देते रहे। ‘राहुल गांधी मुझे भारत माता की जय बोलने से रोक रहे हैं या राम मंदिर निर्माण में कांग्रेस रुकावटें डाल रही है’। इस तरह का बचकाना बयान उन्होंने दिया। यह बयान उन पर ही उलट गया। नोटबंदी का सर्जिकल स्ट्राइक गांधी परिवार से पूछ कर नहीं किया था। इस बात को वे भूल गए। राम मंदिर का वचन भी उन्होंने नहीं निभाया। जो उर्जित पटेल नोटबंदी का समर्थन कर रहे थे, उन्होंने भी परेशान होकर रिजर्व बैंक के गवर्नर पद को छोड़ दिया है। हिंदुस्थान चार-पांच व्यापारियों के दिमाग से चलाया जा रहा है और उससे रिजर्व बैंक जैसी संस्था टूट रही है। दुनिया में इतनी आर्थिक अराजकता कभी मची नहीं होगी। राज्य चलाना मतलब पेढ़ी चलाना, उस पेढ़ी के टेबल के नीचे के पैसों द्वारा चुनाव जीतना, यह सब ऐसा ही रहेगा, इस भ्रम में जो थे उन्हें जनता ने बहुत बड़ा झटका दिया है। विकल्प की खोज में न फंसते हुए जनता को जो नहीं चाहिए था, उसे जड़ से उखाड़ डाला है। लोकतंत्र में पैसा, ईवीएम घोटाला, आतंकवाद की परवाह न करते हुए हवा में उड़नेवालों को जनता ने जमीन पर उतार दिया है। जनता के धैर्य को साष्टांग दंडवत!

मध्यप्रदेश में नरेंद्र मोदी की बजाय ‘मामाजी’ शिवराज सिंह चौहान का चेहरा लोकप्रिय था। भाजपा संगठन भी मजबूत था। ऐसे में कुछ भी हो जाए, अंतत: शिवराज बहुमत का आंकड़ा प्राप्त करेंगे, ऐसा माहौल था। वहां कांग्रेस ने भाजपायी शेर की गर्दन के बाल पकड़कर झकझोरा है।  सरकार सिर्फ चुनाव लड़कर जीतने के लिए होती है, इस देश में भाजपा के अलावा और कोई दल न टिके और न बचे और भाजपा के आश्रित के रूप में रहे, इस प्रवृत्ति की हार चार राज्यों में हुई है। भाजपा ने पहले मित्रों को भगाया और अब महत्वपूूर्ण राज्यों को गंवा दिया है। गप मारकर हमेशा जीता नहीं जा सकता। राजस्थान में किसान मुश्किल में है। मध्यप्रदेश में न्याय मांगने सड़क पर उतरे किसानों पर गोलियां बरसाई गर्इं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माफी मांगी लेकिन किसानों ने अंतत: इसका बदला मतपेटी के जरिए लिया। भाजपा की चाणक्य मंडलियों ने अजीत जोगी को तोड़कर उनसे अलग पार्टी बनवाई और उन्हें चुनाव मैदान में उतार दिया। इस चाणक्य नीति को तोड़-फोड़कर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विजयी हुई।