'तीन तलाक' की वैधता को संवैधानिक सिद्धांतों पर जांचेगा SC

नई दिल्ली (29 जून): एक तरफ मुस्लिम धार्मिक समूह अपने पर्सनल लॉ में किसी भी संभावित बदलाव का विरोध कर रहे हैं। वहीं इस सख्त विरोध के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर ये मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह इस बात की जांच करेगा।

'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया टीएस ठाकुर की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, "हमें उन सभी को सुनना होगा। साथ ही इसपर ध्यान देना होगा कि किस सीमा तक कोर्ट्स मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल कर सकते हैं, अगर कोर्ट्स को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन ज्ञात होता है।"

कोर्ट ने आगे कहा, कि तीन तलाक की वैधता को संवैधानिक सिद्धातों के आधार पर जांचा जाएगा। बेंच याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई कर रहा था। जिसे मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक, बहुविवाह और उत्तराधिकार के मामलों में लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के अभ्यास को चुनौती देने के लिए दायर किया है।

अक्टूबर में कोर्ट की एक अन्य बेंच ने अटॉर्नी जनरल और नेशनल लीगल सर्विसेस अथॉरिटी को नोटिस जारी किए थे। जिसमें बेंच ने कहा था, "शादी और उत्तराधिकार से संबंधित कानून धर्म का हिस्सा नहीं है। कानून को समय के हिसाब से बदलना चाहिए।" बेंच ने कहा कि बहुविवाह का अभ्यास सार्वजनिक नैतिक मूल्यों के लिए खतरनाक हैं। इनपर भी सरकार निगरानी रख सकती है, जैसे कि सती प्रथा पर।  

समुदाय का एक हिस्सा इन सुधारों का विरोध कर रहा है। जो कोर्ट के इस कदम का विरोध कर रहा है, जो बानो की तरफ से उठाए गए सवालों के संबंध में उठाए गए हैं। वे भत्ते और उत्तराधिकार के मामले में भी लैंगिक भेदभाव की जांच का विरोध कर रहे हैं। उठाए गए ये दो मुद्दे दशकों से असफल रहे हैं।   ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर समुदाय के धार्मिक अभ्यासों में न्यायिक हस्तक्षेप का विरोध किया है।