दो दशक पूराने फैसले हिंदुत्व एक जीवन शैली पर एक बार फिर SC में सुनवाई शुरू

नई दिल्ली ( 19 अक्टूबर ) : सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक व्याख्या के लिए हिंदुत्व पर अपने दो दशक पुराने फैसले पर गहन मंथन के लिए बेहद अहम सुनवाई शुरू कर दी है। चुनाव में धर्म के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई चल रही है। हिंदुत्व धर्म नहीं बल्कि जीवनशैली है, इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने दो दशक बाद फिर से विचार करना शुरू किया है। सुप्रीम कोर्ट के 7 सदस्यों की संविधान पीठ इस मुद्दे और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गौर कर रही है, जैसे कि क्या धर्म (हिंदुत्व समेत) को चुनावी लामबंदी के दौरान इस्तेमाल किया जा सकता है या इससे बचा जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। 

जिन मामलों को सुनने बैठी है, वो 90 के दशक के हैं। ये पूरी सुनवाई रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल्स एक्ट यानी जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) पर है।  इस धारा में एक उम्मीदवार के लिए चुनाव में जिन आधारों पर वोट मांगना ‘करप्ट प्रैक्टिस’ माना गया है, उसमें धर्म भी शामिल है।  

पूरे मामले में दिलचस्पी की वजह 1995 में आया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला भी है। तब जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने हिंदुत्व को एक जीवनशैली बताया था. कोर्ट ने कहा था कि हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने को हिन्दू धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता।  इसलिए, इस पर जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) लागू नहीं होती। 

1995 में कोर्ट का फैसला क्या था? बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने दिसंबर 1995 में फैसला दिया था कि चुनाव में हिंदुत्व का इस्तेमाल गलत नहीं है क्योंकि हिंदुत्व धर्म नहीं बल्कि एक जीवन शैली है। जस्टिस जेएस वर्मा की अगुआई वाली बेंच ने यह फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा था, 'हिंदुत्व शब्द भारतीय लोगों के जीवन पद्धति की ओर इशारा करता है। इसे सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं किया जा सकता, जो अपनी आस्था की वजह से हिंदू धर्म को मानते हैं। इस फैसले के तहत, कोर्ट ने जनप्रतिनिधि कानून के सेक्शन 123 के तहत हिंदुत्व के धर्म के तौर पर इस्तेमाल को भ्रष्ट क्रियाकलाप मानने से इनकार कर दिया था। 

इस केस 2014 में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ को सौंपा गया। 1995 के फैसले के बाद इसी मुद्दे पर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने आई. पांच जजों की पीठ ने इस मामले को 2014 में सात जजों की बेंच के हवाले कर दिया.

मंगलवार को एक याचिकाकर्ता अभिराम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी दलील रखीं. अगले कुछ दिनों में जिन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट गौर कर सकता है, उनमें से कुछ ये हैं- -क्या एक उम्मीदवार अपने धर्म के नाम पर वोट मांग सकता है? -क्या कोई और शख्स किसी विशेष उम्मीदवार के लिए उसके धर्म के नाम पर वोट मांग सकता है? -क्या कोई उम्मीदवार दूसरे धर्म के लोगों से अपने लिए वोट मांग सकता है, इस वादे के साथ कि वो उस धर्म/समुदाय के लोगों को मदद करेगा?  -क्या कोई और शख्स विशेष समुदाय से अपील कर सकता है या कह सकता है कि वो उस उम्मीदवार के लिए वोट करें जो दूसरे समुदाय या धर्म से नाता रखता है?