एक विमान हादसा और लापता हो गया देश की आजादी का महानायक...

नई दिल्ली (23 जनवरी): देश की आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत क्या वाकई विमान हादसे में हुई थी। 70 साल से ये सवाल मुकम्मल जवाब का इंतजार कर रहा है। सरकार का दावा है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुए विमान हादसे में गई थी नेताजी की जान। लेकिन नेताजी से जुड़े लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते। नेताजी की मौत से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक होने के बाद अब इससे पर्दा उठने की उम्मीद हैं।

18 अगस्त 1945 ताईवान के शहर ताइपे में एक धमाका हुआ था। वो धमाका जिसकी गूंज आज तक पूरे हिंदुस्तान को सुनाई दे रही है। क्योंकि उसी धमाके के साथ लापता हो गया था हिंदुस्तान की आज़ादी का महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अपने पीछे छोड़ गया आज़ाद हिंदुस्तान का अब तक का सबसे बड़ा राज़...

23 अगस्त 1945 को जापानी न्यूज एजेंसी ने सुभाष चंद्र बोस की मौत की खबर सुनाई। लेकिन प्लेन हादसे में नेताजी की मौत की खबर ने हर किसी को चौंका दिया। पूरा हिंदुस्तान सदमे में डूब गया। तमाम लोग ऐसे थे जिन्हें यकीन नहीं हुआ कि वाकई नेताजी की मौत हो सकती है। इनमें से वो भी थे जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जंग लड़ी। उनकी मौत पर सन्न वो लोग भी थे जो नेताजी के अपने थे। उनके रिश्तेदार थे। जिन्हें कभी उनकी मौत पर यकीन ही नहीं हो सका।

इसलिए उनकी मौत की खबर के साथ ही शुरू हो गया मौत पर सस्पेंस शुरू हो गई नेताजी के जिंदा रहने की खबरें। खुद उनके रिश्तेदारों और साथियों में भी उनकी मौत को लेकर गफलत रही तो फिर पूरे देश को कैसे यकीन होता कि वो क्रांतिकारी इतनी आसानी से हमसे दूर चला गया।

एक नहीं, दो नहीं, पूरे तीन कमीशनों ने की नेताजी की रहस्यमयी मौत की जांच की। लेकिन 67 साल बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। पूरी दुनिया में पहेली बन गई उस क्रांतिवीर की जिंदगी और मौत की कहानी। वो एक प्लेन हादसा अपने पीछे सैकड़ों सुलगते सवाल छोड़ गया।

खुद कई बरसों तक सुभाष चंद्र बोस के ड्राइवर और बेहद करीबी को भी कभी यकीन नहीं हुआ कि नेताजी की मौत भी हो सकती है। क्योंकि उसकी मानें तो उस प्लेन में तो नेताजी थे ही नहीं।

हिंदुस्तान में नेताजी की मौत की बात पर यक़ीन करने वाले लोग शायद ही मिलें। तो फिर क्या है इस राज़ का सच क्या वाकई नेताजी इस हादसे में नहीं मारे गए। पूरा देश 70 साल से सवाल पूछ रहा है लेकिन उसे कभी जवाब नहीं मिला इन सवालों का। लेकिन पीएम मोदी द्वारा सार्वजनिक की गई फाइलें से खुल सकेगा आज़ाद हिंदुस्तान का सबसे बड़ा राज़।

1955 मे बनी शाहनवाज ने अपनी जांच के बाद विमान दुर्घटना में नेताजी की मौत को सही माना। लेकिन खुद कमेटी में ही इस बात पर एक राय नहीं थी। इस कमेटी के ही दूसरे सदस्य और नेताजी के छोटे भाई सुरेश चंद्र बोस इसे मानने से इनकार करते रहे।

रिपोर्ट के मुताबिक नेताजी 16 अगस्त 1945 को अपने कुछ साथियों के साथ जापान के एक बम वर्षक विमान में सिंगापुर से बैंकॉक पहुंचे। बैंकॉक में रात गुजारने के बाद वो 17 अगस्त 1945 को वियतनाम के शहर सायगॉन पहुंचे। सायगॉन के आगे जापानी अधिकारियों ने सुरक्षा के लिहाज़ से नेताजी से अपने सभी सहयोगियों को साथ न ले जाने के लिए कहा। लिहाज़ा नेताजी अपने सबसे करीबी कर्नल हबीबुर्रहमान के साथ मंचूरिया की ओर बढ़े। 

रास्ते में उन्हें वियतनाम के शहर तुरेन में रुकना पड़ा। तुरेन में रात गुजारने के बाद वो अगले दिन 18 अगस्त को ताइवान के शहर तायहोकु पहुंचे। शाहनवाज़ की रिपोर्ट के मुताबिक..नेताजी के विमान ने तायहोकु से मंचूरिया के लिए अपनी उड़ान भरी। लेकिन उड़ान भरते ही ये दुर्घटनाग्रस्त हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक इस दुर्घटना में नेताजी बुरी तरह जल गए और पास के अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया जहां उनकी मौत हो गई। 

इस रिपोर्ट के मुताबिक नेताजी का मकसद मंचूरिया के रास्ते रूस में दाखिल होकर भारत में अंग्रेजी रात के खिलाफ अपनी मुहिम को तेज करना था। लेकिन रिपोर्ट पर आज तक किसी हिंदुस्तानी को यकीन नहीं हुआ। आज़ादी के बाद कई बार ये मसला उठा लेकिन सच कभी सामने नहीं आ पाया।